Sunday, 14 January 2018

Makar Sankranti - मकर संक्रांति

 मकर संक्रांति


नमस्कार मित्रों । आज मकर संक्रांति का पर्व है । जैसा कि आप जानते हैं इस पर्व को पूरे भारत देश में और नेपाल में खूब धूम धाम से मनाया जाता है ।

हमारे देश मे कई अलग अलग रीति रिवाज और रूपों में मनाया जाता है । जैसे पंजाब तथा हरियाणा में इसे लोहिड़ी के रूप में एक दिन पूर्व मनाया जाता है । तमिलनाडू में ये पोंगल के रूप में मनाया जाता है । इस दिन सभी लोग दान पुण्य को भी विशेष महत्व देते हैं ।

इस दिन सूर्य धनु से मकर राशि में प्रवेश करता है और इस दिन से सूर्य की गति उत्तरायण हो जाती है । और आज से दिन बड़े और रात छोटी होनी शुरू हो जाती है ।

इन के अलावा इस पर्व की और भी बहुत सारी मान्यताएं और विशेषतायें हैं । मौका भी था और दस्तूर भी, इसलिए आज मैनें इसी विषय को चुना एक कविता के लिए । उम्मीद है कि आप इस कविता को भी पसंद करेंगे ।



मकर संक्रांति


दमकते चेहरे महकते दिल
गजक खिचड़ी और गुड़ तिल
पकवानों की सौंधी महक से
हवा का मुखड़ा गया है खिल

मकर राशि में भाष्कर आये
दिन ये मकर संक्रांति कहाये
इस शुभ दिन को ही भागीरथ
स्वर्ग से गंगा लेकर आये
सुना है इस दिन दान पुण्य के
सब शुभ फल जाते हैं मिल
पकवानों की सौंधी महक से
हवा का मुखड़ा गया है खिल

आसमान से धुंध छंट गई
लोहड़ी की रेवड़ियां बंट गई
माघ मेले की हुई तैयारी
पावन नदी की रौनक बढ़ गई
ठिठुराती इस सर्दी से भी
अब जाएगी राहत मिल
पकवानों की सौंधी महक से
हवा का मुखड़ा गया है खिल

उड़ी पतंगें आसमान पर
अजब अनोखी रंग बिरंगी
तरह तरह के रंगों से मिलकर
नीला गगन बना सतरंगी
"वो काटा" के शोर से देखो
सारा शहर गया है हिल
पकवानों की सौंधी महक से
हवा का मुखड़ा गया है खिल

ऋतु वसंत इठलाती आई
सिकुड़ी हुई कलियां मुस्काई
अच्छी फसल की आशा मन में
कृषकों के चेहरे पर छाई
ईश्वर से अरदास करो सब
जो ये मांगे जाए मिल




आओ हम भी प्रण इक करलें
साथ चलेंगे सब हिलमिल
दमकते चेहरे महकते दिल
गजक खिचड़ी और गुड़ तिल ।।

आप सभी को मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं । शीघ्र ही फिर मिलेंगे ।


Click here to read "फिर बच्चा बन जाऊं" by Sri Shiv Sharma


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*








आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

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Friday, 29 December 2017

Mera Gaon - मेरा गांव

मेरा गांव


शहर की भागती दौड़ती जिंदगी, जहां आदमी सुबह से शाम बस भागता रहता है । बमुश्किल कभी फुर्सत के क्षण मिलते हैं, और जब भी शहरी आदमी फुरसत में होता है, अक्सर उसे अपने गांव की याद आ ही जाती है ।

मेरे गांव का सभी लोगों का आपसी अपनापन, उनके बीच होती हंसी ठिठोली, तीखी मीठी नोकझोंक, खेतों में चारा चरते पालतू जानवर, अपनी स्कूल, पुराने सहपाठी, दोस्तों के साथ मस्तियां, सुकून भरी नींद, कुछ ही पलों में वो बहुत कुछ याद कर लेता है ।

गांव में रहते शहर का ख्वाब देखने वाला वही व्यक्ति जब शहर और गांव की तुलना करता है तो शायद यही सोचता होगा कि इस शहर ने उसे युं तो काफी कुछ दिया है, परंतु पीछे भी जीवन की बहुत सी कीमती चीजें, वहीं, गांव में रह गई, जो इस शहर में मिल ही नहीं सकती ।

इसी विषय पर एक कविता लिखने का प्रयास किया है । आशा है, आप सब इसे भी पसंद करेंगे ।





मेरा गांव

शहर जहां कई जगह
अपनी करतूतों पर शर्मिंदा है,
वहीं भोलेपन के माहौल में
मेरा गांव अब भी जिंदा है,

जहां बसता है जीवन
प्रेम स्नेह और अपनापन
एक दूजे के सुख दुख की
लोगों को अब भी फिक्र है
अपने इतिहास और संस्कारों का
हर जुबां पर जिक्र है

शाम को चौपाल पर
वैसा ही जमघट होता है,
गांव गांव में अब भी
एक तालाब एक पनघट होता है,

बैलगाड़ी से खेत जाते किसान
ये दृश्य अब भी आम है,
मुस्कुराती हुई सुबह वहां
वहां इठलाती सी शाम है,

सितारों की रोशनी
बालू रेत पर चमकती है,
मुस्कुराती इतराती चांदनी
चप्पे चप्पे पर विचरती है,
सूर्य की पहली किरण भी शायद
गांव की गलीयों से निकलती है

माना कि शहर में
सैंकड़ों सुविधाएं हैं,
उससे ज्यादा मगर,
अनगिनत दुविधाएं है,

गांव में ताजी खुली हवा है
शहर चारों ओर धुआं धुआं है,
शहरों में बड़े बड़े हस्पताल
नामी गिरामी हकीम है
गांव में हर मर्ज की दवा
वही, चौराहे वाला नीम है,




शहर की भीड़ का आलम
लगता है जैसे कोई मेला है,
फिर भी इस भागते शहर में
हर आदमी अकेला है,
किसी को किसी से जैसे
कोई वास्ता ही नहीं,
और जहां बेधड़क चल सकें
ऐसा कोई रास्ता ही नहीं,

गांव वाले घर के आंगन से छोटा
शहर का फ्लैट है
वहां समय ही समय है
यहां हर वक्त लेट है

वहां सेहत है
यहां हजारों बीमारी है,
यहां की बाइक पर
गांव की साइकिल भारी है,

पड़ौसी अपने पड़ौसी को
नहीं पहचानता है,
और गांव का बच्चा बच्चा
सबको नाम से जानता है

खुशी और गम में
जीवन के हर मौसम में,
हर एक के हर मौके पर
हर कोई साथ है,
मेरे गांव की
यही तो खास बात है ।।

    *    *    *

धन्यवाद दोस्तों । आपको ये कविता कैसी लगी, बताना अवश्य । जल्दी ही फिर मुलाकात होगी ।

जय हिंद

Click here to read "सुहानी सर्दी" by Sri Shiv Sharma


*शिव शर्मा की कलम से*








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Sunday, 26 November 2017

Muskuharat - मुस्कुराहट

मुस्कुराहट


नमस्कार मित्रों, एक बार फिर आपके लिए एक छोटी सी ग़ज़ल ले कर आया हुं । मुझे उम्मीद है कि हर बार की तरह इस बार भी आप इस ग़ज़ल को भी पसंद करेंगे और मुझे और लिखने के लिए प्रेरित करेंगे ।

ग़ज़ल का शीर्षक कुछ समझ में नहीं आ रहा था तभी मैनें गौर किया कि इसे पढ़ते पढ़ते मेरे एक  मित्र के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी, अतः मैनें इसका शीर्षक मुस्कुराहट ही रख दिया ।

मुस्कुराहट

सभी को अपना बना लिया मैनें
बस जरा सा मुस्कुरा दिया मैनें

सुनाकर मुहब्बत के कुछ नगमे
हर दिल में घर बना लिया मैनें,

सूरत पे कभी आने ना दिया
दर्द सीने में छुपा लिया मैनें,

कुछ इस कदर समझौते किये
हर एक इल्जाम उठा लिया मैनें,

कुछ कहता तो वे खफा हो जाते
जुबां पे ताला लगा लिया मैनें,

मिले थे ज़ख्म भी दौर ए जिंदगी में
वो वक्त भी हंसकर बिता दिया मैनें,

महफ़िल में मिली जो नजरें उनसे
चैन दिल का गंवा दिया मैनें,

इल्म जरा भी वो कर ना पाए
उनको उन्हीं से चुरा लिया मैनें,

यारों ने जो पूछा राज मेरी खुशी का
नाम उनका बता दिया मैनें,

कभी तन्हाइयां जो डसने बढ़ी
खुद को खुद में छुपा लिया मैनें,

खामोशियों को सिखाने सबक
एक गीत गुनगुना दिया मैनें ।।

**    **    **   **

हमेशा की तरह आपके सुझावों और हौसलाअफजाई का इंतज़ार करूँगा । फिर मिलते हैं जल्दी ही ।

Click here to read Tere Liye


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*









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