Monday, 19 October 2015

गाँव और शहर का जीवन - Life of Villege and City

गाँव और शहर का जीवन - Life of Villege and City


गर्मियों की शाम का समय, गोधूलि वेला थी । पश्चिम में सूर्य अस्त हो रहा था । गली से गुजरती बैलगाड़ियों के बैलों के गले में बंधी घंटीयों से टन टन की निकलती ध्वनि मानो कानों में शहद घोल रही थी ।

कितना मनभावन था वह दृश्य । मैं कल ही मुम्बई से अपने गाँव आया था और अपने परिवार जनों के साथ छत पर बैठा अपनों से मिलन का आनंद ले रहा था ।

कहाँ गाँव की ये सुरमई शाम और कहाँ वो मुम्बई की भाग दौड़ । यहाँ हर कोई हर काम फुरसत से कर लेता है और वहाँ फुरसत नाम की चीज है ही नहीं । हर कोई व्यस्त है मायानगरी की भागती जिंदगी में । कब सुबह होती है और कब शाम ढल जाती है, पता ही नहीं चल पाता।  


 रात को 11.30 बजे सोता था और सवरे 7 बजे बिस्तर छोड़ता था मैं, और जब तक नित्यकर्मों से निवृत होता बच्चे कॉलेज के लिए तैयार हो कर नाश्ता कर रहे होते थे, क्योंकि उनको अपने तय समयानुसार लोकल ट्रेन पकड़नी होती थी ।

मुम्बई में हर काम समय पर करना पड़ता है वरना हम पीछे रह जाते हैं और "गाड़ी छूट जाती है"। वहां गाड़ियों का समय भी वैसे ही होता है, 7.52, 8.18, 9.53 या 10.14 यानी एक एक मिनट का हिसाब ।

यहाँ गाँव में अगर किसी को किसी से मिलना है तो ये ही कहेंगे "कल शाम को मिलते है 5-6 बजे" अब 5 या 6, इस पर कोई बहस नहीं होती और अगले दिन वो लोग 6-7 बजे मिल लेते है, जबकि ये ही बात मुम्बई में हो तो कहेंगे "कल 9.53 में मिलते हैं, आ जाना" अगर किसी कारण से आप 9.53 पर नहीं पहुंच पाये तो भैया फिर बात अगले दिन पर चली जाती है । क्योंकि किसी के पास किसी के भी लिए समय नहीं है । कई बार तो अपने लिए भी नहीं।

कितना फर्क है दोनों जगह की जिंदगीयों में, यहाँ लोग जिंदगी जी रहे हैं। एक दूजे का सुख दुःख बाँट रहे हैं। पुरे गाँव में कौन कहाँ रहता है, सबको पता है और वहां साथ वाले फ्लैट में कौन रहता है बरसों नहीं जान पाते।

कुछ पाने की तलाश में हम गाँव और परिवार छोड़कर शहरों में आ तो जाते हैं, मगर इस पाने के चक्कर में हम क्या कुछ खो देते हैं ये हम भी नहीं जानते ।

शायद इसी का नाम जिंदगी है।




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