Monday, 30 November 2015

मेला - Mela, Funfair


मेला - Mela, Funfair


उस वक्त मैं प्राइमरी स्कूल में पढ़ा करता था । घर से थोड़ी दूर ही हमारी स्कूल थी जहां हम मोहल्ले के काफी बच्चे पढ़ने जाया करते थे । आधी छुट्टी में स्कूल के पास बने बगीचे में हम झूला झूलने जाया करते थे । कभी कभी, पैसे होते तो, स्कूल के बाहर खड़े ठेले से कोई चाट पकौड़ी खा लेते ।

उस दिन स्कूल में थोड़ी जल्दी छुट्टी हो गयी थी । आज गांव में मेला लगने वाला था, गणगौर तीज का मेला । राजस्थान में गणगौर का ये उत्सव चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है । गणगौर के रूप में माँ पार्वती और ईशर के रूप में भगवान शंकर की पूजा की जाती है ।

नवविवाहिताएं अपने पति का उम्र भर का साथ यानि अखंड सुहाग पाने को और कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर गणगौर की पूजा और व्रत करती है ।

नवविवाहिताएं अपनी पूजी हुयी गणगौर का चैत्र शुक्ल तृतीया को सांयकाल नदी, तालाब या सरोवर में विसर्जन करती है । गौर माता को विदा करने हेतु पूरा गांव तालाब किनारे इकठ्ठा होता है, और फिर मेले का रूप ले लेता है ।

राजस्थान की राजधानी, गुलाबी नगरी जयपुर में तो ये उत्सव इतनी धूमधाम से मनाया जाता है कि गणगौर की शाही सवारी देखने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ता है, जो जयपुर के राजपरिवार के यहां से निकलती है ।

अन्य गांवों की तरह हमारे गांव में भी इस दिन मेला लगता है जहां तरह तरह के हिंडोले, झूले, मिठाई नमकीन की अस्थाई दुकानें, खिलौनों की दुकानें इत्यादि बड़े ही व्यवस्तिथ तरीके से सजे होते थे । आज वही मेला शाम को तालाब किनारे लगने वाला था ।

हम मोहल्ले के सभी दोस्त छुट्टी के पश्चात जब स्कूल से निकले तो घर आते वक्त उत्सुकतावश तालाब वाले रास्ते से ही आये । ये जांचने के लिए कि मेले की क्या तैयारियां चल रही है । लेकिन उस वक्त वहां ज्यादा चहल पहल नहीं थी । बस दुकानों के लिए तिरपाल की कनातें बाँधी जा रही थी ।

घर आकर जल्दी जल्दी कुछ खाना खाया । क्योंकि ध्यान तो पूरा शाम को लगने वाले मेले में लगा था । मेले में जाने के लिए थोड़ी बहुत मेला खर्ची भी तो चाहिए होती थी, जो मैं घर के सब बड़ो से "लाइए मेला खर्ची दीजिये" कह कर इकट्ठी करता ।

माँ, पिताजी, दादी, भैया, दीदी, मामा, नानी सब कुछ ना कुछ दे देते थे । कोई चवन्नी, कोई दस बीस पैसे तो कोई अठन्नी । कुल मिला कर दो सवा दो रुपये इकट्ठे हो जाया करते जो उस समय काफी होते थे ।

शाम को सब परिवार वालों के साथ मेला देखने निकल पड़ते । लेकिन जब हम चार पांच दोस्त इकठ्ठा हो जाते तो हमारी मंडली घर वालों से अलग हो जाया करती थी । फिर तो कभी कचोरी, शरबत, मलाई वाली कुल्फी का आनंद उठाते, कभी झूलों का । हवा में उड़ने वाले गैस का गुब्बारा, बांसुरी, पों पों वाला बाजा, झुनझुना इत्यादि उन दो सवा दो रुपये में ही कितनी खरीददारी, कितना मनोरंजन और खाना पीना हो जाया करता था ।

समय चक्र अपनी निश्चित गति से चलता रहता है । प्राइमरी से उच्च माध्यमिक स्कूल और फिर कॉलेज । कई मेले आते और चले जाते । आठवीं नवीं क्लास तक तो फिर भी बहुत से मेले देखे । उसके बाद मेलों में जाने का मौका कम ही मिलता था । कारण, मेले अक्सर परीक्षाओं के समय ही हुआ करते थे ।

पढ़ाई पूरी हुयी तो आगे के जीवन को सुगम बनाने का उद्देश्य लिए चला आया मुम्बई । यहां का दृश्य देख कर तो में अचंभित हो गया,  जहां देखो एक मेला सा ही दिखाई पड़ता है । हर तरफ लोगों की भीड़, कदम कदम पर हर वो वस्तुयें उपलब्ध है जो हम गांव में मेला होने पर ही देख या खरीद पाते थे ।

आज जेब में दो सवा दो रुपयों की जगह पांच सात सो रुपयों ने ले ली है ।  चाट पकौड़ी अब भी खाता हुं । मौका मिलने पर झूला भी झूलता हुं । लेकिन इस चाट पकौड़ी में वो स्वाद और झूले में वो आनंद नहीं मिलता जो गांव के मेले में मिला करता था ।

शायद आपको भी अपने गांव के मेले याद आते होंगे या अभी मेरे इस अनुभव को पढ़कर आये होंगे । आशा है आपके विचारों से आप मुझे जरूर अवगत कराएँगे ।

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जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...







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Sunday, 29 November 2015

बाबुल का घर - Babul Ka Ghar, The sweet memory of a father about his Daughter


बाबुल का घर -  Babul Ka Ghar


The sweet memory of a father about his Daughter

पांच साल की नन्ही सी आस्था खूब मस्ती कर रही थी । पुरे घर में भागती फिर रही थी । पापा मम्मी भी उसकी बाल क्रीड़ाओं का आनद ले रहे थे और उसके साथ साथ अपना बचपन वापस जी रहे थे । वो कभी मेज के निचे छुप जाती तो कभी दरवाजे के पीछे । फिर आवाज लगाती "पापा बताओ मैं कहाँ हुं । मम्मी मुझे ढूंढो ।"

और पापा मम्मी दोनों जानबूझकर अनजान बन कर तुतलाते हुए बोलते "अले अले, आस्था कहां चली गयी, अभी अभी तो यहीं थी, ढूंढो ढूंढो उसे जल्दी से, नहीं तो पापा का मन कैसे लगेगा । मम्मी शाम को परियों वाली कहानी किसे सुनाएगी ।"


बाबुल का घर




आस्था भी अपनी जीत पर खुश होकर घुंघरुओं की सी खनकती आवाज में हंस देती और पापा ऐसा दर्शाते हुए उसे पकड़ लेते जैसे उसकी हंसी की आवाज से वो पकड़ी गयी । "अरे ये तो अपनी गुड़िया हंस रही है, देखो तो आस्था की मम्मी, शायद ये आवाज मेज के निचे से आ रही है ।"

मम्मी मेज के निचे देखकर कुछ बोलती उस से पहले आस्था अपनी नन्ही सी ऊँगली अपने मुंह पर रखकर मम्मी को चुप रहने का इशारा करती । उसकी मम्मी भी उसके साथ बच्चा बन जाया करती थी । "मेज के निचे तो नहीं दिख रही है जी, लगता है बाहर गली में से उसकी हंसी की आवाज आई थी । चलिए बाहर ढूंढते है उसे ।"


और पापा बनावटी चिंता वाली आवाज में कहते "अरे जल्दी चलो उसे ढूंढ के लाते हैं, फिर बाजार भी तो चलना है ।"

तब हंसती हुयी आस्था मेज के निचे से निकलती और धीरे से पीछे से आकर पापा की आँखों पर अपने दोनों हाथ रख देती । पापा उन हाथों को छूकर कहते । ये कोमल कोमल हाथ तो मेरी गुड़िया के हैं । फिर छोटे छोटे हाथों को चूमते और घूम कर आस्था को गोदी में उठा लेते थे ।


बाबुल का घर


दादा दादी तो उसके बिना एक पल भी नहीं रहते थे । शाम को दादाजी के साथ परमू चाचा की दुकान से चूरन वाली गोलियां लेने जाने का तो दादा पोती का रोज का नियम सा बन गया था ।

"कहां खो गए जनाब" कमरे में आती पत्नी गंगा की आवाज कानों में पड़ी तो हरीश जैसे नींद से जागा ।

"जल्दी करो, पिताजी और चाचाजी प्रतीक्षा कर रहे हैं, लड़का देखने जाना हैं । और ये आपके हाथ में क्या है ? अरे, ये तो आस्था की तब की फ़ोटो है जब वो पांच साल की थी । समझ गयी......,  आप फिर खो गए ना यादों में ?"



"अरे नहीं नहीं बस यूँ ही" हरीश अपनी पलकों पर ढलक आये आंसुओं को छुपाने की असफल कोशिश करता हुआ बोला ।

"हरीश, मैं आपकी अर्धांगिनी हुं, आपके मन की हर बात समझ सकती हुं । जब से आस्था की सगाई की चर्चा चली है आप गुमसुम से, खोये खोये से रहते है, लेकिन ये संसार की रीत है कि बेटी को एक ना एक दिन पिता का घर छोड़ कर पिया के घर जाना ही पड़ता है । मैं भी तो आई थी आपके साथ ।" गंगा का गला भी थोड़ा रुंध सा गया था कहते कहते ।

"क्या हुआ बहु" समय लगते देख बाहर से मां ने आवाज लगाई और कमरे के भीतर आ गयी ।


बाबुल का घर


"कुछ नहीं माँजी, आपके पुत्र थोड़े भावुक हो गए थे आस्था के दूर जाने की सोचकर ।"

मां ने हरीश के कंधे पर हाथ रखा और कहा "बेटा, मैं जानती हुं इतने वर्षों तक साथ रही बेटी को विदा करने की सोचना बहुत कष्टदायक है, लेकिन बेटियां एक उम्र के बाद अपने पिता के घर की बजाय ससुराल में ही अच्छी लगती है । इसलिए जाओ और लड़का देख के आओ, अच्छा परिवार है उनका, हमारी गुड़िया राज करेगी, वहां पर ।"

जी मां, कहकर हरीश कमरे से बाहर निकल आया । आँगन में छोटे भाई को पढ़ा रही आस्था को देखकर उसका मन फिर भर आया, और वो सोचने लगा, ये समय भी कितनी जल्दी गुजर जाता है । कल तक अपनी चंचल शरारतों से सबके मन हरषाने वाली, सबके दिलों पर राज करने वाली आस्था कुछ ही दिनों में हम सबको छोड़ जायेगी,  अपनी एक नई दुनिया बसाने ।


पार्श्व में कहीं से एक गीत सुनाई पड़ रहा था ।

"बेटी घर बाबुल के, किसी और की अमानत है ।
दस्तूर दुनिया का, हम सबको निभाना है ।।"


बाबुल का घर

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Saturday, 28 November 2015

खूबसूरत बंटवारा - Khoobsurat batwara, Property partition Between two brothers



खूबसूरत बंटवारा - Khoobsurat batwara

Property partition Between two brothers

"मोती जरा पांच किलो देसी घी देना" बाहर से पंडितजी की आवाज आई तो मोतीलाल की आँख खुल गयी । गर्मियों की तपती हुयी दुपहरी थी । इस वक्त ग्राहक यदा कदा ही आते थे इसलिए मोती एक आध झपकी ले लेता था । पंडित जी को इस आग बरसती धुप में अपनी दुकान पर देख मोती भी आश्चर्यचकित था ।

"प्रणाम पंडितजी, इतनी गर्मी में आने की क्या जरुरत आन पड़ी गुरुदेव ।" मोती ने आदर के साथ पंडितजी से पूछा ।


खूबसूरत बंटवारा


"तुम्हे नहीं पता क्या? तुम्हारे छोटे भाई छगन ने आज शाम को हवन रखा है ना मंदिर में ग्रह शांति का ।"

" नहीं, शायद भाई बताना भूल गया होगा, अभी परसों ही तो आसाम से आया हैं, अचानक हवन का विचार बना लिया होगा ।" मोती ने पंडितजी को घी का डब्बा देते हुए एक संतोषजनक जवाब भी दे दिया ।

छोटे से गांव में एक छोटी सी दुकान कर रखी थी मोती ने । आमदनी कुछ ज्यादा तो नहीं थी पर घर की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी थी । छगन आसाम रहता था, और कमाई भी अच्छी थी । भाई की अनुपस्तिथि में मोती अपने परिवार के साथ साथ अपने भाई के परिवार का भी ध्यान रखा करता था । दो साल पहले तक तो वे सब साथ ही रहते थे ।

भाई साल डेढ़ साल में गांव आता तो मोती से हिसाब बताने को कहता था । मोती हंसकर टाल देता था कि मुन्ना हिसाब किस चीज का । अपनी ही दुकान तो है । अब इस दुकान से सामान मेरे घर गया या तुम्हारे घर, क्या फर्क पड़ता है ।



छोटे भाई ने दो साल पहले ही अपना मकान बनवाया था,  जो मोती की ही देखरेख में बना था । भाई तो आसाम रहता था । गांव में वो ही तो था, भाई का मकान बनवाने हेतु । वो पैसे लेकर जाता था और कारीगरों द्वारा लिखाया सामान शहर से ला देता था । बचे हुए पैसे वापस हिसाब के साथ अपनी पत्नी के द्वारा भाई की पत्नी को दे दिया करता था ।

खुद पैतृक मकान में रहता था । ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था इसलिए पिताजी ने बाहर वाले कमरे से गली की तरफ एक दरवाजा खुलवाकर उसे दूकान का रूप दे दिया था, और कई वर्षों से मोती उस दुकान से अपनी रोजी रोटी चला रहा था । पिताजी के असमय चले जाने के बाद भाई को भी इसी दुकान की बदौलत पढ़ा लिखा कर आसाम भिजवाया था ।


खूबसूरत बंटवारा


पंडितजी के जाने के बाद वो थोडा चिंतित सा हो गया । भाई हवन करवा रहा है और मुझे बताया तक नहीं, क्या बात हो सकती है । आज सुबह उसका व्यवहार भी कुछ अटपटा सा था । कह रहा था भाईजी आपसे कुछ बात करनी है ।

क्या बात है छगन, मोती के पूछने पर उसने इतना ही कहा था "शाम को आता हुं ।"

मोती ने सर को झटका दिया और ख्यालों के समंदर से बाहर निकला । दुकान के बाहर खड़ा एक बच्चा चॉकलेट मांग रहा था ।

शाम को करीब पांच बजे छगन आया । हाथ में कुछ कागजात थे और साथ में पटवारी और वकील साब भी थे। छगन ने जो कहा उसे सुनके तो मोती के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी ।

"भाईजी, अब समय आ गया है की हम अपने पिताजी की संपत्ति का बंटवारा कर लें ताकि बाद में बच्चे आपस में ना झगड़े । मैंने पटवारी जी से नक्शा बनवा लिया है । आप भी देख लें।"

मोती ने नक्शा देखा तो उसमें उसकी आधी दूकान भाई के हिस्से में जा रही थी, और जो बचती वो इतनी नहीं थी कि उसमें वो अपना छोटा सा कारोबार ठीक से कर पाता । घर भी छोटा सा हो जाता। बच्चे बड़े हो रहे थे । उनकी शादी के बाद तो समस्या हो जायेगी । मोती टूट सा गया ।


उसकी आँख से आंसू निकल पड़े । जिस भाई को अपने पुत्र की तरह पाला । पिताजी की कमी महसूस ना होने दी, वो ही भाई, जिसके पास किसी चीज की कमी नहीं है, बंटवारे की बात करने आया है ।

"क्या हुआ भाईजी, कागजात सही है ना?"

"तुमने बनवाये हैं तो सही ही होंगे" मोती ने थोड़ा अपने आप को संभाल कर कहा ।

"फिर इन कागजातों पर दस्तखत कर दीजिये, मैंने कर दिए हैं । गवाह के तौर पर वकील साहब और पटवारी जी के भी हस्ताक्षर हैं । आप भी एक बार पढ़कर हस्ताक्षर कर दीजिये ताकि भविष्य में चचेरे भाइयो में कोई अनबन ना हो।"

मोती ने कांपते हाथों से कागजात लिए और जैसे ही कुछ शब्द पढ़े, उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह उठी, उसने कसकर अपने भाई को गले लगाया और फफक फफक कर रो पड़ा ।


खूबसूरत बंटवारा


उस करारनामे में लिखा था "मैं छगन लाल, अपने पूर्ण होशोहवाश में अपनी पैतृक संपत्ति का अपना पूरा हिस्सा, अपने पिता समान बड़े भाई श्री मोती लाल के नाम करता हुं । जिस पर भविष्य में मैं या मेरे बच्चे कोई भी दावा नहीं करेंगे । क्योंकि इसके एवज में मेरे भ्राता मुझे इसकी कीमत से कहीं ज्यादा दे चुके हैं ।"

निचे उसके, वकील और पटवारी के दस्तखत भी थे ।

"ये क्या है पगले, मुझे माफ़ करना छगन, मैं तो कुछ और ही सोच रहा था।" मोती ने रुंधे गले से कहा ।

"कुछ नहीं भाईसाहब, ये तो सिर्फ उस हिसाब का सूद है जो आपने मुझसे कभी नहीं लिया । आप यहां थे इसलिए मुझे यहां की कोई चिंता नहीं रहती थी और आसाम में मैं अपना काम मन से करता था, पैसे जमा करता था, आज मेरे पास आपके द्वारा ही बनवाया हुआ घर है," छगन ने बड़े भाई की आँख के आंसू पोंछे और फिर मुस्कुराते हुए बोला, " अब मकान भी दो और हम भाई भी दो, तो दोनों के हिस्से में एक एक मकान ही आएगा ना भाईजी।"

तभी रसोई में से खिलखिलाने की आवाज आई जहां देवरानी जेठानी चाय बना रही थी । कुछ देर बाद मोती की पत्नी चाय ले कर आई और मोती से कहा "आज छगन ने मंदिर में ग्रह शांति का हवन रखवाया है, बहु ने कल मुझे बताया था लेकिन पता नहीं क्यूं, छगन और इसने मुझे कहा कि आपको नहीं बताऊं।"

खूबसूरत बंटवारा


पत्नी बोले जा रही थी मगर मोती तो सोच रहा था कि आज के इस स्वार्थी समय में बंटवारे का ये रूप भी हो सकता है ।

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Friday, 27 November 2015

जा की रही भावना जैसी - Jaa ki rahi Bhavna Jaisi


जा की रही भावना जैसी - Jaa ki rahi Bhavna Jaisi


दिवाली अभी अभी धूम धड़ाके के साथ गयी थी । हल्की हल्की सर्दी शुरू हो चुकी थी । ठंड की चादर ओढ़े पुना शहर आराम की नींद ले रहा था । मैं वहां पर एक फैक्ट्री में नोकरी करता था । उसी ठंड में हम जैसे नोकरीपैशा लोग परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने अपने अपने काम पर निकलते थे ।

आज सर्दी कुछ ज्यादा ही थी और कडाके की ठंड के कारण काम पर जाने का मेरा मन नहीं था । पर क्या करें, मजबूरी थी । काम पर नहीं जाएंगे तो पैसे कहां से मिलेंगे, जो आज जीवन की सबसे बड़ी जरुरत है । खैर गर्मी प्रदान करने वाली स्वेटर और उसके ऊपर जेकेट, हाथों में ऊनी दस्ताने और सर पर हेलमेट पहनकर घर से निकला ।

जा की रही भावना जैसी

मोटरसाईकल स्टार्ट कर अपने फैक्ट्री की ओर निकल पड़ा । मन तो चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था, " जा.... जाकर रजाई ओढ़ कर सो जा..... आज के दिन आराम कर" । पर क्या करें जिंदगी की जंग लड़ने के लिए अर्थोपार्जन करना भी अत्यंत आवश्यक है ।



उस वक्त सुबह के पांच साढे पांच का समय था । वैसे तो इतने सवेरे रास्ते पर कुछ गिने चुने लोग ही होते है । लेकिन आज सुबह सुबह सड़क पर काफी चहल पहल थी । पुलिस भी जगह जगह पर खडी थी ।

थोडी दूर और चला तो कानों में कुछ हल्की हल्की आवाजें सुनाई दी । कुछ समझ पाता तभी एक हवालदार ने मुझे रोककर कहा, "भाई, यह रास्ता आज बंद है." मेरे द्वारा कारण पूछने पर उसने बताया, "अरे भाई, तुम्हे पता नहीं क्या? आज यहां से दिंडी यात्रा जाने वाली है"।

दिंडी, महाराष्ट्र की एक पदयात्रा है जो सदियों से चलती आ रही है। हर साल आषाढ एवं कार्तिक एकादशी के दिन महाराष्ट्र के कोने-कोने सेे हजारों श्रद्धालु भगवान् विठ्ठल की भक्ति से ओतप्रोत अपना काम-धाम, घर परिवार को छोड़, अपने प्रिय भगवान विठ्ठल को मिलने मीलों दूर से पंढरपुर पहुंचते है ।

यह पदयात्रा कई दिन चलती है । जिसमें गांव गांव से आकर लोग जुड़ते जाते है, और हर रात किसी गांव में आराम करने के लिए इन भक्तों की टोली रुक जाती है । जिस गांव में भी ये रुकते है, उस गांव के गांववासी इनके भोजन पानी की व्यवस्था निस्वार्थ भाव से करते है ।

जा की रही भावना जैसी

दिंडी में शामिल होने वाले भक्तों को वारकरी कहते है । वारी यानि यात्रा और वारकरी यानि यात्रा करनेवाले । ये वारकरी, समाज के हर तबके से होते है । इनमें ना उंचनीच का भेदभाव, ना अमीरी गरीबी का फर्क और ना ही बच्चों बूढों का अंतर । हर कोई एक समान । हर किसी के मन में बस अपने भगवान विट्ठल से मिलने की चाह ।

भूख प्यास भुलाकर बस सब अपने विठ्ठल, पांडुरंग को स्मरण करते रहते है । और थका देने वाली पदयात्रा के बावजूद लाखों भक्त पंढरपुर पहुंचते है ।

भगवान है या नही, यह गूढ विषय है । हर कोई अपने अपने हिसाब से तर्क देते हैं । कोई पत्थर में भी भगवान को देखता है, तो कोई इन्सानों में । सभी की भावनाओं का आदर करना हम सबका कर्तव्य है । कई लोग इसे अंधविश्वास का नाम देते है, उनका तर्क होता है कि मीलों पैदल चलने से थोडी कोई भगवान मिलते है । परंतु मेरा अपना विचार है कि इन वारकरीओं को भगवान उनकी दिंडी में ही मिल जाते है । तभी तो प्रत्येक वर्ष ये ही दृश्य देखने को मिलता है ।

दिंडी में जब कई सक्षम अमीर व्यक्ति इन यात्रियों की सेवा करते है, कई सारे लोग जातपांत का भेद मिटाकर साथ में बैठकर भोजन करते हैं । ये भगवान की लीला नहीं तो और क्या है? जो अनेक रूपों में अपने भक्तों का कष्ट मिटाने तत्पर खड़े रहते हैं ।

इन वारकरीओं में ज्यादातर किसान होते है । हल जिनकी मंजिरा है तो बैलों के गले के घुंघरू भक्तीसंगीत है ।
गले में तुलसी माला और होंठों पर " विठ्ठल नाम." । दिंडी उनके लिए किसी उत्सव से कम नही होती ।





खैर, हवालदार ने जब दिंडी के वजह से रास्ता बंद है कहा तो मैं सोच में पड़ गया । पुना शहर मेरे लिए नया था । वहां के रास्तों से पुरी तरह से अनजान । क्या करुं, कुछ समझ में नही आ रहा था ।

तभी थोड़ी दुरी पर चाय का एक ठेला नजर आया । सोचा ठंड में एक कप चाय पीकर कुछ विचार करु ।

जा की रही भावना जैसी


गरमागरम चाय का प्याला हाथ में लिया ही था कि तभी एक बुजुर्ग पर मेरा ध्यान गया । ठंड से कांपते करीब सत्तर वर्षीय उस वृद्ध से मानवता के नाते मैंने पूछ लिया, ,"चाचा चाय लोगे?" बुजुर्ग ने गर्दन हिलाकर हां में जवाब दिया ।

चाय का घूंट भरते हुए मैंने फिर पुछा, "क्यों चाचा दिंडी में शामिल हो क्या? कहां से आ रहे हो?"

कांपते हुए बुजुर्ग बोला," हाँ बेटा, नासिक से आया हूं । विट्ठल दर्शन करने पंढरपूर जाऊँगा"।

मै अचरज से उन्हे देखते बोला ,"चाचा..... इस उम्र में आप दो सौ किलोमीटर पैदल चल कर आ रहे हो,  और आगे और भी  डेढ सौ किलोमीटर जाओगे ?"

" बेटा पिछले पचास सालों से, बिना चुके, हर साल ये दिंडी मै करता आया हूं, और जब तक जीवन है करता रहूंगा ।"

"परंतु चाचा अब तो आपकी काफी उम्र हो गयी है । क्या जरुरत है इतने कष्ट उठाने की?" मैने बुजुर्ग को कांपते देख अपना जैकिट उनको देते हुए कहां."इसे रख लीजीए । बहुत ठंड है.। और ये कुछ पैसे भी ।" मैंने उन्हें तीन सो रुपये भी दिए जो उन्होंने मेरे जोर देने पर रख लिए ।

फिर बोले "बेटा, हमें इतना कुछ देनेवाले भगवान के लिए हम इतना तो कर ही सकते है । और अपना विठ्ठल तो ऐसा दयालु है, जिन्हें भक्त प्रेम से विठूमाऊली भी पुकारते हैं । (माऊली का मतलब होता है माँ) तो माँ से मिलने तो बेटा किसी भी हाल में जा सकता है ना."

यह कहकर बुजुर्ग चलने लगे । मैने जाते जाते उन्हे फिर एक सवाल पूछ लिया "चाचा, इतने सालों से, विट्ठल दरबार, पंढरपुर जा रहे हो, क्या आपको कभी भगवान मिले ?"

चाचा ने हँसकर मेरे दिए जैकिट को हिलाया और बोले "मैं जब नासिक से निकला तो इतनी ठण्ड नहीं थी, इस वजह से गर्म कपडे लेने का मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कुछ पैसे साथ में लाया था उनसे एक स्वेटर रस्ते में ख़रीदा था, मगर वो भी मुझे मुझ से ज्यादा किसी और जरूरतमंद को देना पड़ गया । क्योंकि उसको उस स्वेटर की मेरे से ज्यादा जरुरत थी ।"

जा की रही भावना जैसी

फिर उन्होंने उन तीन सो रुपयों को हाथ ऊँचा कर के दिखाते हुए कहा,  "मेरा विठ्ठल मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ता,  हर मुसीबत में मिल ही जाता है." यह कहकर चाचा फिर से दिंडी में घुल मिल गए ।

मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए थे । मैं कभी भी अपने साथ सो पचास रुपये से ज्यादा नहीं रखा करता था । क्योंकि जरुरत भी नहीं थी । मगर आज मेरी जेब में कल की मिली हुयी पगार ज्यों की त्यों थी, जो मैं घर में देना भूल गया था और घर पर भी किसी ने तनख्वाह के बारे में नहीं पूछा था ।

चाचा को दूर जाते हुए देखते देखते मैं यही सोच रहा था "शायद मुझे भी मेरा विठ्ठल मिल गया था, जिसे मैं ही नहीं पहचान पाया ।"

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लेखक : प्रदीप माने "आभाष"










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शिव शर्मा

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Thursday, 26 November 2015

और मुम्बई रो पड़ी - Aur Mumbai ro padi

और मुम्बई रो पड़ी - Aur Mumbai ro padi


आज से ठीक सात वर्ष पहले आज ही के दिन दहशतगर्दो ने मुम्बई को खून के आंसू रुलाया था । हमेशा भागती रहने वाली मुम्बई नगरी थम सी गयी थी । लगभग तीन दिनों तक पूरी मुम्बई सहमी हुयी सी थी ।

समुद्री रास्ते से करीबन दस आतंकी आधुनिक हथियारों से लेस पड़ोसी मुल्क की धरती से आये थे । छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर जिन्होंने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर कितनी मासूम जानें ली थी । कितने घर उजाड़ डाले थे ।

शाम के समय लोग अपना काम ख़त्म कर घर जाने की तैयारी कर रहे थे । कितनी माएं अपने बेटे की प्रतीक्षा कर रही होगी । किसी पत्नी ने अपने पति का मनपसंद खाना बना कर रखा होगा । कोई मम्मी अपने बच्चे की चिंता में ऑफिस से जल्दी निकली होगी । कोई बेटा सुबह आते समय अपने बीमार बाप के लिए दवा लाने का कह के आया होगा ।

चंद ही पलों में सारे वादे, सारी प्रतिक्षाएं धरी रह गयी थी । मौत के सौदागर बन के आये उन मानवता के दुश्मनों के हाथों, जिन्हें अपने आकाओं का आदेश था कि जो सामने आये बस मार डालो ।


मौत का ये खुनी नंगा नाच सिर्फ इस रेलवे स्टेशन पर ही नहीं हो रहा था । यहां से कुछ दूर एक केफे में भी इनके अन्य साथी निर्दोषों पर गोलियां बरस रहे थे । दस के दस आतंकी अलग अलग जगहों पर मौत का तांडव कर रहे थे जिनमे प्रमुख शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस और ताज होटल थे । इस खुनी तांडव में कुल मिलकर 160 से ज्यादा देशी विदेशी बेगुनाह मारे गए थे ।

उन तीन दिनों में इस हमले ने आम नागरिकों के अलावा कुछ पुलिस कर्मियों की भी बली ली थी । श्री हेमंत करकरे, श्री अशोक मारूति राव काम्टे, श्री विजय सालस्कर, श्री अरूण चिट्टे समेत कुल 17 पुलिस कर्मी शहीद हुए थे ।

इन देशभक्त जांबाजों ने जो किया उसको चंद शब्दों में बांधना मुश्किल है । उनको तो श्रद्धा और सम्मान के साथ नमन करता हूँ जिनके लिए उस दिन पूरी मुम्बई रो पड़ी थी ।

एकमात्र जिंदा पकड़े गए आतंकवादी कसाब के बयानों के अनुसार इस हमले का तानाबाना सीमापार पाकिस्तान की जमीन पर बुना गया था, लेकिन उसी पाकिस्तान ने बाद में मारे गए आतंकियों की लाशों को, लेना तो दूर, पहचानने से इनकार कर दिया था । कसाब को भी 21 नवम्बर 2012 को उसके गुनाहों की सजा के तौर पर फाँसी के फंदे पर झुलना पड़ा था ।

अभी कुछ दिन पूर्व पेरिस में भी मुम्बई की तरह का ही हमला हुआ । यहां भी सैंकड़ो निरपराध लोगों की जान गयी थी ।

समझ में नहीं आता कि आखिर चाहते क्या है ये आतंकवादी । इनका लक्ष्य क्या है । क्या यही कि जो भी सामने आये उसे मार डालो । क्या मिलता है इन्हें बेगुनाहों का खून बहाकर ?

जरा सोचिये, क्या बीतती होगी उस माँ के दिल पर, जिसका बेटा अपनी शादी की खरीददारी करने बाजार जाता है और इन गोलियों का शिकार हो कर वापस ही नहीं आ पाता । वो बहन तो ताउम्र अपने आपको कोसती रहेगी जिसने भैया को जिद्द करके अपने लिए आइसक्रीम लेने भेजा होगा ।

उस बाप का क्या जिसने अपने जवान होते बेटे को देखकर भविष्य के लिए ना जाने क्या क्या सपने देखे होंगे । उफ्फ.... । सोच कर ही मस्तिष्क एक अनजाने ख़ौफ़ से दहल जाता है ।

1993 के बम धमाकों, उसके बाद हुए लोकल ट्रेन विस्फोटों का दर्द झेल रही मुम्बई पर हुए उस 26 नवम्बर के हमले की भी आज सातवीं बरसी आ गयी । मुम्बई अपने जख्मों पर मरहम पट्टी भले ही कर चुकी है, लेकिन घाव अभी भरे नहीं है ।

जैसा कि मुम्बई के बारे में प्रसिद्द है कि मुम्बई कभी नहीं थमती, चलती ही रहती है । इस हादसे को भी अपने सीने में दफ़न कर मुम्बई ने अपनी रफ़्तार वापस पकड़ ली थी । लेकिन इस हमले का दिया हुआ दर्द एक लंबे समय तक पीड़ा तो देता ही रहेगा ।

उधर पड़ोसी देश को सैंकड़ो प्रमाण देने के बावजूद इस खुनी खेल की व्यूहरचना रचने वाले अभी भी वहां बैठे दावतें कर रहे हैं, और मुम्बई सिसक रही है न्याय की तलाश में । पता नहीं ये तलाश कब पूरी होगी । पता नहीं अपनी मुम्बई को कब इंसाफ मिलेगा ।

मुम्बई के जज्बे को सलाम ।

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...शिव शर्मा की कलम से...


















Wednesday, 25 November 2015

सेहत के शत्रु - Sehat ke Shatru


सेहत के शत्रु - Sehat ke Shatru

Health problems due to Air and Water Pollution.


बहुत पुरानी कहावत है "पहला सुख निरोगी काया ।" शत प्रतिशत सत्य भी है । अगर शरीर स्वस्थ है तो ही संसार के अन्य सुखों को भोगा जा सकता है । जिसका पेट ख़राब हो उसके लिए तो छप्पन भोग भी बेकार है ।

लेकिन अगर दवा ही मर्ज बन जाए तब आदमी क्या करे?  हवा, पानी और भोजन, जो शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है, आज बुरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं । जहरीली गैसों और धुल मिश्रित हवा में हम सांस लेने को मजबूर हैं ।

बड़े शहरों में तो स्तिथि और भी भयानक है, जहाँ असंख्य मोटर गाड़ियां वायु प्रदुषण के साथ साथ ध्वनि प्रदुषण मुफ़्त में प्रदान करती है । कारखानों का जहरीला धुंआ हवा में अदृश्य दानव के रूप में छुपा रहता है । सुबह से शाम तक ना जाने कितनी सीसा मिश्रित हवा नाक के रास्ते शरीर में घुल जाती है।

ये हवा सांस के साथ मानव शरीर में जा कर फेफड़ों को क्षति पहुंचाती है और दमा एवं टी बी जैसी बीमारियां देती है । ऊपर से कुछ "निडर वीर" इन फेफड़ों को उपहार स्वरुप बीड़ी सिगरेट के धुंए से भी निहाल करते रहते हैं ।

इन्ही वायु प्रदुषण फ़ैलाने वाले कारखानों का अपशिष्ट जब शहर के नालों से होता हुआ नदियों के जल में मिल जाता है तो अमृत तुल्य जल भी एक विष बन जाता है । उस अपशिष्ट के साथ मिले हुए तरह तरह के रसायन पानी के गुणों को नष्ट करने के लिए काफी होते हैं ।

सेहत के शत्रु


ये दूषित पानी हमारे शरीर को कितना नुकसान पहुंचाता है इसका प्रमाण तरह तरह की पेट और आंतों संबंधी बीमारियां दे ही रही है ।

शायद यही कारण है कि आज पानी भी बंद बोतलों में बिक रहा है । अब वो शुद्ध कितना है ये या तो ईश्वर जानता है, या उसको उपलब्ध करवाने वाले निर्माता । परंतु आप और हम उस पानी को गंगाजल जैसा मान देकर खरीदते हैं और पीते हैं ।

इसी प्रदूषित पानी से खेतों में सिंचाई होती है । बरसात का पानी भी अपने साथ हवा में फैले धुल और धुंए के कणों को लेकर बरसता है । उन्ही खेतों से हमें गेंहू, चावल, फल, सब्जियां इत्यादि मिलती है जो जाहिर सी बात है अपने गुणों के साथ साथ कई प्रकार के धीमे जहरों से भी परिपूर्ण होती है ।

ऊपर से कोढ़ में खाज का काम करती है फसलों की पैदावार बढ़ाने वाली दवाइयाँ । जिनसे फसल तो अच्छी खासी मिल जाती है किसान को, लेकिन वे अन्न, दालें, फल या सब्जियां अपने अधिकतम पोषक तत्वों से नाता तोड़ चुके होते हैं ।

सेहत के शत्रु

उपरोक्त समस्याओं से हम काफी हद तक पार भी पा सकते हैं । अगर रोज नियमानुसार सुबह टहलने की आदत डालें और भोर की ताजा हवा अपने फेफड़ों में जाने दें । धूम्रपान की आदत अगर है तो छोड़ें ।

पानी उबालकर और छानकर पियें । बाजार में बिकने वाले और टीवी पर विज्ञापन दिखा कर अपनी और आकर्षित करने वाले ठन्डे पेय पिने से बचें । खाना जहाँ तक हो सके घर का ही खाएं । दूध घी साथ में हो तो सोने पे सुहागा ।




प्रदूषित खानपान जैसे इन स्वास्थ्य के दुश्मनों के अलावा जो हमारी सेहत का सबसे बड़ा शत्रु है, वो है 'चिंता' । हर आदमी को किसी ना किसी प्रकार की चिंता लगी ही रहती है ।

नाना प्रकार की चिंताएं सुरसा के मुंह की तरह फैली हुयी है । जिनमें से कुछेक हो सकती है की किसी कारण वश हो । लेकिन आप अगर गौर करें तो अधिकतर चिंताएं अकारण ही होती है, जो वास्तव में होती नहीं है, बस "कर ली" जाती है ।

इन "कर लेने वाली" चिंताओं से बचने का एक बहुत ही सरल उपाय है, "जो होगा देखा जाएगा" नामक छोटा सा वाक्य । आप तो बस मस्त रहें और स्वस्थ रहें ।

सेहत के शत्रु

गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी कहा था ।

"तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोय,
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होय ।"

इन्हीं शब्दों के साथ आज आपसे विदा लेता हूँ। कल फिर मिलेंगे ।

Click here to read "मौत का भय" by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

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Tuesday, 24 November 2015

बधाइयां - Badhaiyan / Congratulations


बधाइयां - Badhaiyan / Congratulations


बधाई हो, Conratulations, सुनते ही मन का मयूर नाच उठता है । बहुत सी जगह पर ये उर्जादायक शब्द सुनने को मिल सकता है, कारण कुछ भी हो,  लेकिन परिणाम एक ही होता है, बहुत से चेहरों पर मुस्कुराहट औरआँखों में ख़ुशी के आंसू ।

मेरे एक दोस्त दीपक की बात आपको बताता हुं, जो उसने मुझे बतायी थी । काफी समय से वो आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था । वर्तमान कंपनी में, जहाँ वो 5-6 वर्षों से काम कर रहा था, बेचारे को वो तनख्वाह नहीं मिल रही थी जिसके काबिल वो था । खर्चे दिन ब दिन बढ़ रहे थे मगर कमाई उस अनुपात में नहीं बढ़ रही थी ।

एक दिन अपने किसी मित्र की सलाह से वो अफ़्रीकी देशों में कर्मचारी उपलब्ध करवाने वाली कंपनी में साक्षात्कार के लिए गया था । उसका साक्षात्कार सफल रहा, क्योंकि काम का जानकार और अनुभवी प्रत्याशी था । उसने जो बताया वो सुनकर मैंने भी उसे बधाई दी ।

"बधाई हो दीपकजी, आप हमारे तंजानिया स्तिथ कार्यालय के लिए चुन लिये गए हैं।" साक्षात्कार लेने वाले महोदय के मुंह से ये सुनकर दीपक का मन अचानक ही वसंत के फूलों की तरह खिल उठा था । वर्तमान तनख्वाह से लगभग तीन गुना तनख्वाह मिलेगी जानकार तो दीपक जागते में सपने देखने लगा था ।

घर आकर उसने ख़ुशी ख़ुशी अपनी पत्नी को सारी बात बताई तो उसकी पत्नी तो मारे ख़ुशी के रो ही पड़ी थी । थोडा संभलने के बाद उसने दीपक से दो ही शब्द कहे "बधाई हो"।



कोई पति ऑपरेशन थिएटर के बाहर पत्नी के लिए चिंतित अवस्था में बैठा अनेकों तरह के विचार अपने मस्तिष्क में ले आता है । लेकिन जब नर्स बाहर आकर कहती है "बधाई हो भैयाजी, जुड़वां बच्चे हुए है, एक मुन्ना एक मुन्नी।" सच में वो क्षण उसके लिए असीम आनंद के क्षण होते हैं ।

बच्चों के स्कूल से फोन आये और उधर से ये बताया जाए कि "बधाई हो जी, आपका बच्चा उत्तीर्ण हो गया है" या "आपके बच्चे ने इस प्रतियोगिता में फलां स्थान प्राप्त किया है" सुनकर माता पिता अपने आप को कितना गौरवान्वित महसूस करते हैं ।

किसी भी प्रकार की खुशखबर कोई अगर आपको नींद से जगाकर भी दे, और हो सकता है आपके साथ ऐसा हुआ भी हो, तो भी आप ख़ुशी से नाच उठते हैं, और मुंह से ये ही निकलता है "बधाई हो।"

"बधाई हो" की सीमाएं अनंत है । ऐसा नहीं है कि किसी की सगाई होने पर, परीक्षा में पास होने पर, नोकरी में चयन होने, शादी या संतान होने पर ही बधाई दी जाए । ये तो किसी भी मौके पर दी और ली जा सकती है चाहे उस घटना से हमारा सीधा सम्बन्ध ना भी हो ।

खेल प्रेमी भारतीय टीम के जीतने पर एक दूसरे को बधाई देते हैं । हमारे जवानों द्वारा किसी खूंखार आतंकी या देश के दुश्मन को मार गिराने पर भी इस बधाई का आदान प्रदान होता है ।

जन्मदिन की बधाइयां तो हर दूसरे तीसरे दिन बंटती है । कोई लंबे कार्यकाल के बाद सेवानिवृत हो रहा हो तो भी बधाइयां दी जाती है । घर में कोई नयी वस्तु लाई जाए तो बधाई हो के स्वर गूंज उठते हैं ।

क्योंकि ये छोटा सा शब्द "बधाई हो" अपने आप में इतनी भावनाएं छुपाये हुए है की देने और लेने वाले दोनों को एक शीतल ठंडक का एहसास कराता है ।

मैदान में जीतने वाले खिलाड़ियों या सीमा पर देश की रक्षा करते जवानों तक हमारी आवाज पहुंचे या ना पहुंचे मगर इस "बधाई हो" वाली भावनाओं की आवाज उन्हें अवश्य सुनाई दे जाती है ।

ये छोटा सा शब्द हर किसी में एक नयी ऊर्जा का संचार कर देता है । इसलिए दोस्तों हर मौके पर हर पल किसी न किसी को बधाई हो कहते रहो । जवाब में आपको भी जरूर सुनने को मिलेगा "बधाई हो"।

चलते चलते आप सबको नव वर्ष की अग्रिम बधाई ।

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जय हिन्द

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Monday, 23 November 2015

बारात का आनंद - Baraat ka Anand

बारात का आनंद - Baraat ka Anand


"भेज रहे हैं स्नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल ना जाना आने को"

पढ़ते पढ़ते चम्पकजी की के चेहरे पर चमक आ गयी और आँखों से ख़ुशी के दो अश्रु टपक पड़े । कितने दिन हो गए थे, किसी बारात में गए हुए ।

बार बार उन्होंने उस मनुहार पत्रिका पर तारीख और समय देख कर याद कर लिया । हळद हाथ, बान या पाणिग्रहण संस्कार के समयों से जैसे उन्हें कोई मतलब ही नहीं था ।

"बारात ठीक तीन बजे अतिथि भवन से बस द्वारा अजमेर के लिए रवाना होगी ।" पढ़कर चम्पक जी ने मन ही मन निर्णय ले लिया था की मैं तो दो बजे ही पहुँच जाऊंगा । बस में खिड़की वाली सीट रोक कर बैठूंगा ।

तीन दिन बाकि थे । चम्पक जी ने बारात में जाने की तैयारी अभी से शुरू करदी । खुद अपने हाथों से बारात और ढूकाव में पहनने वाले कपड़े धो के इस्री कर लिए ।

चम्पकजी खाने के बड़े शौकीन थे और शादियों में बरातियों को तो तरह तरह के पकवान खाने को मिलते हैं इस वजह से बारात का नाम सुनकर ही उनका लहू उबाल मारने लगता था ।

उस दिन वो दो की बजाय एक बजे ही अतिथि भवन पहुँच गए । हालांकि अभी तक तो बस भी नहीं आई थी । मेजबान अपने कामों में लगे थे । चम्पकजी भी एक कुर्सी पर विराजमान हो गए । वे सबसे पहले पहुंचने वाले बाराती बन गए थे ।



करीब अढ़ाई बजे बारात में जाने वाले अन्य मेहमान आने शुरू हुए । किसी ने बताया की बस भी कुछ देर में पहुंचने वाली है । सुनकर चंपकजी के कानों में जैसे मधुर स्वरलहरी बज उठी ।

आखिर ठीक तीन बजे बस आई । तब तक प्रायः सारे बाराती भी आ चुके थे । चम्पकजी तो इसी हसीन वक्त के इंतजार में थे, भागकर बस में चढ़े और आगे वाली खिड़की के पास वाली सीट पर जा के बैठ गए ।

धीरे धीरे बस लगभग पूरी भर गयी । पीछे की दो चार सीट अभी भी खाली थी । साढ़े तीन बज चुके थे, चम्पकजी बेचैन हो रहे थे की कब ये अजमेर के लिए रवाना होगी । कुछ देर बाद दूल्हे के दादाजी आये और ड्राईवर को चलने के लिए बोला और चम्पकजी को आगे की सीट पर बैठे देख कर कहा "अरे चम्पक, इस सीट पर मत बैठ, खाली कर दे इसको । ये सीट देवी देवताओं की है ।"

चम्पकजी तो हक्काबक्का हो गए पर बाकि बरातियों ने भी जब दादाजी की हाँ में हाँ मिलाई तो मजबूरन उन्हें पीछे वाली सीट पर आकर बैठना पड़ा जहां खिड़की वाली सीट तो बच्चों ने पहले से कब्ज़ा रखी थी । फिर तो पुरे रास्ते चंपकजी पिछली सीट पर उछलते गिरते से अजमेर पहुंचे ।

आते ही उन्होंने अपनी उछलन भरी यात्रा को भुलाकर बारात ठहराव स्थल का जायजा लिया । नाई कहाँ बैठा है । बूट पॉलिश वाला किस कोने में है । फिर जमकर नाश्ता उड़ाने के बाद उन्होंने अपने जूतों की पोलिश करवाई और बनी हुयी दाढ़ी को फिर से बनवाया । आखिर बाराती जो थे ।

तब तक ढुकाव का समय हो चूका था । बैंड वाले "ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े" की धुन बजा रहे थे । विश्राम स्थल से ढुकाव निकला, दूल्हे के भाई और कुछ दोस्त बिना नाचने वाली धुन पर भी आड़ा टेढ़ा नाच नाच रहे थे । लेकिन चंपकजी का मन तो खाने की स्टाल के सपने देख रहा था ।

विवाह स्थल तक लगभग एक घंटे बाद बारात पहुंची । बाराती अंदर विवाह भवन में आ गए । चंपकजी भी । वरमाला का कार्यक्रम चल रहा था तब बाकि सब लोग सूखे मेवों का आनंद उठा रहे थे ।

खाने के स्टॉल पीछे शामियाने में लगे हैं, चम्पकजी के लिए अति महत्वपूर्ण ये जानकारी अभी अभी, पीछे वाली कुर्सी पर बैठे सज्जन जब अपने साथी को बता रहे थे, तब मिली । फिर तो चंपकजी धीरे से खड़े हुए और अपनी बेल्ट और पेंट को दुरुश्त करने के बाद निकल पड़े अपने चहेते पड़ाव की तरफ ।

बाप रे बाप ! इतने सारे तरह तरह के स्टाल ...... देखकर चंपकजी चकरा गए । लेकिन उनको तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गयी थी । खूब छक कर उन्होंने पानी पूरी, आलू चाट, डोसे, जलेबियों, और अन्य व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया । पेट गले तक भर चूका था लेकिन मन नहीं भरा ।

रात को बारह एक बजे बस वापस जायेगी । ये बात आते वक्त ही दूल्हे के दादाजी बता चुके थे और इस वक्त साढ़े बारह बज रही थी । चंपकजी भी अन्य बारातियो के साथ बस में बैठ चुके थे । इस बार उन्हें उनकी मनपसंद सीट भी मिल गयी थी ।

अगली सुबह चंपक जी दवा की दूकान पर दिखाई दिए । उनके हाथ में हाजमोला की एक शीशी और दस्त रोकने वाली दवा देखकर मैनें युं ही पूछ लिया, "क्या चम्पकजी, फिर कोई बारात में गए थे क्या?" 😊

Click here to read very interesting blog "हर मर्ज की दवा हंसी - Har marj ki dawa hasi" by Sri Shiv Sharma

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Sunday, 22 November 2015

कुछ तो लोग कहेंगे - Kuchh to log Kahenge

कुछ तो लोग कहेंगे - Kuchh to log Kahenge


"कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना । छोड़ो बेकार की बातों में, कहीं बीत न जाये रैना ।" अमरप्रेम फिल्म का ये गीत कितनी सच्चाई छुपाये हुए था अपने शब्दों में ।

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना । लेखक ने कुछ ही पंक्तियों में जीवन की हकीकत बयां कर दी । लोग मौका ढूंढ ही लेते हैं कुछ कहने का । यही तो होता आया है सदियों से ।

किसी में कोई बुराई है तो लोग कुछ कहेंगे ही कहेंगे, लेकिन किसी में अच्छाइयां है तो भी कुछ खास किस्म के लोग उसमें कुछ ना कुछ ढूंढ निकालेंगे, कुछ कहने के लिए ।

परीक्षा परिणाम आता है । कुछ विद्यार्थी उत्तीर्ण तो कुछ अनुत्तीर्ण भी हो जाते हैं । अब जो अनुत्तीर्ण हो गए उनकी तो शामत आ जाती है कहने वाले लोगों की सुन सुन कर । परंतु जो उत्तीर्ण हुए हैं उनको भी "कुछ तो लोग कहेंगे"।

"क्या रे श्याम, पास हो गया, कितने अंक आये?"

"जी हां चाचाजी, 70 प्रतिशत अंक आये"।

"बस्स्सस्स, 70.... दीनू के तो 78 प्रतिशत आये"

"चाचाजी दीनू पांचवीं कक्षा में था और मैंने दसवीं की परीक्षा दी थी"

"तो क्या हुआ, प्रतिशत तो प्रतिशत ही होते हैं।"




श्याम बेचारा निरुत्तर होकर "अच्छा चाचाजी प्रणाम, चलता हुं," कहकर वहां से खिसक लिया ।

लगभग इसी तरह की मिलती जुलती बातें देख सुनकर हमारे अंदर भी ये डर गहरे तक बैठ जाता है "लोग क्या कहेंगे"। इसके चलते हम बहुत से कार्य शुरू करने से पहले ही रद्द भी कर देते हैं । और जीवन भर जूझते रहते हैं फिर एक समय ऐसा आता है जब हमें लगता है की, उस वक्त, अगर थोड़ा साहस कर लेता तो आज जीवन की तस्वीर शायद कुछ और होती । लेकिन इस डर की वजह से कदम पीछे खिंच लिए थे कि कहीं असफल हो गया तो लोग क्या कहेंगे ।

आप सफल लोगों के बारे में पढ़िए । उनमें प्रायः सभी या अधिकतर वो लोग है जिन्होंने इस बात पर तवज्जो ही नहीं दी कि लोग क्या कहेंगे । वे तो बस अपनी धुन में जो उनको सही लगा वो करते गए और उन्होंने वो पाया जो वो पाना चाहते थे ।

लोग क्या कहेंगे का भूत हम लोगों के सर पर ऐसा चढ़ जाता है कि हम कई जगह अपने मन की इच्छाओं को भी मार लेते हैं । कमाल है..... लोग क्या कहेंगे ये सोचकर क्या आप अपने दिल की भी नहीं सुनेंगे । आपका दिल अगर नाचने को कर रहा है तो नाचिये ना । लोगों का क्या है, लोगों का तो काम ही है कहना ।

जो व्यक्ति इस डर से ऊपर उठ जाता है, उसके पास अगर कुछ नहीं भी है तो भी बहुत कुछ है । क्या हुआ अगर उसके पास मोटर गाड़ी नहीं है । साईकिल तो है, पेट्रोल भी नहीं लगता और कसरत भी हो जाती है । घर में फ्रिज नहीं है तो क्या हुआ, मटके का पानी भी ठंडा और स्वादिष्ट होता है । अब लोग कहते हैं तो कहते रहे कि इसके घर में फ्रिज नहीं है । वो बंदा तो मटके का पानी पी के अपने आप में मस्त है ना ।

इसी के उल्टे अगर किसी के पास फ्रिज है, तो वो "कथित लोग" कहेंगे, "फ्रिज का पानी नहीं पीना चाहिए, स्वास्थ्य के लिए ख़राब होता है । आप मटका क्यूं नहीं रखते? उसमें भी पानी ठंडा रहता है और तबियत भी नहीं बिगाड़ता ।"

उसी कहानी की तरह जो मैंने वर्षों पहले पढ़ी थी कि एक गाँव में दूध की एक डेयरी थी । वो गाय का शुद्ध दूध बेचते थे । दुकान के बाहर एक पट्टिका लगी हुयी थी "यहां गाय का ताजा दूध मिलता है"।

एक दिन कोई "रायचंद" आया उसने कहा कि जब आप गाय का ही दूध बेचते है तो पट्टिका पर इतनी लंबी सुचना लिखने का क्या मतलब । इतना लिखना ही काफी होगा " ताजा दूध मिलता है"।

इसी तरह एक अन्य बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा ताजा दूध मिलता है लिखने की क्या जरुरत है, आप बासी दूध तो बेचते नहीं हो, इसलिए इतना लिखना ही बहुत होगा की दूध मिलता है ।

बाद में एक अन्य गुणी व्यक्ति ने कहा की दूध की दुकान पर तो दूध ही मिलेगा, लिखने की क्या जरुरत है? तो बेचारे डेयरी मालिक ने वो पट्टिका ही उतार दी ।

कुछ दिन पश्चात एक और विद्वान आये और उनसे कहा "भाई साहब, आप इतना अच्छी गुणवत्ता वाला दूध बेचते हो । आसपास के गाँवों में भी आपकी प्रशंशा होती है । तो दूकान के बाहर एक सुचना पट्टिका क्यों नहीं लगवा लेते की " "यहां गाय का ताजा दूध मिलता है"।"

ये ही हाल हर जगह है । कहने वाले लोगों की कमी नहीं है संसार में । इस लोग क्या कहेंगे के डर को दिल से निकाल फेंकिए दोस्तों और जो भी आपको उचित लगे एवं वो आपके, आपके परिवार और समाज के हित में हो तो आगे बढिए । आप अवश्य ही अपनी एक पहचान बना लेंगे । लोगों की परवाह मत कीजिये,

क्योंकि

"कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना"

Clck here to read फुरसत की घड़ियां -  Fursat ki Ghadiya by Sri Shiv Sharma

जय हिन्द

Click here to read बेटियां - Daughters, by Sri Shiv Sharma

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Saturday, 21 November 2015

समय बड़ा बलवान - Samay Bada Balwan

समय बड़ा बलवान - Samay Bada Balwan




तीन भाइयों और एक बहन में सबसे छोटा सुरेश घर की परिस्थितियों की वजह से ग्यारहवीं तक ही पढ़ पाया था । पिता एक किसान थे और राजस्थान में बरसात की मेहरबानी इतनी ही हो पाती थी की सिर्फ खाने भर की व्यवस्था हो पाती थी । बड़े भाई भी पिता के साथ खेती में उनका हाथ बंटाया करते थे ।

चार कमरों का एक कच्चा मकान पिताजी ने पेट काट काट कर बनवा लिया था तो सर छुपाने को जगह भी थी । संपत्ति के नाम पर वो ही एक टुटा फूटा सा कच्चा मकान और एक बैलगाड़ी थी । जिसमें बैठकर पिताजी और बड़े भैया खेत जाया करते थे और आते समय रेत के टीलों से काटकर उजली बालू रेत उस बैलगाड़ी में भर लाते थे जो मोहल्ले में ही किसी को जरुरत हो तो कुछ पैसों में दे देते थे । उन्ही पैसों और थोड़ी खेत की पैदावार की मदद से घर में चूल्हा जलता रहता था ।

बहन की शादी भी अपने ही स्तर के एक परिवार में हो गयी थी । बहनोई कम ही पढ़े लिखे थे और गाँव (कस्बे से थोड़ा कम) में ही एक राशन की दूकान पर काम करते थे । दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाता था ।

बाकि रिश्तेदारों में कई ऐसे रिश्तेदार भी थे जिन पर देवी लक्ष्मी की असीम अनुकम्पा थी, मगर वो भी इस परिवार को मदद के नाम पर सलाहें ही दिया करते थे । गली मोहल्ले वालों से तो वो गरीब क्या उम्मीद करते ।

इसी वजह से अपनी पढ़ाई छोड़ मंझले भैया पिछले दो वर्षों से मुम्बई में नोकरी कर रहे थे, लेकिन उनकी तनख्वाह इतनी ज्यादा नहीं थी कि घर के हालात कुछ सुधर सके । हां कम से कम अपना खर्चा वो निकाल लेते थे। अभी वो गाँव आये हुए थे और सुरेश को भी अपने साथ मुम्बई ले जाने का मशवरा पिताजी को दे रहे थे ।

"हमारी कंपनी का कपड़े का बहुत बड़ा उद्योग है पिताजी, अभी उनको शहर शहर जा कर अपना व्यापार बढ़ाने हेतु एक विश्वासी और मेहनती आदमी की जरुरत है । तनख्वाह भी अच्छी मिलेगी और ऊपर से कमिशन भी मिलेगा । अपना सुरेश होशियार भी है और मेहनती भी । मैं अपने मालिक से बात कर के आया हुं । इसे इस बार अपने साथ ले जाता हुं ।" अपनी बात ख़त्म करके मंझले भैया पिताजी के जवाब की प्रतीक्षा करने लगे ।

पिताजी ने भी थोड़ा सोचने के बाद हां करदी । सुरेश तो पहले से ही तैयार था । उसे नयी नयी जगहें देखने का बड़ा शौक था और किस्मत से उसी तरह की नोकरी उसे मिल रही थी । बिना खुद के खर्चे से भारत भ्रमण करने में कितना मजा आएगा ये सोच सोच कर वो तो मन ही मन प्रफुल्लित हो रहा था । साथ ही घर में थोड़ी आर्थिक मदद भी हो जायेगी, एक पंथ दो काज ।

निश्चित दिन वो मुम्बई के लिए रवाना हो गए । अगले दिन गाड़ी अहमदाबाद पहुंची और शाम को अहमदाबाद से दूसरी गाड़ी पकड़ के अगली सुबह वे मुम्बई पहुँच गए ।

सपनों की नगरी, मायानगरी मुम्बई । जो चौबीसों घंटे जागती रहती है, भागती रहती है । सुरेश ने एक बार किसी सिनेमा में देखा सूना था मुम्बई के बारे में ।

दस बज चुके थे । दोनों भाई नहा धो के घर से लाये हुए खाद्य पदार्थों का नाश्ता करके ऑफिस आ गए । कुछ देर बाद कंपनी के मालिक भी आ गए और सुरेश का साक्षात्कार ले के उसे मेनेजर से मिलवाया तथा उसी समय से काम शुरू करने को कह दिया ।

शुरू के दो तीन महीने में ही सुरेश ने कपड़े के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली । स्वभाव अच्छा था इसलिए बाकि सबसे भी बड़ी जल्दी घुलमिल गया था और जिस तेजी से काम पकड़ रहा था उस वजह से मेनेजर एवं मालिक भी उस से खुश थे ।


इसी बीच वो अपने सीनियर के साथ आस पास की दो चार जगहों पर भी जा के आया था । अपने सीनियर से उसने सीखा कि खरीददारों से कैसे बात करें, कैसे अपने उत्पाद की गुणवत्ता, उसकी विशेषतायें, उन्हें बता कर अपना कपड़ा उन्हें बेचे ।

चार महीने बाद मेनेजर ने उसे बुलाया और कहा "सुरेश, बैंगलोर जाना है । अकेले चले जाओगे क्या?"

इन चार महीनों में सुरेश में काफी आत्मविश्वास आ चूका था । उसने बिना झिझक हां कह दी ।

 "वहां अपने कुछ ग्राहक पहले से है और कुछ तुम अपनी होशियारी से बनाके आना । एक सप्ताह बाद की तुम्हारी टिकट बनवा देता हुं, ध्यान से जाना और अच्छे अच्छे आर्डर लाना" मेनेजर ने उसकी पीठ थपथपा कर हौसला बढ़ाते हुए कहा ।

शाम को घर आये तो मंझले भैया तो ये सुनकर फुले नहीं समाये थे ।

सुरेश का बैंगलोर का वो पहला दौरा इतना कामयाब रहा कि उसके बाद तो वो कभी चैन्नई, कभी दिल्ली, कभी अहमदाबाद तो कभी कलकत्ता अक्सर दौरों पर ही रहता था । तनख्वाह भी अच्छी खासी हो गयी थी और कमीशन भी तनख्वाह के बराबर या कभी उस से ज्यादा भी हो जाया करता था । मंझले भैया की भी तरक्की हो गयी थी और उनको भी एक अच्छी रकम मिलने लगी थी ।

पुरे बीस महीने बाद सुरेश जब गाँव आया तो घर की हालत काफी सुधर चुकी थी । कच्चे मकान को पलस्तर हो चूका था । हर महीने उनके द्वारा भेजे जाने वाले मनीआर्डर ने बहुत कुछ बदल दिया था । लोगों का व्यवहार भी । सीधे मुंह बात नहीं करने वाले पड़ोसी घर आ आ के हालचाल पूछ रहे थे ।

अगले तीन सालों में दोनों भाइयों ने मुम्बई के पास स्तिथ भिवंडी शहर में किराए पर जगह और मशीनें लेकर अपना खुद का कपड़े का उत्पादन शुरू कर दिया ।

मंझले भैया ने नोकरी छोड़ कर अपने काम पर ध्यान देना शुरू कर दिया । देखते ही देखते तीन वर्षों में ही उनके बनाये कपड़े की भी व्यापारियों में एक पहचान बन गयी, और शनै शनै दोनों भाई मिलकर अपने कारोबार को इस ऊंचाई पर ले गए कि आज उनकी खुद की कपड़े की मिलें है ।

सुरेश के बहनोई मुम्बई से बाहर का कारोबार देखते हैं, राशन की दूकान का उनका अनुभव काम आ रहा है । उसका भांजा पिछले साल ही मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर बन कर निकला है । चार कमरों के घर की जगह एक ऊँची सी हवेली ने ले ली है । मोहल्ले के कई लड़के उसकी मीलों में काम करते हैं ।

बड़े भैया गाँव और पिताजी से दूर नहीं जाना चाहते इसलिए गाँव में ही अपने कपड़ो की दूकान संभालते हैं । तीनों भाई और बड़ी बहन सब अपने परिवार और बच्चों के साथ खुश है ।

सच है की आदमी की मेहनत, लगन, समय और किस्मत सब साथ मिल जाए तो रंक को राजा बनते देर नहीं लगती । दस वर्षो ने ही सुरेश को "सुरेशजी" बना दिया ।

आज भी सुरेश जब भी गाँव आता है तो सबसे प्रेम से मिलता है । उनके सुख दुःख में उनके साथ खड़ा होता है । बच्चों की पढाई, शादी या किसी के बीमार होने में आर्थिक मदद भी करता है । उसका कहना है कि जो तकलीफें मैंने सही अगर मैं किसी और की कम करने में सक्षम हूं तो क्यों ना करुँ ।

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...शिव शर्मा की कलम से...







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Friday, 20 November 2015

चिट्ठी आई है - Chitthi aayi hai



चिट्ठी आई है -  Chitthi aayi hai

 The letter has come.

"पोस्टमैन" खुले दरवाजे की कुण्डी को बजाकर डाकिये ने आवाज दी तो 14 वर्षीय राहुल लगभग दौड़ता सा दरवाजे पर आया । ख़ुशी ख़ुशी चिट्ठी ले कर वहीँ से आवाज लगायी "माँ, भैया की चिट्ठी आई है बम्बई से, आप कल ही कह रही थी ना कि भैया का पत्र आये काफी दिन हो गए"।

बेटे की चिट्ठी हाथ में लेकर पहले तो माँ ने उसे सुंघा, शायद बेटे के हाथों की खुशबु को महसूस कर रही थी । एक चमक सी आ गयी थी उसके चेहरे पर । चिट्ठी को यूं अपने कलेजे से लगाया जैसे वो मात्र एक लिफाफा ना होकर उसका बेटा ही हो ।

चिट्ठी आई है


पत्र पढ़ते पढ़ते कभी मुस्कुराती तो कभी आँखों में नमी ले आती । पहली बार बेटा इतनी दूर जो चला गया था  । अब तो चिट्ठी का ही एक सहारा था एक दूसरे का हालचाल जानने का । चिट्ठी पढ़ते पढ़ते और लिखते लिखते ऐसा लगता था जैसे एक दूसरे से आमने सामने बैठकर बात कर रहे हैं ।



एक दूसरा दृश्य । राधा छत पे कपड़े सुखा रही थी की निचे से उसके देवर शेखर ने आवाज दी । "भाभी भैया का पत्र आया है कलकत्ता से।" सुनकर राधा कपड़े सुखाना छोड़, एक साथ दो दो सीढ़ियाँ लांघती जल्दी से निचे भागी ।

"अरे अरे धीरे भाभी, गिर मत जाना, भैया का पत्र ही आया है, भैया नहीं।" शेखर ने ठिठोली की और मुस्कुराते हुए चिट्ठी राधा को दे दी । "आज तो खाने में हलवा बनेगा" हँसते हुए उसकी छोटी ननद ने भी चुटकी ली ।

विरह की अग्नि में जलती राधा के लिए वो पत्र उसके प्रियतम के मिलन से कम नहीं था । कब से बाट जोह रही थी इसकी । दस दिन पहले उसने पत्र लिखा था पति को और उसी दिन शेखर उसे डाक के डब्बे में भी डाल आया था । फिर क्यूं नहीं अब तक जवाब आया ।


चिट्ठी आई है

पिछले 3-4 दिन से रोज वो अपने देवर से पूछ रही थी, भैया डाकखाने जाके आये थे क्या? शेखर हंसकर कहता "भाभी थोडा सब्र करो, आपकी चिट्ठी को यहाँ से कलकत्ता पहुँचने में चार पांच दिन, और भैया अगर उसी दिन जवाब लिखकर चिट्ठी पोस्ट कर दे तो, आने में चार पांच दिन, यानी आपको कम से कम दस दिन तो प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।"

छह महीने हो गए पिया को परदेश गए हुये । चिट्ठी आती है तो कुछ दिन और गुजर जाते हैं उसके सहारे । तीन चार दिन तो उसकी महक ही नहीं जाती है । फिर अगली चिट्ठी आने तक वो उसे पचासों बार पढ़ लेती थी । पढ़ते पढ़ते अपने पति का मुस्कुराता चेहरा उसे उस कागज़ में से झांकता जो नजर आता था ।

अस्सी नब्बे के दशक में ऐसे दृश्य आम हुआ करते थे । उस वक्त न तो आज की तरह मोबाइल का जमाना था और ना ही फ़ोन की कोई विशेष सुविधा । दूर दराज अगर फ़ोन पर किसी से बात करनी जरुरी होती थी तो घंटों की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी ।

कोई जरुरी सुचना अगर किसी को दूर शहर में शीघ्र पहुंचानी होती थी तो डाकघर से ही तार भेजा जाता था । जो अधिकतम अगले दिन तक सम्बंधित व्यक्ति को मिल जाया करता था । लेकिन वो थोडा खर्चीला था इसलिए साधारणतया चिट्ठी ही एकमात्र सहारा थी समाचारों के आदान प्रदान की ।


चिट्ठी आई है


क्या दिन थे वे भी । मोहल्ले में डाकिया रोज आता था । क्योंकि किसी न किसी के घर चिट्ठी आती ही रहती थी । डाकिये को भी घर घर जाकर चिट्ठी बांटने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी ।

वो प्रायः सबको पहचानता था, सो जिस गली के पते की चिट्ठी होती थी उस गली का कोई न कोई रहिवासी अपने अड़ोसी पड़ोसी की चिट्ठी उस से ले आता था और ख़ुशी ख़ुशी, जिसकी चिट्ठी है उसके घर, पहुंचा दिया करता था । बदले में उसे एक कप चाय या, कभी कभी किसी का ड्राफ्ट आता तो, नाश्ता भी मिल जाता ।


मुझे याद है हमारे मोहल्ले के काफी लोग विदेश (ज्यादातर इराक) भी रहते थे । हमें प्रतीक्षा रहती थी इराक से आने वाली चिट्ठियों की । डाकघर में जब डाकिया बाबू चिट्ठियों की छंटाई कर रहे होते थे तो पत्रों के उस ढेर में हमारी निगाहें लाल नीली धारियों के कोनों वाले लिफ़ाफ़े को तलाशती रहती थी । क्योंकि वो लिफाफा हम जब मोहल्ले में चाची, भाभी या ताई को देते तो वे ख़ुशी से हमें एक दो रुपये देती थी । जिसे हम मित्र आपस में मिल बाँट कर खर्च करते थे । वो ख़ुशी ही अनोखी हुआ करती थी ।

बहुत से हिंदी चलचित्रों में एक आध गाना चिट्ठी पर भी हुआ करता था ।

चिट्ठी आई है

"जाते हो परदेश पिया, जाते ही ख़त लिखना......"।

"फूल तुम्हें भेजा है ख़त में, फूल नहीं मेरा दिल है....."।

"कबूतर जा जा जा, पहले प्यार की पहली चिट्ठी....."।

अब तो इंटरनेट का युग आ गया है । पलक झपकते ही सन्देश इधर से उधर हो जाते हैं । इ मेल, चैट इत्यादि कितने साधन हो गए हैं । इधर मोबाइल में नंबर दबाओ, तुरंत उधर घंटी बज उठती है । सिनेमाओं के गाने भी बदल गए हैं, अब तो नायक नायिका से ये ही पूछता है "व्हाट इज मोबाइल नंबर, करूँ क्या डायल नंबर"।

वीडियो कॉल ने तो दूरियां और भी सिमित कर दी है । कहीं भी बैठे बैठे मोबाइल या कंप्यूटर द्वारा दूर बैठे व्यक्ति से भी रूबरू बात कर सकते हैं । 20 -25 वर्ष पहले जो बातें कोरी कल्पना लगा करती थी, विज्ञान और तकनीक ने सच कर दिखाई ।

डाकघरों में तो आजकल रजिस्टर्ड पत्र ही आते हैं, उनमें भी ज्यादातर वो रजिस्ट्रियां होती है जिन्हें भेजने वाले का मकसद अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल करना होता है ।


चिट्ठी आई है


भले ही आधुनिक तकनीक ने हमें सैंकड़ो सुविधाएं उपहार में दी है, लेकिन जो आनंद और ख़ुशी चिट्ठी मिलने पर मिला करते थे उसका मुकाबला ई मेल या चैट नहीं कर सकते ।

ई मेल मिलने पर हम थोड़े ही गा सकते हैं "ई मेल आई है आई है ई मेल आई है" ।

आनंद तो इन पंक्तियों को गाने पर ही मिलेगा :

"चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है।"

Click here to read आशीर्वाद - Blessings, by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

...शिव शर्मा की कलम से...







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Thursday, 19 November 2015

आ जाओ भैया - Aa jao Bhaiya



आ जाओ भैया - Aa Jao Bhaiya, Please come brother

मायके से बहुत दूर शहर में अपने ससुराल में रहती एक बहन की पुकार अपने उस इकलौते भाई को, जो घर की जिम्मेदारियों और समय की कमी के कारण वर्षों से उस से मिलने नहीं आ पाया ।



"आ जाओ भैया"

बहन को ना कोई तोहफा
ना कोई उपहार चाहिए
बहुत दिन हो गए तुमसे मिले
भाई तेरा दीदार चाहिए

चाह नहीं सोने के गहनों की
ना मोह चांदी की पायल का
ख्वाहिश नहीं मेरी कोई गाड़ी की
ना शौक मुझे मोबाइल का

बस तुम्हें देखलु भैया तो
सारी दौलत मिल जायेगी
भाभी के साथ भतीजे को देख
दिल की बगिया खिल जायेगी

भांजे तुम्हारे बरसों से
ननिहाल को याद कर रहे हैं
मामा कब लेने आएंगे माँ
पल पल फ़रियाद कर रहे हैं

मुझे भी तो माँ की याद
हर पल सता रही है
बरसों पहले जो मनाई थी साथ
वो दीवाली याद आ रही है

व्हाट्सएप्प की बातों से
अब मन नहीं भरता है
साथ बैठ कर हंसने बोलने
खिलखिलाने का दिल करता है

जानती हूँ तेरे कन्धों पर
घर की जिम्मेदारी है
पर उसी घर का एक हिस्सा
ये बहन भी तुम्हारी है

जिस की हर एक सांस
ये पुकार कर रही है
आ जाओ भैया मिलने
कि बहन इंतज़ार कर रही है।।

Please click here to read नाम अगर रख दें कुछ भी by Sri Pradeep Mane


लेखक : प्रदीप माने "आभास"




Wednesday, 18 November 2015

लक्ष्य - Lakshya, Aim



लक्ष्य - - Lakshya, Aim




नन्हा सा बबलू कागज की नाव बना रहा था उसके चलते उसने बहुत से कागज़ आड़े तिरछे मोड़ माड़ के अपने आसपास फैला रखे थे । आज स्कूल में क्राफ्ट की क्लास में उनको कागज की नाव बनाना सिखाया गया था । उसके पापा ने कहा था "बबलू, मैं बना देता हुं तुम्हें नाव।" लेकिन बबलू ने कहा "नहीं पापा, मुझे खुद बनानी है, खुद बनाऊंगा तभी सीखूंगा।" पापा ने भी उसकी लगन को देखते हुए कुछ रद्दी कागज उसे दे दिए थे नाव बनाने हेतु ।

आखिर कुछ और काग़जों के बलिदान के बाद बबलू ने नाव बना ही डाली । हां एक बार पापा की मदद जरूर ली कि कौनसे कोने खींचने है, मोड़ कर चोकोर किये हुए कागज़ के । जब नाव बन गयी तो छोटा सा बालक ऐसे खुश हुआ जैसे उसने कोई बहुत बड़ा अविष्कार कर लिया था । खुश क्यों नहीं होगा भला, उसकी मेहनत जो सफल हो गयी थी ।

मेहनत कभी भी ज़ाया नहीं जाती । कोशिश हमेशा कामयाब होती है, बशर्ते अगर उसे बीच राह में ना छोड़ा जाए ।
बड़े बड़े वैज्ञानिक किसी भी नए अविष्कार के लिये सैंकड़ों हजारों प्रयोग करते हैं, और तब तक करते रहते हैं जब तक उन्हें सफलता नहीं मिल जाती । यदि वो बीस तीस प्रयोगों के बाद निराश होकर बैठ जाते तो कहां संभव था चाँद पर पहुंचना ।

मुझे एक कहानी याद आ रही है,कुछ टूटी फूटी सी, कि एक गुरु शिष्य किसी गाँव से गुजर रहे थे तो उन्होंने देखा कि जगह जगह कुछ गड्ढे खुदे हुए थे । कोई दस हाथ, कोई बारह- तेरह हाथ तो कोई पंद्रह हाथ ।

शिष्य ने जिज्ञासावश अपने गुरु से पूछा, "गुरुदेव, यहां पर इतने गड्ढे क्यों खोदे गए हैं? क्या प्रयोजन है इनका?"




तो गुरु ने बताया कि "गाँव वाले पानी की तलाश में कुँवा खोदने की योजना बना रहे थे । लेकिन जब दस पंद्रह हाथ खोदने के बावजूद भी पानी नजर नहीं आया तो उन्होंने वहां की खुदाई रोक कर दूसरी जगह खोदना शुरू कर दिया । और पांच सात गड्ढे खोदने के बाद भी जब पानी नहीं मिला तो निराश होकर बैठ गए और अपनी कोशिश ही बंद करदी । अगर ये थोडा सोचते और एक ही गड्ढे को थोड़ा और खोदते तो उस जगह उन्हें पानी जरूर मिल जाता ।"

ऐसा ही हम में से बहुत से लोग करते हैं । किसी एक लक्ष्य पर जोर शोर से काम शुरू करते हैं, और कुछ दिन बाद अगर इच्छानुसार परिणाम नहीं मिलता है, तो अपना लक्ष्य ही बदल देते हैं । इतने दिनों तक की गयी मेहनत को दरकिनार करके । बाद में कुछ लोग पछतावा भी करते हैं कि अगर पहले वाले प्रयास में थोड़ी और मेहनत की होती तो उसका परिणाम अवश्य अपने पक्ष में होता ।

बल्ब के आविष्कारक वैज्ञानिक थॉमस एडिसन के बारे में मैंने पढ़ा था कि जब वो बल्ब के ऊपर प्रयोग पर प्रयोग कर रहे थे, और आशानुरूप परिणाम नहीं आ रहा था, तो किसी ने उनसे पूछा की इतने प्रयोग असफल होने पर भी आप और प्रयोग किये जा रहे हैं, निराश नहीं हुए? थॉमस एडिसन ने जवाब दिया "इन असफल प्रयोगों से ही तो मैंने ये सिखा है कि ये वो प्रयोग है जिनसे बल्ब नहीं बनाया जा सकता ।"

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि घर पर ही पढाई करने वाले और हजारों आविष्कारों के जन्मदाता एडिसन ने बल्ब के सफल आविष्कार हेतु करीब दस हजार प्रयोग किये थे । आज उनकी उसी मेहनत का नतीजा है की पूरी दुनिया जगमगा रही है ।

दोस्तों, कहते हैं ना कि मेहनत का फल मीठा होता है, जरुरत है तो सिर्फ इतनी की हम एक स्पष्ट लक्ष्य लेकर अपनी पूरी मेहनत और लगन से उस लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करें, खुद पर विश्वाश रखें तो यकीन मानिए अंततः सफलता जरूर मिलेगी ।

सफल लोगों के बारे में पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि उन्होंने बहुत सी असफलताओं, सैंकड़ों  नाकामयाबियों के बावजूद भी अपना धैर्य नहीं खोया था तथा निरंतर अपने प्रयासों में लगे रहे थे अपने लक्ष्य पर नजरें टिकाये ।

सुप्रसिद्ध कवी श्री हरिवंशराय बच्चन जी की कविता में भी उन्होंने एक चींटी की कोशिश का खूबसूरत वर्णन किया है । कैसे वो एक दाने को लेकर दीवार पर चढ़ती है, गिरती है, फिर चढ़ती है और आखिर वो दीवार चढ़ने में सफल हो ही जाती है । हम तो फिर मनुष्य हैं । दो स्वतन्त्र हाथ और मस्तिष्क के मालिक ।

इसलिए कभी अगर असफल भी हो जायें तो हार ना मानें, डटे रहें । मन दृढ रखें और ठान लें कि चाहे जितनी मुश्किलें आये, मुझे अपनी मंजिल को पाना है । याद रखें कोई भी हार अंतिम हार नहीं होती, वो तो शुरुआत होती है जीत की । इसी तरह कोई भी असफलता सफलता का पूर्णविराम नहीं बल्कि जीवन के एक नए अध्याय का शुभारम्भ होती है ।

Click here to read सपने - The Dreams by Sri Shiv Sharma

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....







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