Monday, 29 February 2016

Adhuri Azadi - अधूरी आजादी

अधूरी आजादी

पिछले दिनों दिल को आहत कर देने वाली जो घटनाएं देश में घटी वो बहुत ही पीड़ादायक और चिंतनीय है । शहीदों ने अपनी शहादत ये दिन देखने को तो नहीं दी थी । उनकी आत्माएं भी सिसक रही होगी ।

सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान किस राह पर जा रहा है कुछ समझ पाना भी मुश्किल लगता है । ऐसे में किसी अनजान शायर का एक शेर याद आ रहा है -

"वतन की फिक्र कर नादां, मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मशवरे है आसमानों में"

इन्ही घटनाक्रमों ने जब दिल को जख्मी किया तो दिल के जज्बातों को एक कविता का रूप देने की कोशिश मैनें की कि अगर ऐसी ही आजादी है तो फिर तो ये आधी ही है । पूरी तो वो होगी जो शहीदों ने उस वक्त अपने दिलो दिमाग में बसाई थी । आशा है आप इस कविता को भी मेरी अन्य रचनाओं की तरह पसंद करेंगे ।

      ***अधूरी आजादी***

ईमानदार भूखों मरते हैं चापलूसों के चांदी है
न्याय की खातिर भटकते देखो अब भी कई फरियादी है
आंसू बरसों से बहा रही यहां काश्मीर की वादी है
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है


लाज लुट रही बहनों की सोने की चिङीया सिसक रही
सोच सोच थर थर मन कांपे पांव से धरती खिसक रही
मैली मन की गंगा है और सनी खून से खादी है
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है

आरक्षण रुपी दानव सुरसा के मुख सा फेल रहा
कुछ लोगों के पागलपन को आम आदमी झेल रहा
दिल्ली तो बेचारी है, भोली है, सीधी सादी है
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है

कुछ रुपयों में अफसर बिकते चरम पे भ्रष्टाचार है
ताकतवाले कमजोरों पर कर रहे अत्याचार है
पैसों की ही पवन यहां बस पैसों की ही आंधी है
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है

सरहद पर सैनिक की दुश्मन गर्दन काट ले जाता है
देश के भीतर ले बारूद कसाब कोई घुस आता है
चुप रहते हैं हम फिर भी, क्या हम इसके आदी हैं
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है

आतंकी आ जाते हैं और कत्लेआम मचा जाते
गीदड़ चार मारने को यहां शेर युं ही मारे जाते
देश सलामत रहे सोच कर अपनी लाश बिछादी है
अगर यही है तो सब सोचो ये कैसी आजादी है



भारत माता कहती है इस देश के पहरेदारों से
मुझे है खतरा मेरे ही आंचल में छुपे गद्दारों से
जब तक ये सब चलता रहेगा ये आजादी आधी है
जब तक ये सब चलता रहेगा ये आजादी आधी है ।।

    ***भारत माता की जय***




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जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***



Friday, 26 February 2016

बिन बात बदल जाते हैं - Bin Baat Badal Jate Hai

बिन बात बदल जाते हैं.....

नमस्कार मित्रों ।

आपने मेरी रचना "हम तो चले परदेस" को अपना भरपूर प्यार दिया । आपके अच्छे अच्छे उत्साहवर्धक कमेंट पाकर यक़ीन मानिए, मैं ख़ुशी से फुला नहीं समां रहा हूं ।

आगे भी इसी तरह आपका स्नेह युं ही लुटाते रहना और मेरा हौसला बढ़ाते रहना । मैं हरदम कोशिश करूँगा कि आप सबको पसंद आने जैसा कुछ लिखता रहुं ।

आज फिर एक छोटी सी गजल ले कर आया हुं, इसी उम्मीद के साथ कि इसे भी आप हम तो चले परदेश की तरह पसंद करेंगे ।


       बिन बात बदल जाते हैं
       ******************

लम्हा लम्हा चलते दिन रात बदल जाते हैं,
गुजरते वक्त के साथ हालात बदल जाते है,

सफ़र वही है साथी वही मंजिल भी एक है
मतलब के लिए मगर साथ बदल जाते हैं


मुहब्बत में खाई हो जिसने बेहिसाब ठोकरें,
अक्सर उन आशिकों के जज्बात बदल जाते हैं,

कुछ खता हो तो वाजिब है बदलना उनका,
तौबा मगर वे तो बिन बात बदल जाते हैं,

पूछते हैं उनसे कि गुनाह तो बताइये,
बस मुस्कुराते हैं और बात बदल जाते हैं,

टूटे जो कोई दिल किसी बेगुनाह का कहीं,
हो कर ख़फ़ा मौसम ए बरसात बदल जाते हैं,

मेहरबां हो खुदा जो अपने किसी बंदे पे कभी,
फ़रिश्ते आ के उसकी औकात बदल जाते हैं,

देखे हैं शेर भी मिमियाते शिकारी के आगे
आफ़ताब के सामने चरागात बदल जाते है


कितनी भी घनी हो काली हो अंधियारी हो
उजाले आकर हर स्याह रात बदल जाते हैं,

गम ना कर "शिव" गर किसी ने दिल दुखाया है,
वक्त के साथ लोगों के ख़यालात बदल जाते हैं ।।



    ****      ****      ****

जल्दी ही फिर मुलाक़ात होगी दोस्तों, आपके कमेंट्स का इन्तजार रहेगा ।


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जय हिन्द

**** शिव शर्मा की कलम से ****




Monday, 22 February 2016

हम तो चले परदेस - Hum To Chale Pardes

हम तो चले परदेस

नमस्कार दोस्तों । मैं खुश हुं कि आप मेरे लिखे ब्लॉग्स पढ़ते रहते हैं । आपके मिलने वाले मेसेज मुझमें एक नयी ऊर्जा भर देते हैं, पता नहीं मैं कैसा लिखता हुं, लेकिन जब आप मेरे हर लिखे की सराहना करते हैं मेरा हौसला बढ़ाते हैं तो आपके अपार प्रेम से मेरा ह्रदय अत्यंत प्रफुल्लित हो उठता है । अपना स्नेह ऐसे ही बनाये रखना ।

मैं देखता हुं कि बहुत से मेरे मित्र दुनिया के अलग अलग देशों से मेरे ब्लॉग्स पढ़ते रहते हैं । यहां भी मेरे साथ बहुत से मित्र हैं जो हिंदुस्तान के अलग अलग प्रान्तों से कुछ पाने के लिए अपना वतन छोड़ कर हजारों मील दूर आये हैं ।


अक्सर ऐसे मौके आते हैं जब हम भारतीय एक साथ इकठ्ठा होते हैं । उस वक्त मैंने हर बार उनकी बातों में ये महसूस किया कि भले ही हम अपने मुल्क अपने वतन से दूर हैं मगर दिल में हरदम हिंदुस्तान ही धड़कता रहता है ।

देश की उन्ही यादों को संजोकर उन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक ग़ज़ल का रूप देने की कोशिश मैंने की है । ये पता लगाने या बताने की कोशिश की है कि कुछ पाने के लिए हम अपना देश छोड़कर तो आ गए, पर देश के साथ और क्या क्या पीछे छूट गया ।

उम्मीद है हमेशा की तरह इस बार भी आप का भरपूर प्यार और स्नेह मिलेगा ।


   ****हम तो चले परदेस****

हम अपने गांव की गलियां ओ गुलशन छोड़ आये हैं,
उन्ही गलियों में अपने दिल की धड़कन छोड़ आये हैं,

हमारे यार रिश्तेदार सारे छूट गए पीछे,
पिता का प्यार और माता का दामन छोड़ आये हैं,

सवेरा खिलखिलाता था जहां सूरज की किरणों से,
उसी घर के किसी कोने में बचपन छोड़ आये हैं,

जहां सजती थी महफ़िल रोज खुशियों की उमंगों की,
घर का झिलमिलाता सा वो आँगन छोड़ आये है,


कलियां मुस्कुराती थी, तितलियां गुनगुनाती थी,
फूलों से भरा पूरा वो उपवन छोड़ आये हैं,

लचकती डाल चंपा की रातरानी की खुशबू और,
फूल पर मंडराते भौरों की गुंजन छोड़ आये हैं,

दीवाली ईद क्रिसमस लोहिड़ी नववर्ष का उत्सव,
साथ ही होली की मस्ती का फागुन छोड़ आये हैं,

भटूरे छोले दिल्ली के कचोरी मावा जयपुर की,
गाय का दूध और मथुरा का माखन छोड़ आये हैं,

वो भोलेनाथ की काशी, अयोध्या राम की नगरी,
श्री जगन्नाथ के मंदिर के दर्शन छोड़ आये हैं,

वो बरगद नीम पीपल जो सुहानी छाँव देते थे,
हवाओं में थी महक जिसकी वो चन्दन छोड़ आये हैं,



जरुरत जिंदगी की देश की यादों से भारी है,
मलाई के भरोसे मीठी खुरचन छोड़ आये हैं,

कुछ पा लेने की खातिर देख क्या क्या खो दिया है "शिव"
मुहब्बत से भरा प्यारा वतन हम छोड़ आये हैं ।।


अगर ये शब्द जरा भी आपके दिल को छू लें तो मैं समझूंगा कि मेरा प्रयास व्यर्थ नहीं गया । बताइयेगा जरूर ।

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जय हिंद

*** शिव शर्मा की कलम से ***



Thursday, 18 February 2016

Bharti ke Baagi

भारती के बागी Bharti ke Baagi



भारती जी का भरा पूरा परिवार था । जहां सब लोग मिलजुल कर रहते थे । परिवार के सदस्यों में कभी अनबन भी हो जाया करती थी लेकिन कुछ अमन पसंद लोगों द्वारा बीच बचाव करने पर मामला सुलझ जाया करता था ।

ऐसा नहीं था कि उस परिवार में कोई मनमुटाव थे । दरअसल कुछ पड़ोसियों की आँखों में वो परिवार खटकता था और वे परिवार के कुछ बेवकूफ सदस्यों का "इस्तेमाल" करते रहते थे, उन्हें आपस में एक दूसरे से लड़ाने के लिए ।

क्योंकि पडोसी जानते थे कि ये परिवार दिन बी दिन सुदृढ़ होता जा रहा है । अगर ऐसा ही रहा तो उन्हें लगता था कि बिरादरी में उनकी पूछ कम हो जायेगी । बस अपनी थोथी शान के चक्कर में वे भारती जी के घर में फुट डालते रहते थे ।

कुछ पड़ोसियों की नजर तो भारती जी की जमीन पर भी थी । हालांकि जब एक बार भारती जी की संपत्ति का बटवारा हुआ था तो उन्हें उनका हिस्सा दे दिया गया था, फिर भी वे अपनी गिद्ध दृष्टि भारती जी की जमीन पर गड़ाये हुए थे और उसके लिए वे तरह तरह के हथकंडे अपनाते रहते थे जिसमें भारती परिवार को किसी भी तरह छिन्न भिन्न करने का प्रयास भी शामिल था ।

यदा कदा काफी हद तक ये शैतान पड़ोसी  इसमें सफल भी हो जाया करते थे, परंतु भारती जी के पास उनकी रक्षा हेतु बहुत से उनके बहुत से वफादार सेवक थे जो उन्हें हर मुसीबत से बचा लाते थे, और वे पड़ोसी भारती जी का बाल भी बांका नहीं कर पाते थे । हर बार अपनी हार से वो और तिलमिला जाते थे, बौखला जाते थे और दूसरी साज़िशें रचने लगते थे ।



लेकिन अभी भारती जी पर एक और मुसीबत मंडरा रही है, उनके परिवार के कुछ सदस्य विद्रोही भाषा बोल रहे है । पता नहीं क्यों पर पड़ोसियों की भी जय जयकार कर रहे है । वे सदस्य अपना हिस्सा मांग रहे हैं जिन्होंने इस परिवार की भलाई के लिए आज तक शायद ही अपना कोई योगदान दिया है ।

अब देखना ये है कि भारती जी उन सदस्यों को कैसे रास्ते पर लाते हैं । परिवार के बहुत सारे लोग भारती जी के साथ खड़े हैं, जबकि इस वक्त जिन चचेरे ममेरे रिश्तेदारों को भारती जी के साथ खड़ा होना चाहिए वे लोग अपने जाति फायदे के लिए बागी सदस्यों का समर्थन कर रहे हैं, इन्हें शह दे रहे हैं ।

कोई कुछ भी कहे, कुछ भी करे लेकिन हम जानते हैं कि भारती जी के रक्षक, उन पर जान तक कुर्बान करने को तैयार उनके सेवक, उन बागियों को अच्छा सबक सिखाएंगे और भारती जी हमेशा की तरह सीना ताने अपनी मूंछों पर ताव देते नजर आएंगे ।

Click here to read "सहनशीलता की हद - Sahanshilta ki hadd" by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

****शिव शर्मा की कलम से****








आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

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Tuesday, 16 February 2016

Immandari Ka Inam - ईमानदारी का इनाम


ईमानदारी का इनाम

आनंद युं तो अपनी नोकरी में खुश था । पढ़ा लिखा था और मुम्बई में एक कंपनी में काम करता था ।  तनख्वाह ज्यादा तो नहीं थी मगर उस से उसका गुजारा अच्छी तरह हो जाता था । घर खर्च निकाल के थोड़े बहुत पैसे वो भविष्य के लिए बचा भी लेता था ।

लेकिन वो रकम उन जरूरतों के लिए बहुत कम थी जो उसे निकट भविष्य में पूरी करनी थी । वो अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा करना चाहता था । अभी की कमाई से घर खर्च तो चल जाता था लेकिन बहुत सी इच्छाएं मन में दबी की दबी रह जाती ।

परिवार के सदस्य भी जानते थे कि आनंद पर बहुत सी जिम्मेदारियों का बोझ है इसलिए वे भी उस पर अपनी कोई इच्छाएं थोपते नहीं थे ।

रोज की तरह आज भी वो काम पर जाने के लिए घर से निकला । मुख्य रास्ते पर आकर स्टेशन जाने के लिए सामने से आते हुए ऑटो रिक्शे को हाथ देकर रुकवाया और उसमें बैठ गया ।

रिक्शा में पहले से एक साहब बैठे थे जो काफी जल्दी में लग रहे थे, तभी तो उन्होंने रिक्शे वाले से कहा भैया मुझे थोड़ी जल्दी है, आप एक सवारी का अतिरिक्त भाड़ा मुझसे ले लेना लेकिन अभी आप कहीं रुकना मत । सीधे स्टेशन से कुछ पहले जो होटल है वहीँ रोकना ।

"इतनी जल्दी थी तो अपनी गाड़ी से आते।" रिक्शा वाले ने ताना मारा ।

"आ तो जाता भैया, लेकिन दुर्भाग्यवश गाड़ी आज ही ख़राब होनी थी ।" उन साहब ने जवाब दिया तो रिक्शे वाला निरुत्तर हो गया । वैसे भी पहनावे से वो कोई रसूखदार आदमी ही लग रहे थे ।

उनका गंतव्य आ गया तो जल्दी से उन्होंने रिक्शे का किराया दिया और  रिक्शे से उतर गए ।

स्टेशन आ गया तो आनंद ने भी रिक्शे में बैठे बैठे ही किराया दिया और जैसे ही उतरने लगा उसकी नजर पड़ी सीट पर गिरे बटुवे पर, जो काफी भरा भरा लग रहा था । शायद उन भाईसाहब का था जो जल्दबाजी में वहां गिर गया था ।

आनंद ने तुरंत मन ही मन कुछ सोचा और वो बटुवा उठा लिया । उसकी ट्रेन का समय भी हो गया था । लेकिन फिर भी उसने पहले उस काम को तवज्जो दी जो उस बटुवे की वजह से आन पड़ा था ।

उसने बटुवे में मिले कार्ड पर मोबाइल नंबर देखकर फ़ोन बूथ से उन साहब को फ़ोन लगाया ।

"हैलो कौन ।"

"जी मेरा नाम आनंद है, अभी अभी आप जिस रिक्शे से आये थे मैं भी उसी में था ।" आनंद ने जवाब दिया और आगे कहा "जल्दीबाजी में आपका बटुवा रिक्शे में गिर गया था, आप बताएं अभी आप कहां पर है, मैं आ के दे देता हुं ।"

"ओह हां श्रीमान, आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।" उस व्यक्ति ने कहा और आनंद को जगह बताई जहां आनंद शीघ्र ही पहुँच गया । स्टेशन से थोड़ी दूरी पर ही तो थी ।

उन साहब ने आनंद को शाबाशी दी और पीठ थपथपाई । फिर पूछा "आपने देखा नहीं इस बटुवे में कितनी रकम थी । आप चाहते तो इसे अपने पास रख सकते थे"

"जी नहीं, जब ये मेरी है ही नहीं तो मैं क्यों देखता । हां इतना तो युं ही पता चल रहा है की काफी है । और हां अगर मैं इसे रख लेता तो शायद जीवन भर अपने आप को माफ़ नहीं कर पाता । क्योंकि ये भी एक तरह की चोरी होती और मैं चोरी नहीं कर सकता"

"धन्यवाद आनंद जी, आज के जमाने में आप जैसे ईमानदार कम ही मिलते हैं, क्या काम करते हैं आप?"

"जी कपड़ा बाज़ार में राज इंडस्ट्रीज नामक एक कंपनी में अकाउंटेंट हुं ।"

"अच्छा, शाम को आप मेरे घर पर आना आपसे थोड़ी और बातें करनी है, अभी तो थोड़ी जल्दी में हुं, अंदर मीटिंग में था, आपका फ़ोन आया तो मीटिंग बीच में छोड़कर बाहर आया, आपका एक बार पुनः धन्यवाद ।" कहते हुए उन्होंने अपना विजिटिंग कार्ड आनंद को दिया ।

"जी जरूर, अगर समय पर आ गया तो जरूर आऊंगा" आनंद ने उन से हाथ मिलाया और वहां से निकला ।

दफ्तर में जब सबको इस बात का पता चला तो सबने और उसके बॉस ने भी उसकी भूरि भूरि प्रशंशा की । बॉस ने वो विजिटिंग कार्ड लेकर नाम देखा तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान सी आ गयी थी, ऐसे लगा जैसे वो नाम उनका जाना पहचाना नाम था । फिर सब अपने अपने काम पर लग गए ।

शाम को घर जाने से घंटे भर पहले उसके बॉस ने उसे बुलाया और कहा "आनंद मैं तुम्हारे काम और ईमानदारी से बहुत खुश हुं, आगे भी जहां रहो ऐसे ही मेहनत और लगन से काम करते रहना, बहुत तरक्की करना । मेरी शुभकामनाएं हमेशा तुम्हारे साथ है ।"

बॉस की बात सुन कर वो आश्चर्य चकित हो गया और पूछा "सर मुझसे कोई गलती हो गयी क्या, आगे भी जहां रहो, मतलब? मैं कहां जा रहा हुं यहाँ से ।"

"अरे नहीं आनंद, चिंतित मत होओ, अब तुम घर जाओ । तुम बता रहे थे उन साहब ने तुम्हें मिलने भी बुलाया है । उनसे मिलो वे क्या बोलते हैं ।" बॉस ने मुस्कुराते हुए कहा ।

घर आकर तरोताजा होने के पश्चात् वो जब उन साहब से मिलने गया तो उसे बॉस की सारी बातें समझ में आ गयी ।



उन साहब का चेन्नई में इम्पोर्ट एक्सपोर्ट का कारोबार था और खाड़ी देशों में वो निर्यात किया करते थे ।उन्होंने उसे बताया कि उसका बॉस राज इंडस्ट्रीज का मालिक उनका भतीजा था और उन से उन्होंने आनंद के बारे में सारी पूछताछ कर ली थी ।

उन्होंने आगे बताया कि जिस वक्त वो उनका बटुवा वापस करने गया था उस वक्त उनकी मीटिंग दुबई के एक बड़े व्यापारी, जो कि उनके एक ग्राहक थे, के साथ चल रही थी और उस व्यापारी ने जब ये सुना तो वो बहुत प्रभावित हुए और तुरंत उन्होंने आनंद को अपनी ऑफिस में दुबई भेजने के लिए उन साहब से बात की ।

उन साहब ने आनंद को कहा कि आप पर कोई दबाव नहीं है अगर आप जाना चाहें तो ही जाएं । लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय ये है की आपको एक मौका मिला है, इसे हाथ से ना जाने दें । आपको वहां सब सुविधाओं के साथ यहां से बहुत ज्यादा तनख्वाह भी मिलेगी, इसके आलावा मेरे ये व्यापारी बहुत अच्छे इंसान के साथ साथ आदमी की क़द्र करने वाले शख्स भी है । आपके बॉस से भी मैंने इजाजत ले ली है ।

आनंद ने थोड़ी देर सोचकर हां कर दी तो उन्होंने वहीँ से अपने व्यापारी से फ़ोन पर बात की और आनंद को अगले दिन पासपोर्ट के साथ उसी होटल में आने को कहा ।

थोड़ा चाय नाश्ता करने के बाद आनंद जब वहां से निकला तो कई तरह के सपने उसकी आँखों में तैर रहे थे जो कि उसे लग रहा था की बहुत जल्दी पुरे होने वाले हैं । क्या संयोग था इतने बड़े आदमी का शेयर रिक्शे में आना, उसको वही रिक्शा मिलना, बटुवा इत्यादि ।

आनंद को लगने लगा कि शायद ईश्वर ने उसकी सुन ली । अपनी ईमानदारी का उसे बहुत शानदार इनाम मिला था ।

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जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***



Saturday, 13 February 2016

सात सुख - Saat Sukh

सात सुख


एक कहावत है जो अक्सर सुनने को मिल जाती है, आपने भी बहुत बार सुनी होगी "पहला सुख निरोगी काया" । इसके अलावा ये भी कहा जाता रहा है कि सातों सुख हर किसी को नहीं मिलते । क्या है ये सात सुख ? पहला सुख तो निरोगी काया है फिर बाकी के छह कौनसे सुख है ? जितनी मुझे जानकारी है आज आपसे साझा कर रहा हुं कि आखिर ये सात सुख है क्या ?

पहला तो आप जानते ही हैं की निरोगी काया यानि स्वस्थ शरीर । अगर शरीर स्वस्थ ना हो तो दुनिया का हर सुख बेमजा हो जाता है । जुकाम भी लग जाए तो पोंछते पोंछते कई बार आदमी की नाक छिल जाती है । छींकें, खांसी और बंद नाक पीड़ित व्यक्ति का हाल बेहाल कर देती है । ऐसे में अगर कहीं कोई उत्सव भी मनाया जा रहा है तो वो व्यक्ति उसका उतना आनंद नहीं ले पायेगा जितना कि दूसरे लोग ।

दुर्भाग्यवश यदि कोई और बड़ी बीमारी शरीर में घर कर जाए तो चिकित्सक हजार तरह की बंदिशें उस पर थोप देता है । मीठा मत खाना, तले हुए भोजन से परहेज करना । लंबी दूरी की यात्रा ना करें, नाचना कूदना आपके लिए घातक हो सकता है, मेहनत या थका देने वाला काम न करें, इत्यदि इत्यादि । अब वो व्यक्ति ताउम्र इन परहेजों की हथकड़ी पहने अन्य लोगों को देख देख कर मन ही मन घुटने के अलावा और कर भी क्या सकता है । यानि इन बातों का सार ये ही है कि अगर काया निरोगी है तो ही अन्य सुख काम के हैं अन्यथा सब बेकार है । इसीलिए कहा गया है की पहला सुख निरोगी काया ।

हमारे पूर्वजों ने दूसरा सुख बताया है "माया" यानि धन संपत्ति । पास में धन संपत्ति हो और पहला सुख भरपूर हो तो जीवन काफी आनंदमय हो जाता है ।

तीसरा सुख है गुणवान, संस्कारी जीवनसाथी । और चौथा सुख बताया गया है आज्ञाकारी संतान । यदि पत्नी समझदार है, अच्छे संस्कारों और गुणों से सुसज्जित है, तो व्यक्ति के लिए घर स्वर्ग समान हो जाता है, और सोने पे सुहागा हो जाता है जब संतान भी आज्ञाकारी हो । वो आदमी तो धन्य हो जाता है जिसको उपरोक्त चारों सुख मिल जाए ।

लेकिन बात सात सुखों की चल रही थी । देखा जाए तो ऊपर लिखे चार सुख भी विरलों को ही प्राप्त हो पाते हैं । कोई स्वस्थ तो है पर पैसों की तंगी है, ये दोनों है तो पत्नी का स्वभाव थोड़ा कड़वा है या संतान निरंकुश है ।

किसी भाग्यशाली के पास ये चारों है तो बाकि तीन और भी तो है । बुजुर्गों ने कुछ बताया है तो निश्चित ही उनकी बात में दम होगा ही होगा । जैसे पांचवे सुख को ही ले लीजिये । बहुत से लोग इस सुख से वंचित रह जाते हैं ।


पांचवां सुख बताया गया है स्वदेश में निवास । यहां स्वदेश का मेरे विचार से ये अर्थ है कि स्वदेश यानि वो स्थान जहां हमारे पुरखे रहते थे, जहां हमारे परिवार के सदस्य रहते हैं, जहां हम पले बढे, हमारी भाषा बोलने वाले हमारे जैसे ही संस्कारों और विचारों वाले लोग जहां है वो भूमि । ना कि पुरे देश में कहीं भी । विदेश तो खैर विदेश है ही ।

पहला सुख जिनके पास भरपूर होता है वो दूसरे सुख के लिए पांचवां सुख त्याग देता है । जीविकोपार्जन के लिए जरुरी भी है । धनोपार्जन होगा तभी तो दूसरा सुख मिलेगा ।

अब आता है छठा सुख । छठे सुख में बताया गया है की आदमी राज करे । उसके पास राज के जैसी शक्तियां हो । जो आज के समय में शायद ही किसी के पास है ।कुछेक अपवाद हो सकते है परंतु बहुतायत में हर कोई किसी ना किसी के तहत ही है ।  ताकतवर से ताकतवर आदमी भी किसी और की ताकत से ताकतवर बना हुआ है ।

अब बचा सातवां । अगर कोई सौभाग्य शाली बाकि छह सुखों का स्वामी है तो सातवां तो अवश्य ही उसकी पहुँच से दूर होगा । पहले के जैसे ही सातवें के बारे में भी एक कहावत बनी हुयी है "संतोषी सदा सुखी"।

जी हां, सातवां सुख बताया गया है संतोषप्रद जीवन, जो मुश्किल है । क्योंकि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है । सात में से छह सुख मिल भी गए फिर भी संतोष नहीं मिलेगा । तृष्णा बढ़ती ही जायेगी । अपनी मेहनत और भाग्य से वो सबकुछ पा लेगा किन्तु जीवन भर संतुष्ट नहीं हो पायेगा । उसे हर पल लगेगा कि कुछ तो है जो छुट गया है ।

ये थे वो सात सुख जिनके बारे में अक्सर लोग कहते हैं की सातों सुख किसी को नहीं मिलते। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि वो आपको सातों सुखों से नवाजे । जल्दी ही फिर मुलाकात होगी दोस्तों । आज इजाजत चाहूंगा ।

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जय हिन्द

*** शिव शर्मा की कलम से***








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Thursday, 11 February 2016

Karz - कर्ज

कर्ज

पुरानी फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता था कि गरीबी और हालात की चक्की में पिसते गांव के लोग साहूकार से कर्ज लेते और साहूकार उस पर ऐसा चक्रवर्ती ब्याज लगाता कि कइयों की तो जिंदगी गुजर जाती कर्ज चुकाते चुकाते लेकिन साहूकार की खाता बही में कर्जे की रकम ज्यों की त्यों रहा करती ।

बीस साल बाद जब नायक जवान हो जाता तब वो गांव वालों को साहूकार के उस कर्ज रूपी दलदल से बाहर निकालता ।

वो फ़िल्में थी, फ़िल्म में एक नायक होता था जो गांव के किसानों की गिरवी पड़ी जमीन साहूकार के चंगुल से निकाल लाता था, परंतु असल जिंदगी में वो नायक पता नहीं क्यों नहीं आ पाता है । हकीकतन ऐसा होता भी नहीं है ।




क्योंकि आज भी हमें अक्सर पढ़ने सुनने को मिलता है कि
कर्ज के बोझ में डूबे किसानों ने आत्महत्या कर ली । किसान तो बेचारे रोज कहीं ना कहीं इस कर्ज के चलते जिंदगी से थक कर दुनिया से जा रहे हैं ।

एक किसान कर्ज लेता है इस उम्मीद में कि अच्छी फसल होगी तो कर्ज भी चूक जाएगा और अगले साल का जुगाड़ भी हो जायेगा । दुर्भाग्यवश उस पर किस्मत की मार पड़ जाती है अतिवृष्टि या सूखे के रूप में । बाद में कर्ज की रकम तो दूर, उसका ब्याज भी चुकाना उसके लिए भारी हो जाता है । कर्ज के बोझ में डूबा वो अपने परिवार को रोटी के लिए तरसता देखने को मजबूर हो जाता है और एक दिन उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है ।

किसान तो अपने अच्छे कल के सपने के लिए कर्ज लेता है मगर आजकल देखा गया है की कई लोग हर छोटी छोटी चीज के लिए कर्जा ले लेते है ।

अगर किसी व्यापार या घर खरीदने के लिए कर्ज लिया है तो फिर भी बात समझ में आती है । परंतु केवल झूठे लोक दिखावे के चक्कर में कई लोग इस कर्ज रूपी भंवर में फंस जाते हैं । किसी भी बैंक में आसानी से उपलब्ध जो है । बाद में भले ही हजारों पापड़ बेलने पड़े मासिक किश्तों को चुकाने में ।

आजकल तो बड़ी बड़ी कंपनियां भी अपना माल "शुन्य प्रतिशत ब्याज दर" का प्रलोभन दिखाकर ग्राहकों को बेच रही है । जिनमें अधिकतर मध्यम वर्गीय श्रेणी के लोग ही होते है, जो इस शुन्य प्रतिशत के भ्रम में आकर बहुत सी ऐसी वस्तुएं भी खरीद लाते हैं, जिनकी उनको कोई खास जरुरत भी नहीं होती ।

बस इस वजह से कार ले आये क्योंकि उनका कोई रिश्तेदार या परिचित कार लाया है । उसने खरीद ली तो मैं क्यों पीछे रहूं । बाद में फिर वही कमाई, जिसमे उसका घर खर्च आराम से चल जाया करता था, कम पड़ने लगती है, क्योंकि "कार" की मासिक किश्तें भी तो भरनी पड़ रही है अब ।

इस बीच अगर कोई और बड़ा खर्च सामने आ जाए तो वो फिर भागता है बैंक की तरफ । एक नया कर्ज लेने के लिए । जरूरतें आती रहती है और ये सिलसिला चलता रहता है, भविष्य के साथ साथ वो अपना वर्तमान भी बिगाड़ लेता है ।

मित्रों कर्ज लेना बुरी बात नहीं है, और कई दफ़ा तो हम मजबूर भी हो जाते हैं कर्जा लेने को । लेकिन बुरी बात तो तब है जब गैर जरुरी, बेमतलब कर्जे लिए जाए ।



मेरे मित्र ने कार खरीदी तो मैं भी खरीदूं, पडौसी बड़ा वाला टेलीविजन लाया है तो मैं क्यों पीछे रहुं जब टी वी किश्तों पर मिल रहा है, या किसी परिचित ने अपने घर में नया फर्नीचर बनवाया है तो भला मैं भी क्यों न बनवाऊं । भले ही कर्ज लेकर । अब इस झूठी शान के लिए अपने आप को कर्ज रूपी दलदल में डुबोना कहां की समझदारी है ।

मित्र ने अगर कुछ नई खरीद दारी की है तो हो सकता है, और होता भी है, कि वो मित्र उस खर्चे को करने में आर्थिक रूप से सक्षम था ।



इसलिए दोस्तों, जहाँ तक हो सके इस कर्ज रूपी मगरमच्छ से खुद को बचाके रखना । सच मानो, नींद बड़े चैन की आएगी, और याद रखना "खर्चे कम तो कर्जे कम ।"

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जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***


Monday, 8 February 2016

फिर बच्चा बन जाऊं - Phir Bachha Ban Jau

फिर बच्चा बन जाऊं


बचपन में शैतानियां, मस्ती, जिद्द शायद हम सबने लगभग एक जैसी ही की होगी । कोई गड़बड़ करने पर पापा डांटते थे और हम भाग कर माँ के आंचल में छुप जाते । भैया से प्रार्थना सी करते की कुछ दूर साईकिल पर घुमा देवे । नानी के घर खूब मस्तियां किया करते थे ।

बचपन की इन शरारतों को जब एक साथ समेटकर देखा तो पाया कि ये तो एक कविता बन गई ।

यदि ये कविता कहीं भी आपके ह्रदय को छु जाए तो मैं समझूंगा की मेरा प्रयास सार्थक हुआ है ।


फिर बच्चा बन जाऊं
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माँ से लाड़ कराऊं
और डांट पापा से खाऊं
बारिश के पानी में फिर
कागज़ की नाव चलाऊं
बुशर्ट और हाफ पेन्ट पहन कर
स्कूल पढ़ने जाऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं


बैठ गोद में दादाजी की
किस्से सुनूं दादी से
तितलियां पकडूं फूल चुनुं
नजदीकी वादी से
शनिवार को दीदी के संग
नानी के घर जाऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं

नानी से जिद करूं कहानी
सुनने को परीयों वाली
राजा रानी गुड्डो गुड़ियों
शेर और चिड़ियों वाली
और पंख लगा सपनों में ही
परीयों के देश हो आऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं



बारिश की रिमझिम में भीगूं
बेर बेरी से तोडूं
पकड़ गली में कुत्ते को
फिर उसकी पुंछ मरोडूं
कड़ी धुप में छत पर जा
सूरज से आँख मिलाऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं

नीलगगन के तारे गिनुं
पूनम का चाँद निहारूं
छीन के कंघी दीदी से
खुद अपने बाल संवारुं
भैया की साइकिल पे बैठ कर
मेला देखन जाऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं



पप्पू, चिंटू, पिंकी, बाबू
मोनू के संग खेलूं
कोई खिलौना उनको देदूं
और कुछ उनसे लेलूं
लगा बांसुरी होठों पर
मैं बालकृष्ण बन जाऊं
कभी कभी ये दिल करता है
फिर बच्चा बन जाऊं ।

           *******

इस कविता के बारे में आपके विचारों, सुझावों का स्वागत के साथ इन्तजार करूँगा ।

जय हिन्द

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***शिव शर्मा की कलम से***


Sunday, 7 February 2016

Jeevan Sathi

जीवनसाथी

उन दोनों की मुलाकात एक विवाह समारोह के दौरान ही हुई थी ।प्रथम दृष्टि में ही दोनों ने मन ही मन एक दूसरे को पसंद कर लिया था ।

मनु अपने किसी रिश्तेदार की बारात में आया था जहां उसकी नजरें विभा से टकरा गयी । विभा का मुस्कुराता चेहरा उसके मन में बस गया था । विभा ने भी जब मनु को देखा तो उसके भी दिल की धड़कनें बढ़ गयी थी ।

विवाह के दौरान होने वाली कई रस्मों में उन दोनों का बार बार आमना सामना भी हुआ, दोनों ने मुस्कुरा कर आँखों ही आँखों में जैसे प्रेम का इजहार कर दिया था ।

दोनों की उम्र विवाह योग्य ही थी । और दोनों के परिवार वाले योग्य वर वधु की तलाश में थे । शायद ईश्वर ने भी उनके प्रेम को स्वीकृति दे दी थी । तभी तो संयोग से विभा के पिता ने मनु के लिए उसके पिताजी के सामने बात चलाई और बताया कि मेरी लड़की विभा के लिए मुझे आपका लड़का पसंद है, और मेरे घर पर भी सबको मनु पसंद है । अब अगर आप स्वीकृति दें तो बात को आगे बढ़ाया जाए ।

मनु के पिता ने भी कहा कि इससे अच्छी बात हमारे लिए क्या होगी कि बिना किसी भाग दौड़ के लड़के का रिश्ता हो जाए, और वो भी आपके साथ । मुझे कोई आपत्ति नहीं है, हां मैं एक बार अपनी पत्नी और मनु से विचार विमर्श करके फिर आपको जवाब दुंगा ।

अगले दिन ही निर्णय आ गया । मनु के पिताजी तो आश्चर्य चकित हो गए जा बड़ी बहु ने बताया की पिताजी, हमें तो लड़की पहले से ही पसंद है ।

मनु और विभा को तो जैसे बिन मांगे ही मनवांछित फल मिल गया था । निश्चित समय पर सगाई की रस्म हो गयी, उस दिन मनु ने विभा को अपने मन की बात बताई ।

"विभा, मुझे तुम पहली नजर में ही पसंद आ गयी थी, आज तुम्हें एक राज की बात बताता हुं । दरअसल बारात जाने से पहले भाभी ने मुझे तुम्हारे बारे में बता दिया था और कहा था कि वहां विभा नाम की लड़की होगी उसे देख लेना । जचे तो बात आगे बढ़ाएंगे ।" मनु ने हंसते हुए कहा तो विभा ने भी थोड़ा लजाते हुए जवाब दिया।

"आपको क्या लगता है, भाभी सिर्फ आपके ही है । मेरे भी दो भाभियां है और मुझे भी आप पहली ही नजर में.... " कहते कहते वो और लजा गई ।




उसी दिन विवाह की तिथि और समय तय हो गया और तय समयानुसार दोनों का विवाह हो गया । हंसी ख़ुशी दोनों अपना जीवन बिताने लगे । दिनोदिन दोनों का प्रेम और गहरा होता गया । संयोग से दोनों का स्वभाव अच्छा था और विचार भी आपस में काफी मिलते थे तो कहीं मनमुटाव की कोई संभावना ही नहीं थी ।

विवाह को हंसी ख़ुशी दो वर्ष बीत चुके थे । एक दिन मनु की माँ ने हँसते हुए विभा से कहा बेटा अब कोई नन्हा मुन्ना दे दो, बहुत समय हो गया आँगन में कोई नन्ही किलकारी गूंजे हुए । विभा शरमा गई और रसोई के कामों में लग गई ।

परंतु सास की इस बात ने उसको थोड़ा चिंता में डाल दिया था । दो वर्षो में अभी तक कभी भी उसे इस बात का खयाल भी नहीं आया था कि एक नारी का पूर्णत्व माँ बनने में ही है । और बीते दो वर्षों में ना जाने क्यूं इसकी कोई संभावना भी नहीं बनी थी ।

शाम को जब मनु काम से घर आया तो विभा ने उसे अपनी चिंता से अवगत कराया ।

मनु ने उसे ढाढ़स देते हुए कहा कि "अरे विभा इसमें परेशान होने वाली क्या बात है, अभी गर्भधारण नहीं हुआ तो चिंतित क्यों हो रही हो, फिर भी यदि तुम्हें इतनी चिंता हो रही है तो चलो कल हम डॉक्टर से मिल लेते हैं ।"

अगले दिन डॉक्टर ने जब जांच रिपोर्ट दी तो विभा तो सकते में आ गई । महिला डॉक्टर ने बताया कि रिपोर्ट में था की विभा की शारीरिक संरचना में कुछ ऐसा विकार है, जो उसके गर्भाधान में बाधा बन रहा है । जिसकी कोई खास दवा तो नहीं है फिर भी ये कुछ दवाएं लिखी है, लेते रहना । ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा । और हां ये विकार समय के साथ अपने आप भी ठीक हो सकता है इसलिए ईश्वर पे भरोसा रखें ।

विभा टूट सी गई । उसे अपना वैवाहिक सम्बन्ध संकट में नजर आने लगा । हस्पताल से बाहर आते समय वो उदास सी थी । मनु दवा की दुकान से दवा लेकर आया तो लगभग रो पड़ने वाली हालत में विभा को देखकर उसके कंधे पर हाथ रख कर बोला ।

"विभा, मैं जानता हुं तुम क्या सोच रही हो । लेकिन जो तुम सोच रही हो उसे अपने जेहन से निकाल दो । मेरा प्रेम इतना कमजोर नहीं है कि इतनी सी बात के लिए कम हो जाए या टूट जाये । जिस तरह तुम्हे मेरी जरुरत है उससे कहीं ज्यादा मुझे तुम्हारी जरुरत है । हम जीवनसाथी है, सारे जीवन के इक दूजे के साथी । बच्चे तो जीवन में आएंगे तब आएंगे, तुम तो मेरे जीवन में आ चुकी हो और इसका एक अहम् हिस्सा बन चुकी है ।" फिर हंसकर कहा "मेरा तुम्हारा साथ सात जन्मों का है पगली, ये तो अभी पहला ही है ।"

विभा की आँखों से झर झरआंसू बहने लगे और वो मनु के कंधे पर सर रखकर फफककर रो उठी । मनु ने उसे धीरज बंधाया और घर ले आया ।

कुछ दिनों बाद सब कुछ वापस सामान्य हो गया । विभा के दिल में मनु और बाकि परिवार के लिए मान और बढ़ गया था । सबने उसे ढाढ़स जो बंधाया था । सासु माँ ने तो यहां तक कहा बेटा क्यूं फिकर करती है, डॉक्टर ने कहा है ना ईश्वर सब ठीक कर देगा तो वो जरूर ठीक कर देगा । भरोसा रखो और वैसे भी अभी तो तुम्हारी उम्र ही क्या है । चिंता मत करो और मेरे लिए एक अदरक वाली चाय बना लाओ । सास ने मुस्कराहट के साथ उसके सर पर हाथ फिरा कर कहा था ।

देखते देखते और चार साल गुजर गए । एक दिन अचानक विभा को काम करते करते चक्कर सा आया । संयोग से उस वक्त मनु उसके पास ही खड़ा था, इससे पहले की वो चक्कर खा कर गिरती, मनु ने उसे थाम लिया और तुरंत अस्पताल ले के भागा ।

अस्पताल में डॉक्टर ने विभा का मुआयना किया और उस वक्त कमरे के बाहर बैठे मनु की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब डॉक्टर बाहर आकर मुस्कुराते हुए मनु से बोली "मुबारक हो, आप पिता बनने वाले हैं।"


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****शिव शर्मा की कलम से****




Saturday, 6 February 2016

Meri Paheli Rail Yatra - My First Train Journey

मेरी पहली रेल यात्रा  - Meri Paheli Rail Yatra 


My First Train Journey - Meri Paheli Rail Yatra

वैसे तो आज के समय में यात्रा के कई साधन लोगो को उपलब्ध है । किन्तु आज भी रेल यात्रा का अपना अलग ही महत्व है । लम्बी दूरी की यात्राए रेल में ही आराम दायक होती है । रेल में हम बैठकर, लेटकर अथवा सोते हुए अपनी यात्रा का आनंद उठा सकते है ।

आज मैं आपसे अपनी प्रथम रेल यात्रा का अनुभव साझा करना चाहता हूँ । मेरी प्रथम रेल यात्रा आरामदायक तो नहीं थी परन्तु रोमांचक जरूर थी, जिसकी यादे आज तक मेरे जेहन में ताज़ा है ।


 मेरी पहली रेल यात्रा


उस वक्त मैं यही कोई ८-१० साल का रहा होऊँगा तब पिताजी हमारे एक परिचित के यह शादी में जाने की तैयारी कर रहे थे । तब अकेले पिताजी को सम्मिलित होने जाना था उस शादी में, अंतिम समय में मैने भी जाने की जिद पकड़ ली, परन्तु पिताजी ने मेरी एक नहीं सुनी । कारण कि टिकट आरक्षित नहीं थी ।

पिताजी ने कहा की जनरल डिब्बे में सफर करने में दिक्कत आएगी और वो मेरा ठीक से ख्याल भी नहीं रख पाएंगे । पिताजी के इस फैसले से मेरा मन उदास हो गया था । मुझे उदास देख माँ ने पिताजी से बात की और उन्हें मना लिया ।


My First Train Journey - Meri Paheli Rail Yatra





रेलवे स्टेशन पहुँच कर मैने देखा की टिकट खिड़की पर बहुत लम्बी लाइन लगी हुई है । पिताजी ने मुझे एक जगह पर सामान के साथ खड़ा किया और टिकट के लिए कतार में लग गये ।

मैं वहां खड़ा हक्का-बक्का होकर भीड़ को देखे जा रहा था और सोच रहा था की आज ही के दिन इतने लोग एक साथ कहा जा रहे है । शहर खाली हो रहा है क्या?


 मेरी पहली रेल यात्रा


पिताजी को टिकट लेकर आने में एक घंटा लग गया और इधर ट्रेन के आने का समय भी हो गया था, पिताजी ने मुझे जल्दी-जल्दी चलने का आदेश दिया और हम दोनो जल्दी-जल्दी ट्रेन की ओर चल पड़े ।

प्लेटफॉर्म पर जाकर देखा की एक बड़ी सी ट्रेन खड़ी थी और लोग उसमे चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की कर रहे थे । यह सब देख कर मैं एक बार तो डर गया, पर पहली बार रेल में सफर करने का सोच कर मैने अपने आप को संभाल लिया ।

My First Train Journey - Meri Paheli Rail Yatra


लोगो की भीड़ के अलावा वहा लाल कपड़ो में कुछ लोग भी घूम रहे थे । जो लोगो का सामान लेकर इधर उधर भाग रहे थे । मैने पिताजी से पूछा की वो लोग कौन है तो पिताजी ने कहा वो कुली है जो लोगो का सामान उठाने का काम करते है ।

जैसे तैसे हम लोग जनरल डिब्बे तक पहुंचे, वहा पिताजी ने भीड़ को जैसे तैसे पार करते हुए मुझे और सामान को अंदर डिब्बे में पहुँचाया । परन्तु वहां भीड़ के बीच मेरी साँस घुटने लगी ।


 मेरी पहली रेल यात्रा


पिताजी मेरी ये दशा देख पहले तो मुझे डांटा और कहा कि मैं कह रहा था, दिक्कत होगी, पर तुम ही नहीं माने । फिर जल्दी से खींच कर मुझे एक सीट तक ले गये और एक महिला से निवेदन कर मुझे बैठने को थोड़ी सी जगह दिलवा दी ।

इतने में रेल की 'सीटी' बज गयी और रेल धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी । इसी बीच में अपनी रेल यात्रा का अनुभव करने लगा और मन ही मन सोचने लगा की वापस आकर अपने दोस्तों से इस अनुभव को बताऊँगा ।

इसी बीच एक आदमी भीड़ का फायदा उठाते हुए पिताजी के ज़ेब में हाथ डालकर उनका पर्स चुराने की कोशिश करने लगा पर भीड़ में धक्का लगने से उसके हाथ से पर्स निचे गिर गया ।

मैंने पर्स उठाकर पिताजी को दिया और उस जेबकतरे से अवगत करवाया । फिर तो अन्य यात्रियों ने मिलकर उसको जमकर सबक सिखाया, अगले स्टेशन पर उस जेबकतरे को पुलिस के हवाले कर दिया ।


मेरी पहली रेल यात्रा


सभी यात्री मेरी प्रसंशा करने लगे और इस बीच पिताजी भी मुस्कुराकर मुझे शाबाशी देने लगे और कहने लगे की आज मैं नहीं होता तो उनका पर्स चोरी हो चुका होता । उसके बाद क्या क्या हुआ उसका वर्णन अगली बार करूँगा लेकिन मेरी पहली रेल यात्रा मैं कभी नहीं भुला सकता ।

My First Train Journey - Meri Paheli Rail Yatra

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अनुभव अर्पित जैन










आपको ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद
शिव शर्मा



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Friday, 5 February 2016

Pahla Sukh Nirogi Kaaya - Health Benefits Of Turmeric


पहला सुख निरोगी काया - Happyness is a healthy body


स्वास्थ्य हमेशा से एक गहन गूढ़ का विषय रहा है । होगा ही, क्योंकि अगर स्वास्थ्य है तो सब कुछ है अन्यथा कुछ भी नहीं । एक स्वस्थ व्यक्ति को संसार हमेशा सूंदर दिखाई देता है परंतु एक अस्वस्थ व्यक्ति को हर रंग बेरंग ही नजर आता है ।

इसी विषय पर आज मैं आप सबके लिए सरलता से घर घर में उपलब्ध गुणकारी हल्दी से स्वास्थ्य लाभ लेने के कुछ अति साधारण नुस्खे ले के आया हुं, इसका लाभ अवश्य लें ।

किसी भी मौसम और खासकर सर्दियों के मौसम में यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं, तो आपको अपनी दिनचर्या और खाने-पीने में कुछ नियमों को अपनाना चाहिए।

आज हम हल्दी, जो कि एक बहुत ही गुणकारी औषधि है, के बारे में विस्तृत रूप में जानेंगे ।

हल्दी का वानस्पतिक नाम 'कुरकुमा लौंगा' है । वैज्ञानिक खोज के अनुसार हल्दी में एक तत्व पाया जाता है जिसका नाम है 'करक्यूमिन' जिसके बहुत ही फ़ायदे है । आइये जानते है हल्दी के फ़ायदो के बारे में :

१) हल्दी न केवल हमारे शरीर में रक्त को शुद्ध करती है बल्कि हमारे शरीर के ऊर्जा प्रवाह को भी सुचारू रूप से नियंत्रित करती है । हल्दी केवल बाह्य रूप में ही शरीर को फायदा नहीं पहुँचाती बल्कि हमारे शरीर के पुरे आतंरिक ऊर्जा तन्त्र को भी संचालित करती है ।

आप एक चुटकी हल्दी को एक बाल्टी पानी में मिलाये और इस हल्दी युक्त जल से स्नान करे, स्नान करने के बाद आप पाएंगे की आपकी त्वचा जीवंत हो उठेगी और आपको त्वचा में एक अद्भुत चमक का एहसास होगा ।

२) हल्दी ठण्ड के मौसम में बहुत ही उपयोगी है । बहुत से लोग ठण्ड के दिनों में सवेरे-सवेरे नाक बंद होने की समस्या से जूझते है ऐसे में हल्दी आपको राहत प्रदान कर सकती है । हल्दी, कालीमिर्च और शहद के मिश्रण को रात में लेकर सोने से आपको उपरोक्त समस्या से निजात मिल सकती है ।

३) हल्दी को ख़ाली पेट लेने से यह एक बहुत ही प्रभावकारी रूप से शरीर की आंतरिक सफ़ाई करती है । इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा होता है । इससे शरीर कई बीमारियों से बचा रहता है।

हल्‍दी में पाया जाने वाला 'लिपोपोलिसेकराईड' तत्‍व हमारे रोग प्रतिरोधक तंत्र को मजबूत बनाकर बीमारियों से हमारी रक्षा करता है।

४) चेहरे से दाग-धब्बे और काली झाइयां हटाने में हल्दी का कोई सानी नहीं। हल्दी और काले तिल को बराबर मात्रा में पीसकर पेस्ट बनाकर लगाने से आपकी त्वचा साफ और निखरी हो जाती है। हल्दी और दूध से बना पेस्ट भी त्वचा का रंग निखारने और चेहरे की कांति को बरक़रार रखने के लिए बहुत असरदार उपाय हैं।

५.) चोट लगने के समय हल्दी बहुत ही उपयोगी होती है । चोट से घाव बन गया हो या फिर मोच आ गई हो तो आप हल्दी के पेस्ट बनाकर उसको चोट वाली जगह पर बांधने से बहुत फायदा होगा और चोट से होने वाला संक्रमण भी समाप्त हो जाता है।

हल्दी वाले दूध के सेवन से भी चोट भीतर से ठीक होने लगती है।

६) मसाले के रूप में प्रयोग की जाने वाली हल्दी का सही मात्रा में प्रयोग पेट में जलन एवं अल्सर की समस्‍या को दूर करने में बहुत ही लाभकारी होता है।

हल्दी में पाया जाने वाला 'कुरकमिन' नामक तत्व के कारण ऐसा होता है और यही चिकित्सा में प्रभावी होता है। चिकित्सा क्षेत्र में शोध के मुताबिक 'कुरकमिन' पेट की बीमारियों जैसे जलन एवं अल्सर में काफी प्रभावी रहा है।

ऊपर आपने हल्दी के अनके प्रयोगो के बारे में जाना है अब आपको बताते हैं हल्दी वाले पानी को पीने के फायदे :-



हल्दी वाला पानी को बनाने के लिए आपको 1 गिलास पानी में छोटी चुटकी हल्दी डालनी है। हल्दी वाले पानी को पीने से आप दिल संबंधी अनके बीमारियों से बच सकते हो साथ ही आपका दिल हमेशा स्वस्थ रहेगा।

हल्दी वाले पानी का सेवन दिन में 3 से 4 बार भी करने से कोई नुकसान नहीं होगा। आपकी सेहत हमेशा ठीक रहेगी। हल्दी वाले पानी को पीने का एक और फायदा यह है कि आप विभिन्न बीमारियों से जैसे किडनी की परेशानी, खून की समस्या, लीवर और हार्ट जैसे रोगों से मुक्त रहोगे ।

तो आज आपने हल्दी के कई सारे औषधीय गुणों के बारे में जाना ।  आपने यह भी जाना की हल्दी आपकी सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है। इसलिए हल्दी का सेवन आप अवश्य करें ।

आगे भी मैं कोशिश करूँगा इसी तरह की कुछ अन्य स्वास्थ्य से सम्बंधित सूचनाएं आप तक पहुँचाने की । क्योंकि कहते हैं ना "पहला सुख, निरोगी काया ।"

Click here to read सेहत के शत्रु by Sri Shiv Sharma


संकलन अर्पित जैन




Wednesday, 3 February 2016

लापरवाह - Laparwah

लापरवाह

"अरे दिपक, तुम तो आज टूर पर कहीं जाने वाले थे ना ? कब की ट्रेन है तुम्हारी ?" राजेश ने चेताया तो दोस्तों के साथ कैरम खेलते दिपक को जैसे होश आया ।

"छह बजे की" उसने बताया और फुर्ती से उठा । फिर जल्दी जल्दी सामान बैग में डाला ।

"छह बजे की गाड़ी है और तुम अभी तक यहीं हो । पता है ना यहां से स्टेशन जाने में भी कम से कम एक सवा घंटा लगेगा । और तुम सामान भी अब पैक कर रहे हो । इतनी लापरवाही भी क्या काम की ।" राजेश ने थोड़ा गुस्सा सा दिखाते हुए उसे कहा ।

दिपक कुछ नहीं बोला और अपनी बैग जमाने में लगा रहा । निकलते निकलते साढ़े चार बज गयी । अब तो दिपक भी थोड़ा चिंतित हो उठा । रह रह के उसके दिमाग में सवाल उठ रहे थे ।


पता नहीं खाली टैक्सी समय से मिलेगी या नहीं, मिलेगी तो रास्ते में कितना ट्रैफिक होगा, अच्छा होता अगर और आधा घंटे पहले निकल जाता, केरम खेलते खेलते समय का पता ही नहीं चला, हे भगवान सहायता करना।

आदमी भी कितना अजीब होता है । लापरवाही खुद करता है और फिर भगवान को गुहार लगाता है, "हे भगवान, आज संभाल लेना, आगे से ध्यान रखुंगा" जैसे प्रण करता है और अगली बार फिर वो ही चीज दोहराता है ।

सौभाग्य से निचे उतरते ही उसे टैक्सी मिल गयी और टैक्सी वाला स्टेशन चलने को भी तैयार हो गया ।

दिपक ने चैन की सांस ली व टैक्सी में बैठते हुए टैक्सी वाले से गुजारिश की कि भैया मैं लेट हो गया हुं थोड़ा जल्दी पहुंचाने की चेष्टा करना । टैक्सी वाले ने जी बाबूजी कहकर टैक्सी आगे बढ़ा दी ।

वो कंपनी के कुछ क्रेताओं से मीटिंग के लिए नागपुर जा रहा था । कल ऑफिस में बैठ कर कंप्यूटर पर उसने मीटिंग के लिए कुछ बिंदु भी तैयार किये थे और सबके प्रिंटआउट ले लिए थे जो वो ट्रेन में दुबारा पढ़ने वाला था ।

अचानक उसे याद आया तो उसने अपनी बैग में देखा । उन कागजात की फ़ाइल बैग में थी ही नहीं । जल्दीबाजी में उसे वो घर पर ही भूल आया था । उसने फिर अपने आप को कोसा, काश और आधा घंटे पहले......  और फिर वही "हे भगवान, संभालना ।"


टैक्सी फर्राटे से दौड़ रही थी । हालांकि बीच बीच में ट्रैफिक की वजह से रफ़्तार थोड़ी कम भी पड़ जाती थी मगर फिर भी शायद ड्राईवर होशियार था इसलिए टैक्सी लगातार चल रही थी ।

ये पता होते हुए भी की अभी स्टेशन दूर है, दिपक बार बार उसे पूछ रहा था, "भैया और कितनी दूर है स्टेशन, हम समय पर पहुंच तो जाएंगे ना ।"

"बाबूजी, वो तो हम कैसे कह सकते हैं, रास्ता खुला मिला तो अभी कम से कम आधा घंटा और लगेगा ।"

दिपक ने घड़ी देखी, सवा पांच बज चुके थे । उसकी धड़कनें भी बढ़ने लगी । उफ़्फ़... काश थोड़ा और पहले निकला होता ।

बीच में दो चार जगहों को छोड़कर बाकि रास्ते में ज्यादा ट्रैफिक नहीं मिला । फिर भी स्टेशन परिसर में घुसते घुसते समय पांच बज कर पचास मिनट हो गया था ।

दिपक ने जल्दी से टैक्सी का भाड़ा चुकाया और भागता सा स्टेशन में घुसा । उसे ये भी पता करना पड़ा कि उसकी ट्रेन किस प्लेटफार्म पर लगी है ।

"अरे बड़ी जल्दी आ गए, भागो भाई 5 नंबर प्लेटफार्म की तरफ, गाड़ी चलने वाली है" पूछताछ केंद्र वाले ने लगभग झिड़कने वाले अंदाज में उसे बताया । लेकिन दिपक के पास ये सब समझने का वक्त ही कहां था, वो तो तोप से छूटे गोले की तरह प्लेटफार्म की तरफ भागा ।


गाड़ी प्लेटफार्म से सरकने लगी थी । गिरते पड़ते जैसे तैसे दिपक गाड़ी के पिछले डब्बे में चढ़ने में कामयाब तो हो गया लेकिन बुरी तरह हांफ रहा था । डब्बे के अन्य यात्री उसे हास्यास्पद नजरों से देख रहे थे । और दिपक हांफते हुए सोच रहा था काश, और आधा घंटे पहले.....।

खैर येन केन प्रकारेण दिपक को तो गाड़ी मिल गयी लेकिन बहुत बार थोड़ी सी लापरवाही की वजह से बहुतों की बहुत सी गाड़ियां छूट भी जाती है ।

दोस्तों, ये गाड़ी तो एक उदहारण थी । हमारे जीवन में और भी बहुत सारी बातें या काम होते हैं जो अक्सर हमारी थोड़ी सी लापरवाही की वजह से बनते बनते रह जाते हैं, परेशानियां उठानी पड़ती है सो अलग । बाद में हम सोचते हैं कि काश ये कार्य मैं और थोड़े समय पहले कर लेता । काश इस काम को मैं कल पर नहीं टालता । इत्यादि इत्यादि ।

इसीलिए शायद ये दोहा रचा गया था कि :

"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में प्रलय होयेगी, बहुरि करेगो कब"

जो करना है अगर सही समय पर किया जाये तो उसके परिणाम हमेशा सुखद निकलते हैं । अतः आप भी उपरोक्त दोहे को अपने जीवन में उतारें और शांतिपूर्ण जीवन का आनंद लें ।

फिर मिलेंगे मित्रों । कुछ नए विचारों के साथ । अभी नमस्कार ।

Click here to read "जा की रही भावना जैसी" by Sri Pradeep Mane


जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***






Tuesday, 2 February 2016

Akhir Kyun

आख़िर क्यूँ - Akhir Kyun
















आख़िर क्यूँ मुसाफ़िर जो गुज़र जाए किसी रास्ते से, 
उसके निशाँ-ए-क़दम पाये नहीं जाते । 
यादें बस जाती है हमारे मन में, 
जिसे हम चाह कर भी मिटा नही पाते ॥ 

आख़िर क्यूँ बहूत आसान है चेहरे पर झूठी मुस्कान को सजा लेना । 
कुछ ज़ख़्म ऐसे भी होते है जो भुलाये नही जाते ॥ 

कुछ उम्मीद के चिरागों को आज़ भी जला के रखा है मन में । 
आख़िर क्यूँ कुछ चिराग भुजाये नहीं जाते ॥ 



आज दुनिया में धर्म , मज़हब , जात-पात सब पाये जाते । 
आख़िर क्यूँ यहाँ सिर्फ़ "इंसान" पाये नहीं जाते ॥ 


आख़िर क्यूँ जिस प्यार को पाने के लिये दिल बहूत तड़पता है, 
वो इस दुनिया के लिए धोखा है । 
इस जहां में लोगों की कमी नहीं, 
फ़िर भी लोग प्यार करते पाए नहीं जाते ॥ 


आख़िर ऐसा क्यूँ होता है जो अनजान है मुझसे, 
कभी कभी शख्श वहीं हमसफ़र होता है । 
पर कैसे समझाये इस बाज़ार का दस्तूर उनको, 
जो एक बार बिक गये वो दोबारा खरीदें नहीं जाते ॥ 




आख़िर ऐसा क्यूँ होता है जब निकलो ढूँढने 
"इंसानो" को तो कदम भी साथ निभाते नहीं । 
कुछ तो रज़ा होगी उस ख़ुदा की भी यहीं, 
तभी "इंसान" आजकल पाये नहीं जाते ॥

जीने की ख्वाइश अब बची नहीं, 
फिर भी कफ़न क्यूँ कोई लाता नहीं । 
आख़िर क्यूँ इस मतलबी दुनिया में जिंदा लोग क्यूँ दफनाए नहीं जाते  ॥ 

ख़ामोशी से दम तोड़ देंगे कहीं भी, 
नाउम्मीद इस दिल में अब कोई ख्वाइश नहीं।
कल रात आखिरी हो ये एहसास आख़िरी हो, 
अब दो पल भी और इस जहां में जिये नहीं जाते ॥ 



Click here to read "नाम अगर रख दें कुछ भी" by Sri Pradeep Mane



...अर्पित जैन द्वारा रचित...





Monday, 1 February 2016

Jeevan Ek Sangharsh


जीवन एक संघर्ष

जीवन में अक्सर कई बार ऐसी परिस्तिथियां आ जाती है जहां हमें लगने लगता है कि अब सब कुछ समाप्त हो गया । हालात के आगे मजबूर होकर कुछ लोग गलत कदम भी उठा लेते हैं जो कि किसी भी समस्या का समाधान नहीं है ।

दोस्तों इस बात से आप भी सहमत होंगे कि ईश्वर की सबसे सूंदर रचना है मानव । उसने हमें अन्य जीवों की अपेक्षा बहुत ही बेहतर बनाया है ।

दो दो स्वतन्त्र हाथ पैर, एक खुला हुआ विस्तृत दिमाग, इन्ही हाथ पैर और मस्तिष्क की बदौलत मनुष्य ने क्या क्या नहीं कर दिखाया । इस दुनिया की खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए । चाँद पर पहुँच गए । बड़े बड़े जीवनोपयोगी अविष्कार कर डाले ।

मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता । बस जरुरत है तो सिर्फ थोड़े धैर्य और हौसले की । आदतानुसार मुझे इस बात पर किसी अनाम शायर का एक शेर याद आ रहा है ।

"जीवन में असली उड़ान अभी बाकी है
हमारे इरादों का इम्तिहान अभी बाकी है,
अभी तो नापी है बस मुट्ठी भर जमीन,
अभी तो सारा आसमान बाकी है ।"



ईश्वर ना करे कभी किसी के जीवन में अगर मायूसियों का दौर आ जाये तो टूटकर बिखरने की बजाय अपने हौसले को बनाये रखना और आगे बढ़ना । सफलता निश्चित ही आपके क़दमों में होंगी ।

जीवन के इसी संघर्ष पर एक कविता लिखने का प्रयास किया है । आशा है मेरी अन्य रचनाओं की तरह इस रचना को भी आपका स्नेह मिलेगा और आप इसे पसंद करेंगे ।

मुश्किल में घबराना मत
हालातों से डर जाना मत
वक्त पड़े गैरों के आगे
हाथ कभी फैलाना मत

कभी उजाला कभी अँधेरा
अभी निशा औ अभी सवेरा
वक्त सदा ही रहा बदलता
ना ये तेरा ना ये मेरा
जीवन है संघर्ष याद रख
इसको भूल ना जाना मत
मुश्किल में घबराना मत

मौसम आते जाते रहते
अक्सर हमें सताते रहते
पर दिलवाले हर मौसम में
मस्ती के नगमे गाते रहते
पानी बादल से ही बरसे
आँखों से बरसाना मत
मुश्किल में घबराना मत

दिल में कई अरमान है
राहें मगर अनजान है
माना डगर कठिन है लेकिन
करनी तुझे आसान है
छाले सैंकड़ों पड़े पाँव में
दुनिया को दिखलाना मत
मुश्किल में घबराना मत

जीवन में बाधाएं भी है
आड़ी टेढ़ी राहें भी है
आगे मगर खड़ी सफलता
देख फैलाये बाहें भी है
हाथ बढाकर इसे पकड़ ले
मौका चूक ना जाना मत
मुश्किल में घबराना मत



तुम ईश्वर की सूंदर रचना
तेरी हिम्मत का क्या कहना
तूने जब जब मन में ठाना
पर्वत को भी पड़ा है झुकना
जब तक मंजिल पा ना ले तू
चलता जा रुक जाना मत
मुश्किल में घबराना मत

कोशिश व्यर्थ नहीं जायेगी
मंजिल तेरे पास आएगी
एक दिन तेरे साथ देखना
तेरी दुनिया मुस्कायेगी
उस पल जीना नाचना गाना
किसी से भी शरमाना मत
मुश्किल में घबराना मत

कामयाबी पर गुरुर न करना
अपनों को तू दूर ना करना
जितना जरुरी जश्न मनाना
गैरजरूरी फितूर ना करना
याद रहे चादर से ज्यादा
अपने पैर फैलाना मत
मुश्किल में घबराना मत।।

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अभी के लिए विदा मित्रों । जल्दी ही फिर मुलाकात होगी ।

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जय हिन्द

*** शिव शर्मा की कलम से ***