Saturday, 13 February 2016

सात सुख - Saat Sukh

सात सुख


एक कहावत है जो अक्सर सुनने को मिल जाती है, आपने भी बहुत बार सुनी होगी "पहला सुख निरोगी काया" । इसके अलावा ये भी कहा जाता रहा है कि सातों सुख हर किसी को नहीं मिलते । क्या है ये सात सुख ? पहला सुख तो निरोगी काया है फिर बाकी के छह कौनसे सुख है ? जितनी मुझे जानकारी है आज आपसे साझा कर रहा हुं कि आखिर ये सात सुख है क्या ?

पहला तो आप जानते ही हैं की निरोगी काया यानि स्वस्थ शरीर । अगर शरीर स्वस्थ ना हो तो दुनिया का हर सुख बेमजा हो जाता है । जुकाम भी लग जाए तो पोंछते पोंछते कई बार आदमी की नाक छिल जाती है । छींकें, खांसी और बंद नाक पीड़ित व्यक्ति का हाल बेहाल कर देती है । ऐसे में अगर कहीं कोई उत्सव भी मनाया जा रहा है तो वो व्यक्ति उसका उतना आनंद नहीं ले पायेगा जितना कि दूसरे लोग ।

दुर्भाग्यवश यदि कोई और बड़ी बीमारी शरीर में घर कर जाए तो चिकित्सक हजार तरह की बंदिशें उस पर थोप देता है । मीठा मत खाना, तले हुए भोजन से परहेज करना । लंबी दूरी की यात्रा ना करें, नाचना कूदना आपके लिए घातक हो सकता है, मेहनत या थका देने वाला काम न करें, इत्यदि इत्यादि । अब वो व्यक्ति ताउम्र इन परहेजों की हथकड़ी पहने अन्य लोगों को देख देख कर मन ही मन घुटने के अलावा और कर भी क्या सकता है । यानि इन बातों का सार ये ही है कि अगर काया निरोगी है तो ही अन्य सुख काम के हैं अन्यथा सब बेकार है । इसीलिए कहा गया है की पहला सुख निरोगी काया ।

हमारे पूर्वजों ने दूसरा सुख बताया है "माया" यानि धन संपत्ति । पास में धन संपत्ति हो और पहला सुख भरपूर हो तो जीवन काफी आनंदमय हो जाता है ।

तीसरा सुख है गुणवान, संस्कारी जीवनसाथी । और चौथा सुख बताया गया है आज्ञाकारी संतान । यदि पत्नी समझदार है, अच्छे संस्कारों और गुणों से सुसज्जित है, तो व्यक्ति के लिए घर स्वर्ग समान हो जाता है, और सोने पे सुहागा हो जाता है जब संतान भी आज्ञाकारी हो । वो आदमी तो धन्य हो जाता है जिसको उपरोक्त चारों सुख मिल जाए ।

लेकिन बात सात सुखों की चल रही थी । देखा जाए तो ऊपर लिखे चार सुख भी विरलों को ही प्राप्त हो पाते हैं । कोई स्वस्थ तो है पर पैसों की तंगी है, ये दोनों है तो पत्नी का स्वभाव थोड़ा कड़वा है या संतान निरंकुश है ।

किसी भाग्यशाली के पास ये चारों है तो बाकि तीन और भी तो है । बुजुर्गों ने कुछ बताया है तो निश्चित ही उनकी बात में दम होगा ही होगा । जैसे पांचवे सुख को ही ले लीजिये । बहुत से लोग इस सुख से वंचित रह जाते हैं ।


पांचवां सुख बताया गया है स्वदेश में निवास । यहां स्वदेश का मेरे विचार से ये अर्थ है कि स्वदेश यानि वो स्थान जहां हमारे पुरखे रहते थे, जहां हमारे परिवार के सदस्य रहते हैं, जहां हम पले बढे, हमारी भाषा बोलने वाले हमारे जैसे ही संस्कारों और विचारों वाले लोग जहां है वो भूमि । ना कि पुरे देश में कहीं भी । विदेश तो खैर विदेश है ही ।

पहला सुख जिनके पास भरपूर होता है वो दूसरे सुख के लिए पांचवां सुख त्याग देता है । जीविकोपार्जन के लिए जरुरी भी है । धनोपार्जन होगा तभी तो दूसरा सुख मिलेगा ।

अब आता है छठा सुख । छठे सुख में बताया गया है की आदमी राज करे । उसके पास राज के जैसी शक्तियां हो । जो आज के समय में शायद ही किसी के पास है ।कुछेक अपवाद हो सकते है परंतु बहुतायत में हर कोई किसी ना किसी के तहत ही है ।  ताकतवर से ताकतवर आदमी भी किसी और की ताकत से ताकतवर बना हुआ है ।

अब बचा सातवां । अगर कोई सौभाग्य शाली बाकि छह सुखों का स्वामी है तो सातवां तो अवश्य ही उसकी पहुँच से दूर होगा । पहले के जैसे ही सातवें के बारे में भी एक कहावत बनी हुयी है "संतोषी सदा सुखी"।

जी हां, सातवां सुख बताया गया है संतोषप्रद जीवन, जो मुश्किल है । क्योंकि मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है । सात में से छह सुख मिल भी गए फिर भी संतोष नहीं मिलेगा । तृष्णा बढ़ती ही जायेगी । अपनी मेहनत और भाग्य से वो सबकुछ पा लेगा किन्तु जीवन भर संतुष्ट नहीं हो पायेगा । उसे हर पल लगेगा कि कुछ तो है जो छुट गया है ।

ये थे वो सात सुख जिनके बारे में अक्सर लोग कहते हैं की सातों सुख किसी को नहीं मिलते। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि वो आपको सातों सुखों से नवाजे । जल्दी ही फिर मुलाकात होगी दोस्तों । आज इजाजत चाहूंगा ।

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जय हिन्द

*** शिव शर्मा की कलम से***








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