Tuesday, 29 March 2016

Ishq Da Rog - इश्क दा रोग

इश्क दा रोग

पहली नजर के इश्क में डूबे, बाहर आना भूल गए
दिल की धड़कन तेज हुई, पलकें झपकाना भूल गए

कल उनको देखा था हमने, अपने घर की खिड़की से
उनके हुश्न में खोए ऐसे, पीना खाना भूल गए

खोये खोये गुमसुम से हम, रहने लगे अकेले में
जाने कैसा रोग लगा, कहीं आना जाना भूल गए

माँ ने कहा था आज शाम को, आटा चावल ले आना
उनके खयालो में गुम थे, हम राशन लाना भूल गए

साईकिल से टक्कर दे बैठे, नुक्कड़ वाले चाचा को
घंटी तो मारी थी लेकिन, ब्रेक लगाना भूल गए

सोते खाते उठते बैठते, सूरत वही नजर आये
बैठे तकते रहते चिलमन, कॉलेज जाना भूल गए

उनको लेकर इन आँखों ने, ख्वाब हजारों देख लिए
नई शेरवानी सिलवाली, कोट पुराना भूल गए

एक दिन हिम्मत कर के हमने, कह दिया मम्मी पापा से
ना जाने क्यूं आप हमारी, शादी कराना भूल गए



चश्मा ऊपर कर पापा ने, घूरा ऐसी नजरों से
रूह हमारी कांपी, मन की बात बताना भूल गए

धेला एक कमाता नहीं, और बात करे तू शादी की
फटकारों की आंधी चली, तो हम इतराना भूल गए

माँ ने फिर जासूसी कर, सारे हालात पता करके
ऐसी करी खिंचाई फिर हम इश्क लड़ाना भूल गए ।।


Click here to read ईमानदारी का इनाम writen by Sri Shiv Sharma

***शिव शर्मा की कलम से**









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Saturday, 26 March 2016

Bigadi Baat Bane Nahi

बिगड़ी बात बने नहीं


गली से उठते शोर की आवाजें सुनकर मुरली बाबू कारण जानने अपने घर से बाहर आये । उनके दो पड़ोसियों किशन और मनोहर में किसी बात को लेकर तू तू मैं मैं हो रही थी जो अब तक थोड़ा विकराल रूप ले चुकी थी । अन्य पड़ोसी उन्हें समझा बुझाकर शांत करने का प्रयास कर रहे थे । मुरली बाबू को देखकर दोनों थोड़ा चुप हुए ।

मोहल्ले में सब मुरली बाबू का बहुत आदर करते थे । वे वहां सबसे उम्रदराज और समाजसेवी व्यक्ति थे । पिछले वर्ष ही प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत होकर समाज कल्याण के कार्यों में लग गए थे । गुरूजी के नाम से प्रसिद्द मृदुभाषी और मिलनसार मुरली बाबू के व्यक्तिव में भी कुछ खास बात भी थी कि हर कोई उनकी बात को ध्यान से सुनता और उस पर अमल भी करने का प्रयास करता था ।

"क्या बात है किशन, मनोहर, क्यों झगड़ रहे हो ।" मुरली बाबू ने दोनों की और मुखातिब होकर पूछा ।

"देखिये ना गुरूजी, मनोहर का लड़का बंटी कितना शैतान है, रोज मेरी साईकिल की हवा निकाल देता है ।" किशन ने जवाब दिया और शिकायत जारी रखी ।

"आज मैंने उसे जब रंगे हाथों पकड़ लिया और मनोहर से शिकायत की तो ये कहता है कि बच्चे हैं, बच्चे शैतानियां नहीं करेंगे तो कौन करेगा ।"

"हां तो सही ही तो कहा है मनोहर ने" गुरूजी ने मुस्कुराकर कहा । "बच्चे चंचल नहीं होंगे, शरारतें, शैतानी नहीं करेंगे तो फिर क्या बच्चे । भूल गए, बचपन में तुम और ये मनोहर भी, मेरी साईकिल की हवा निकाल दिया करते थे, वर्माजी की डोर बेल बजाकर भाग जाया करते थे । हमने तो कभी तुम लोग के पिताजी से शिकायत नहीं की, उल्टे हम तो तुम और अन्य बच्चों की शरारतों का आनंद लिया करते थे । और आज तुम ही इतनी सी बात का इतना बड़ा बतंगड़ बना रहे हो ।"

शायद किशन और मनोहर भी उन बातों को याद करके अपनी भूल समझ चुके थे, किशन ने मनोहर, गुरूजी और अन्य लोगों से क्षमा मांगी और मनोहर से गले मिलकर सारे शिकवे दूर किये । कितनी सहजता से गुरूजी ने मामला सुलझा दिया था ।

दोस्तों ये तो एक कहानी थी । लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि कई बार हम भी इसी तरह की छोटी छोटी और बे सिर पैर की बातों को लेकर अपने पड़ोसियों, रिश्तेदारों से अनबन कर बैठते हैं, उन्हें खरी खोटी सुना देते हैं और रिश्तों में खटास पैदा कर लेते हैं । नतीजा ये होता है कि संबंधों में कड़वाहट और दूरियां बढ़ती जाती है ।

बाद में वही स्तिथि, वही घटना जब हमारे साथ घटित होती है तब हमें पछतावा होता है । हम शर्मिंदा भी होते है, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है । क्योंकि कहते हैं ना कि गोली का घाव समय के साथ भर जाता है मगर बोली का घाव नहीं भरता ।

कई छोटे छोटे वाकये ऐसे होते हैं जिन्हें हम बेवजह ही तूल दे देते हैं, कई लोगों की तो जैसे आदत ही होती है शिकायतें करने की । उस तरह के लोग अक्सर अकेले हो जाया करते हैं ।

हमें चाहिए कि जीवन में होने वाली बहुत सी इस तरह की छोटी छोटी बातों को दिलोदिमाग में जगह ही ना दें । जैसे कोई अगर आपको अपने घर के किसी उत्सव में बुलाना भूल गया तो उसे उलाहना देने की मेरे विचार से कोई जरुरत नहीं होती । हो सकता है उसके उस काम में आपको शामिल करना जरुरी ही नहीं था या वो भागदौड़ में सच में आपको बुलाना भूल गया हो ।

अब अगर वो भूल गया था, तो यकीन मानिए, उसके मन में भी अवश्य ही इस बात का मलाल रहेगा और एक दिन वो खुद ही आपसे क्षमा मांग लेगा । परंतु उस से पहले अगर आपने उसे इस बात के लिए ताना दे दिया तो बात और सम्बन्ध दोनों बिगड़ भी सकते हैं एवं आप एक मित्र एक बेतुकी सी बात के लिए खो सकते हैं ।

उपरोक्त उदहारण जैसी ही कई और बातें भी जिंदगी में होती रहती है, मगर समझदारी इसी में है की हम व्यक्ति को महत्व दें बजाय इस तरह की बात बिगाड़ने वाली बातों के । क्योंकि बिगड़ी बात फिर बननी मुश्किल हो जाती है । जैसे रहीम जी ने भी कहा था,

"बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगड़े दूध को, मथे न माखन होय॥"


इन्ही विचारों के साथ आज आप सबसे विदा चाहूंगा । अपना और अपनों का ख्याल रखें । फिर मिलते हैं ।

जय हिन्द

*** शिव शर्मा की कलम से ***







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Thursday, 24 March 2016

Rangon Ka Tyohar Aaya - रंगों का त्योंहार आया

रंगों का त्योंहार आया


सर्वप्रथम आप सबको रंग और उमंग भरे पावन पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।

होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है । जब भक्त प्रहलाद को मारने के उद्देश्य से होलिका, जिसे अग्नि में नहीं जलने का वरदान प्राप्त था, उन्हें लेकर आग में बैठी तो वो जलकर भष्म हो गई और विष्णु भक्त प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ । तब से होली का त्योंहार आरम्भ हुआ ।

साथ ही होली का ये पर्व हमें ये सन्देश भी देता है कि हमारे अंदर होलिका के रूप में जो कई तरह की बुराइयां जैसे ईर्ष्या, क्रोध, कटुताएं इत्यादि विद्यमान है, उनका हम आज दहन कर दें और सब वैर भाव, शत्रुता और वैमनस्य भुलाकर सद्भावना एवं भाईचारे के साथ आने वाले नववर्ष का स्वागत करें । और ईश्वर की भक्ति में मन लगाएं ।


होली के इस मौके पर एक छोटी सी कविता लिखी है, आशा करता हूँ हर बार की तरह इस बार भी मेरी ये रचना आपको पसंद आएगी । आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी ।


मौसम ने नया रूप दिखाया
सर्दी गयी वसंत मुसकाया
उमंगों के लेकर तोहफे
रंगों का त्योंहार आया

थाप चंग पर पड़ने लगी है
हरी भंग भी घुटने लगी है
गली मुहल्लों के नुक्कड़ पर
कई टोलियां जुटने लगी है
हर चेहरे पर नटखटपन की
मस्ती का खुमार छाया

गीत फाग के मन को भाये
कान्हा मुरली मधुर बजाये
मतवाले मस्ती में खो कर
खुद नाचे औरों को नचाये
रंग रंगीला फागुन महीना
खुशियां बेशुमार लाया

रंग गुलाल अबीर उड़ रही
पिचकारी की धार उमड़ रही
ऊंच नीच के भेद मिट रहे
मन से मन की डोर जुड़ रही
मैल धूल गए दिल के सारे
दिल में भर भर प्यार लाया



तन भीगे हैं मन भीगे हैं
धरती और गगन भीगे हैं
रंगों की बौछार में देखो
राधा और किशन भीगे हैं
कृष्ण की बंसी की धुन राधे की
पायल की झनकार लाया
उमंगों के लेकर तोहफे
रंगों का त्योंहार आया ।।

अंत में एक बार फिर आपको होली की शुभकामनाओं के साथ इजाजत चाहूंगा । जल्दी ही फिर मिलेंगे ।

जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***








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Sunday, 20 March 2016

Holi Ki Umang

होली की उमंग

नमस्कार दोस्तों । मस्ती भरा, उमंग भरा होली का त्योंहार आ रहा है । आप सभी को होली की ढेर सारी अग्रिम शुभकामनाएं । सुरक्षित और आनंद भरी होली मनायें ।

होली का मौका है, फागुनी बयार बह रही है, तो मैंने भी इस बार ये ही विषय चुन लिया कुछ लिखने को, फिर जब लिखना शुरू किया तो एक कविता बनती गयी, जो आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ । कैसी लगेगी ये तो आप अपने कमेंट्स से बता ही देंगे, फिलहाल कविता का आनंद लीजिये ।


अबकी होली में
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आओ कुछ ऐसा कर जायें यारों अबकी होली में
मनमुटाव मतभेद मिटायें यारों अबकी होली में

नहीं रहे कोई ख़फ़ा ख़फ़ा अब कोई ना नाराज रहे
नफरत कोसों दूर रहे कोई मन में मैल ना आज रहे
हर रूठों को चलो मनायें यारों अबकी होली में
प्रेम से उनको गले लगाएं यारों अबकी होली में



तरह तरह के मीठे व्यंजन खूब बनेंगे घर घर में
कुछ बच्चे भूखे भी होंगे अपने घर के बाहर में
खुद खाएं उनको भी खिलाएं यारों अबकी होली में
उनकी दुआएं घर ले आएं यारों अबकी होली में

फागुन की मस्ती में झूमें लेकिन एक ख़याल रहे
कुछ ऐसा ना कर देना की बाद में उसका मलाल रहे
सब के दिलों में बस छा जायें यारों अबकी होली में
खुशियां बाँटें ख़ुशी मनायें यारों अबकी होली में

ढोल मंजीरे चंग बांसुरी की धुन मन को भाती है
रसिकों की टोली मिल मीठे गीत फाग के गाती है
हम भी थोड़े ठुमके लगाएं यारों अबकी होली में
मस्ती हो जाये नाचे गायें यारों अबकी होली में

रंगों का त्योंहार सुहाना सबके मन खिल जाते हैं
ले के बहाना होली का कई बिछड़े हुए मिल जाते हैं
बचपन के मित्रों को बुलायें यारों अबकी होली में
सारे शिकवे गिले भुलाएं यारों अबकी होली में

रंग लगा ना पाये जिनको पिछले बरस की होली में
बहला दिया था बना बहाने फुसला दिया ठिठोली में
घर से बाहर खिंच के लाएं यारों अबकी होली में
फिर जम कर उनको रंग लगाएं यारों अबकी होली में



कौन गैर है कौन पराया धर्म जात से क्या मतलब
दूर दूर जो दिल करदे ऐसी बात से क्या मतलब
मिलजुल कर त्योंहार मनायें यारों अबकी होली में
दिल ना किसी का दुखने पाये यारों अबकी होली में

आओ कुछ ऐसा कर जायें यारों अबकी होली में
मनमुटाव मतभेद मिटायें यारों अबकी होली में


एक बार पुनः आपको होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ आज के लिए विदा लेता हुं । जल्दी ही फिर मिलते हैं ।

जय हिन्द

Click here to read "कलियुगी रावण" Written by Sri Shiv Sharma

*** शिव शर्मा की कलम से ***


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Wednesday, 16 March 2016

Bhatkte Kadam

भटकते कदम


गरीब परिवार का एक लड़का अजय पढाई में बहुत होशियार था । बड़ा होकर डॉक्टर बनने का सपना उसकी आँखों में पल रहा था, और उसी के मद्देनजर वो पूरी लगन से अपनी पढाई में लगा हुआ था ।

उसके परिवार जनों ने भी उसको ले के बहुत से सपने पाल रखे थे कि बेटा पढ़लिख कर कुछ लायक बन जाये तो हमारी गरीबी दूर हो ।

समय अपनी रफ़्तार से चलता रहता है । अजय हर क्लास में अच्छे नंबरों से पास होता गया । स्कूल से निकलकर कॉलेज में आ गया ।सरकारी कॉलेज थी । सरकार की तरफ से काफी तगड़ा अनुदान उस कॉलेज को मिलता था इस वजह से वहां की फीस और होस्टल इत्यादि का खर्च लगभग ना के बराबर ही था ।

शायद ये कॉलेज अजय जैसे छात्रों के लिए ही था जो पढ़ना चाहते हैं मगर पैसों की वजह से मज़बूरी में उन्हें पढाई बीच में छोड़नी पड़ जाती है ।

नया वातावरण, नए नए लोग । स्कूल जितनी बंदिशें भी यहाँ नहीं थी । कुछ ही दिनों में अजय के काफी सारे नए दोस्त भी बन गए थे जिनमें लगभग हर तरह के लड़के शामिल थे । कुछेक पढ़ाकू थे लेकिन अधिकतर मस्तीखोर ही थे, जिनका कॉलेज में एडमिशन लेने का मकसद ही ढेर सारी मस्तियाँ करना था ।

एकदम स्वच्छंद खुली हवा में अपने नए मित्रो के साथ, कॉलेज का प्रथम वर्ष पूरा होते होते अजय उस वातावरण के रंग में पूर्णतया रंग चूका था । कॉलेज के कुछ कार्यक्रमों में उसने दो चार बार मंच से भाषण भी दिए जिस वजह से पुरे कॉलेज में उसकी पहचान बन गयी थी । और अजय अपने आप को स्टार समझने लग गया था ।

नेतागीरी का भूत भी उसके सर पर सवार हो चूका था । स्टार तो था ही अपनी नजर में, उस पर उन्ही कथित दोस्तों के कहे में आकर उसने कॉलेज के छात्रसंघ के चुनाव में थोड़ी ना नुकर के बाद अपना नामांकन करवा दिया ।

चुनाव आने तक काफी उठापटक भी हुयी, पुराने और सीनियर "नेता" इस बात को हजम नहीं कर पा रहे थे की प्रथम वर्ष का छोकरा उनके सामने चुनाव लड़ेगा ।

चुनावों के दौरान अजय को पता चला की बहुत सी राजनितिक पार्टियां भी कॉलेजों के चुनाव में दिलचस्पी लेती है । उसे भी एक दो पार्टियों का समर्थन, संरक्षण और कुछ पैसे भी मिले ।

निश्चित समय पर चुनाव हुए और आश्चर्यजनक रूप से परिणाम उसके पक्ष में आ गया । अब वो कॉलेज छात्रसंघ का अध्यक्ष बन चूका था । उसे लगने लगा कि वो एक "हस्ती" बन चूका है ।

उसके चारों और भीड़ रहने लगी । धीरे धीरे भाषण बाजी का शौक उसकी आदत में शुमार होता गया । अब वो हर मुद्दे पर कहीं भी कभी भी शुरू हो जाता और कॉलेज प्रशाशन के खिलाफ अनर्गल बातें करना शुरू कर देता । उसके आजु बाजू अंगरक्षक की तरह रहने वाले लड़के लड़कियां तालियां बजाकर उसकी हौसलाअफजाई करते रहते । उस वक्त वो खुद को किसी शहंशाह से कम नहीं समझता । एक पढ़ाकू लड़के के कदम बहक रहे थे ।

धीरे धीरे उसके भाषण उग्र होते गए । कॉलेज प्रशाशन और वाकई पढ़ने आये छात्रों को काफी असुविधा होने लगी । लेकिन क्या करें । वो अध्यक्ष जो था ।

एक दिन किसी मुद्दे पर हमेशा की तरह कॉलेज प्रशाशन के खिलाफ अंटशंट बोलते बोलते जोश में होश खो बैठा और कॉलेज के ट्रस्टीज यानि सरकार के बारे में बहुत कुछ बोल गया । कुछ ऐसे वैसे नारे भी लगा डाले ।

उन नारों को सुन कर उसकी बातों पर तालियां बजाने वाले लड़के जोश में आके भड़क उठे और तोड़ फोड़ करके कॉलेज की संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया । उनको समझाने आये कॉलेज के एक लेक्चरर पर अजय ने हाथ भी उठा दिया और उन्हें बुरी तरह मारा पीटा ।

मामला गंभीर होते देख प्रिंसिपल ने पुलिस बुला ली । पुलिस की गाड़ी के साइरन की आवाज जैसे ही कॉलेज की फ़िजां में गूंजी, तो अध्यक्ष महोदय के होश, और हमेशा घेरे रहने वाले लड़के, दोनों गायब हो गए ।

पुलिस उसे उस दिन पकड़ कर जो पूछताछ के लिए ले कर क्या गयी, अजय आज तक वापस नहीं आया है । अदालत ने उसे सजा सुना कर जेल भेज दिया ।

उसके कुछ साथियों को भी जेल और कुछ पर जुर्माने की सजा मिली । क्योंकि वो सारी घटना कॉलेज प्रांगण में लगे केमरे में कैद हो चुकी थी जो उनके खिलाफ काफी मजबूत सबूत था । कॉलेज ने उसे कॉलेज से निष्काषित कर दिया ।

अजय के पिता इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया है, उसकी माँ छोटे मोटे काम करती है और जैसे तैसे घर खर्च चला रही है । उनकी गरीबी दूर करने वाला बेटा तो जेल में है ।

उधर जेल में बैठा अजय शायद ये ही सोच रहा होगा ।

"एक गलत कदम उठा जो राहे शौक में,
मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूंढती रही ।"

नोट : उपरोक्त कहानी महज एक काल्पनिक कहानी है और इसका किसी भी घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है ।

Click here to read "आखिर दीवाली जो है" Written by Sri Shiv Sharma


...शिव शर्मा की कलम से...









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Thursday, 10 March 2016

मतलब की दुनिया - Matlab Ki Duniya

मतलब की दुनिया


ऊपर प्यार जताने वाले
पीछे आग लगाने वाले
बच के रहना उन लोगों से
बहुत हैं दिल जलाने वाले

अक्सर दर्द वही देते हैं
खुद को हमदर्द बताने वाले
आँख खोल पहचान ले उनको
कौन है तुझे सताने वाले



कुछ भी करले नहीं रुकेंगे
चले ही जाते हैं जाने वाले
फ़ना हो गए जो कहते थे
मिट गए हमें मिटाने वाले

जाने किस कोने में छुप गए
जो इंकलाब थे लाने वाले
नाहक ही तूफ़ान से डरते
किनारों पे नाव चलाने वाले


अपने जख्म छुपाके रखना
बिखरे पड़े हैं नमक लगाने वाले
हंसते हैं औरों का दर्द देखकर
बहुत बेदर्द है जमाने वाले

नादानियां भी कर बैठते हैं
समझदार कहलाने वाले
सोच समझ के करना फैसला
इस्तेमाल ना करले बरगलाने वाले

पी जाते हैं हजारों ग़म
महफ़िलों में मुस्कुराने वाले
कमाल का हुनर रखते है
हंसी में दर्द छुपाने वाले

खोजते रहो मतलबी दुनिया में
कहां मिलते हैं लोग पुराने वाले
अपने पराये की परख रखना
खंजर रखते हैं गले लगाने वाले

भरे पड़े हैं इस दुनिया में
हवाई किले बनाने वाले
कभी सफल भी हो जाते हैं
अँधेरे में तीर चलाने वाले



मुश्किलों में सर पकड़ के रोते
ज्यादा अकड़ दिखाने वाले
चैन की नींद वही सोते जो हैं
प्यार से रिश्ते निभाने वाले

मिटटी डालो उन सब पर "शिव"
जो किस्से हैं भुलाने वाले
जी भर जी लो क्योंकि ये पल
लौट के फिर ना आने वाले

Click here to read "कलियुगी रावण" written by Sri Shiv Sharma


***शिव शर्मा की कलम से***









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Monday, 7 March 2016

Aam Admi - आम आदमी

आम आदमी

भीड़ भाड़ में अक्सर भैया
धक्के खाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी

"ख़ास" आदमी ताकत पा कर
जब ऊँचा उठ जाता है
उतनी ऊंचाई से फिर उनको
"आम" कहां दिख पाता है
अपना काम कराने उनके
नाज उठाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी

दस से छह की करे चाकरी
बॉस के ताने सुनता है
शाम को घर में बैठा वो
मुंगेरी सपने बुनता है
सपनों में जीता और
सपनों में मर जाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी


बचपन बीता मुफलिसी में
यौवन में गम पीता है
सिमित कमाई खर्चे ढेरों
घुट घुट जीवन जीता है
फूटी कोड़ी नहीं बचत
पर बजट बनाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी

महंगाई बैरन बन बैठी
सुरसा के मुंह सी बढ़ती है
दोनों हाथों से गरीब की
गर्दन ऐसी पकड़ती है
पूरा जीवन कभी शांति से
जी ना पाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी

पांच वर्ष पश्चात नेताजी
हाथ जोड़ कर आते हैं
अपनी मीठी बातों से
कुछ ख्वाब हसीन दिखाते हैं
चिकनी चुपड़ी बातों में
फिर से फंस जाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी



सरकारें नित नई बदलती
फर्क नज़र ना आता है
ख़ास आदमी हाथी जैसा
ताकतवर बन जाता है
अपने नेता के स्वागत को
दरियां बिछाता आम आदमी

भीड़ भाड़ में अक्सर भैया
धक्के खाता आम आदमी
कुछ "आमों" को वोट से अपने
"ख़ास" बनाता आम आदमी

Click here to read "सर्दी आई सर्दी आई" Written by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***










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Thursday, 3 March 2016

Dar Ke Aage Jeet Hai

डर के आगे जीत है

शाम को ऑफिस से घर आते समय बात बात में हमारे एक साथी ने एक चुटकुला सुनाया । हालांकि पहले सुना हुआ था, लेकिन आज जब फिर सुना तो मुझे उस चुटकुले में एक प्रेरणा दिखाई दी और वो आप सबसे साझा करने के लिए कलम उठा ली ।

ये चुटकुला शायद आप सबने भी सुना होगा जो कुछ इस प्रकार था कि,

"एक बार नदी में कोई आदमी डूब रहा था । वो जब भी पानी से ऊपर आता तो बचाओ बचाओ की पुकार लगाता ।

दुर्भाग्यवश नदी किनारे खड़े व्यक्तियों में से या तो कोई भी शायद तैरना नहीं जानता था और या फिर नदी के पानी की गहराई देख के साहस नहीं हो रहा था । सब एक दूसरे का मुंह देख रहे थे, शायद मन ही मन कह रहे थे कि कोई तो इस बेचारे को बचालो ।

इतने में छपाक की आवाज आई, सबने देखा की 22-23 साल का एक नौजवान नदी के पानी में कूदा और उस डुबते व्यक्ति को सुरक्षित बाहर निकाल लाया । सब उस नौजवान की प्रशंशा करने लगे ।


उसकी पीठ थपथपा कर किसी ने कहा आपने बहुत अच्छा प्रशंशनीय कार्य किया है । एक जान बचा दी । ईश्वर आपको इसका फल जरूर देगा ।

उस नौजवान ने कहा "वो सब तो ठीक है, मगर मुझे ये बताओ की मुझे धक्का किसने मारा था ।""

ये तो महज एक चुटकुला था मित्रों । मगर इसमें एक सन्देश छुपा हुआ था कि हम में क्षमता होते हुए भी हम कई बार सिर्फ किसी डर की वजह से बहुत से मौके हाथ से निकल जाने देते हैं, उनका लाभ नहीं उठा पाते । जिंदगी में कई अवसर हम महज छोटे छोटे डरों से डर कर गंवा देते हैं ।

वो लड़का तैरना जानता था, लेकिन नदी की गहराई से डर कर वो उस आदमी को बचाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था । वहीँ जब किसी ने उसे धक्का मार दिया तो वो उस डुबते को भी बचा लाया और शायद उसके दिलोदिमाग से भी गहराई का डर निकल गया ।


इसी तरह के बहुत से टेलेंट हमारे अंदर छुपे हुए होते हैं । उस डुबते व्यक्ति की जगह आप अवसरों को और उस लड़के की जगह खुद को रखकर सोचें कि कितने अवसर आये होंगे जिंदगी में, लेकिन हमने नदी की गहराई से डर कर उस अवसर को "डूबने" के लिए छोड़ दिया और बाद में पछताए की काश उस वक्त थोड़ी सी हिम्मत कर लेता ।

मित्रों, यकीन मानिए, जरुरत है सिर्फ थोड़े से साहस की । जब तक हम अपने अंदर छुपे हुए आत्मविश्वास को नहीं पहचानेंगे, जब तक थोड़ी जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं जुटाएंगे तब तक हम जीवन की कई चुनौतियों से बिना कुछ किये ही हार मान लेंगे ।

ईश्वर की सबसे सूंदर रचना है हम, उसने हमें सभी जीवों में श्रेष्ठ बनाया है । कुछ भी कर सकने के काबिल बनाया है ।

हमें बस इतना करना है कि हम खुद की काबिलियत पर भरोसा करें और जीवन में आने वाले अवसरों का लाभ उठायें । मन से हर तरह का डर निकाल फेंके, यक़ीनन जीत तुम्हारी ही होगी । क्योंकि किसी ने कहा था, डर के आगे जीत है ।

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जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***



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