Thursday, 21 April 2016

Adhura Prem - अधूरा प्रेम


अधूरा प्रेम
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नमस्कार दोस्तों । आपकी महफ़िल में एक छोटी सी ग़ज़ल ले के आया हूँ, उम्मीद है "संयोग" की तरह इसे भी आप खूब पसंद करेंगे ।

ये ग़ज़ल एक ऐसे प्रेमी को मद्देनजर रख के लिखने की चेष्टा की है जो अपनी प्रेमिका से लगभग एकतरफा प्रेम करता है और उसका साथ पाने के लिए अंत तक उम्मीद का दीपक जला के रखता है ।

परंतु उसकी कथित प्रेमिका को या तो उसके प्रेम का पता ही नहीं होता है या वो अपने प्रेम का इजहार करने से डरती है ।

मेरा ये प्रयास कितना सफल रहा ये तो आप बताएँगे तभी जान पाऊंगा इसलिए बताना जरूर ।

अधूरा प्रेम
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हम थक से गए इजहार करते करते
मिलने भी गए थे कई बार डरते डरते

जमाने का डर था या कोई अनजाना ख़ौफ़
वो बाज ना आये इनकार करते करते

यकीं था कि कभी तो तरस खाएंगे
तनहाई डसती रही इंतजार करते करते

क्या पता कब नदी अपना रुख मोड़ ले
इस पार चली आये उस पार बहते बहते

जज्बा है जिगर में और मुहब्बत पे यकीन
जवां हो गया दिल में प्यार पलते पलते

कुछ तो उनके दिल में भी है शायद
पर चुप हो जाते हैं, कई बार कहते कहते


बन के दुल्हन एक दिन रुखसत हो गए
एतबार टूट गया एतबार करते करते

वक्त के साथ पानी बर्फ बन ही जाता है
आँखों में जम चुकी है इक धार बहते बहते

उम्मीद की शमा भी "शिव" कब तक जलती
पिघल के बह गई लगातार जलते जलते ।।


जय हिन्द मित्रों । फिर मिलेंगे ।

Click here to read जा की रही भावना जैसी Written by Sri Pradeep Mane


***शिव शर्मा की कलम से***









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Saturday, 16 April 2016

Sanyog - II - संयोग (भाग-2)

संयोग (भाग-2)

....अब तक आपने पढ़ा की सर्वगुण संपन्न होने के बावजूद अजय की सगाई का कोई संयोग नहीं बन पा रहा था । कई अवांछित अड़चनें बीच में आ रही थी । फिर एक दिन अजय की बहन ने पुराने अखबार में एक विज्ञापन देखा और....

.. अब आगे......


लेकिन ये तो पांच महीने पुराना विज्ञापन है । भाभी ने कहा ।

"तो क्या हुआ, फोन करने में क्या हर्जा है भाभी, ज्यादा से ज्यादा ये ही तो हो सकता है कि वो लोग कहेंगे कि इसका रिश्ता या शादी हो चुकी है ।" अनु ने सुझाव दिया । "अगर ये जवाब मिला तो बात वहीँ ख़त्म, नहीं तो अजय भैया के लिए ये लड़की सही हो सकती है अख़बार में दिए गए विवरण के आधार से देखें तो"।

बात सही थी । लड़की पढ़ी लिखी, सूंदर और पच्चीस वर्ष की थी । भाभी को भी बात जंच गयी और मन में विश्वास लिए उसने भैया से अख़बार में दिए गए फ़ोन नंबर पर फ़ोन बात करने को कहा जो अखबारानुसार उस लड़की के बड़े भाई का था ।

"हेल्लो" सामने से आवाज आई तो भैया ने उत्सुकतावश सीधे ही पूछ लिया ।

"हेल्लो, हां जी नमस्ते, संयोग से आज एक पुराना अख़बार हाथ में आ गया, उसमें वर वधु चाहिए वाले कॉलम में आपकी बहन दिव्या के विवरण पर नजर पड़ी तो आपको फ़ोन किया ।

वैसे ये विज्ञापन पांच महीने पुराना है, क्या मैं जान सकता हूँ की दिव्या का कहीं रिश्ता पक्का हो गया या आप अभी लड़का ढूंढ रहे हैं । दरअसल मेरे छोटे भाई के रिश्ते के लिए हम भी एक लड़की की खोज में है ।"

"जी नमस्ते," लड़की के भाई ने शालीनता से जवाब दिया, "जी हां, अभी कहीं रिश्ता हुआ नहीं है, कुछ रिश्ते आये थे लेकिन किन्ही कारणों से कहीं रिश्ता हो नहीं पाया । वैसे आप बोल कहां से रहे हैं, और आपके छोटे भाई क्या करते हैं ?"

"दिल्ली से बोल रहा हुं जी, आपके शहर के पास से ही । भाई दुबई की एक कंपनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत है ।"

"ये तो अच्छी बात है, फिर आप अगर उचित समझें तो आ जाइये, मम्मी पापा से मिल लीजिये और लड़की देख लीजिये । बाकि बातें साथ बैठकर कर लेंगे । क्या पता कोई संयोग बन जाये ।"

"ठीक है जी, हम इस रविवार को आ रहे हैं ।" अनु ने देखा कि फ़ोन रखते वक्त भैया और भाभी के चेहरे पर सुकून के भाव थे । अनु भी मुस्कुरा दी ।

फ़ोन रखकर भैया हम से मुखातिब हुए और बोले, "यदि इस विज्ञापन में जो लड़की का विवरण दिया है, वो सही है तो ये लड़की अपने अजय के लिए सही हो सकती है । मैं माँ, पिताजी और अजय से बात करता हुं ।"

माँ से विचार विमर्श करने पर माँ ने भैया से कहा कि तुम, बहु और अनु जा के लड़की और उसका घर परिवार देख आओ । अजय ने भी तो कहा है की वो एक सप्ताह की छुट्टी ले कर आ सकता है, तो अगर बात बनती लगे तो अजय को बुला लेंगे और सगाई की रस्में कर लेंगे । पिताजी ने भी सहमति में सर हिलाया । अब बस इंतजार था रविवार का ।

अगले दो दिन में घर की साफ़ सफाई पूरी हो चुकी थी । आज शनिवार हो गया था । अजय की भाभी ने कल की तैयारियां शुरू कर दी थी ।

"कल सुबह हम 9 बजे यहाँ से निकलेंगे ।" भैया ने बताया । "उस वक्त यातायात भी थोड़ा कम रहेगा और मैंने उन लोगों को दस बजे का समय दिया है । हमें कम से कम एक घंटा तो लग ही जाएगा वहां पहुँचते पहुँचते । सो तैयार रहना ।"

माँ के कहने पर वे लोग सवा नो बजे घर से निकले लेकिन रास्ते में ज्यादा ट्रैफिक नहीं था अतः ठीक दस बजे वे अपने गंतव्य तक पहुँच गए थे ।

प्रथम दृष्टया उन्हें दिव्या का परिवार बहुत ही भद्र और व्यवहार कुशल लगा । उसका बड़ा भाई कॉलेज में प्रोफेसर था । पिताजी बैंक की नोकरी में थे । दो वर्ष पूर्व ही रिटायर हुए थे और अभी सामाजिक कार्यो में अपना वक्त देते थे ।



कुछ देर बाद वो वक्त आया जिसके लिए खासतौर पर भाभी कुछ ज्यादा ही उतावली थी । सूंदर सी पोशाक पहने हाथ में चाय की ट्रे लिए दिव्या आई । भाभी और अनु तो उसे देखते ही पसंद कर बैठे । रही सही कमी उसकी शालीनता और समझ भरी बातों ने पूरी कर दी । लगता था जैसे ये ही लड़की थी जिसे वे अब तक ढूंढ नहीं पाये थे ।

गृहकार्यों में निपुण दिव्या काफी पढ़ी लिखी भी थी । लम्बाई भी अजय से अमूमन 2 या 3 इंच कम होगी । कुल मिलाकर भाभी को तो वो इस हद तक भा गयी की उन्होंने दिव्या की माँ से कह दिया की हमें तो लड़की पसंद है । अगले हफ्ते तक अजय आ जायेगा तब आप हमारे यहाँ आ जाना । जिस घर में लड़की ब्याहने की बात चल रही है वो घर और हमारे देवर को भी देख लेना ।

दिव्या की माँ के चेहरे पर भी प्रसन्नता की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थी । उन्होंने अगले हफ्ते आने के लिए हां करदी ।

घर आकर अजय की माँ को जब ये सारी जानकारियां दी गयी तो उनकी ख़ुशी का कोई पारावार ना था ।

शुक्रवार को अजय आ गया था । आज रविवार को दिव्या के परिवार वाले आने वाले थे और वे अब किसी भी क्षण पहुँच सकते थे । सब परिवार वाले व्यस्त नजर आ रहे थे । आखिर अजय की सगाई का सवाल था ।

पंद्रह मिनट बाद वे लोग आ गए । दिव्या भी साथ थी । जब उन्होंने अजय को देखा तो उन्हें भी वो देखते ही पसंद आ गया । वैसे उन्होंने पिछले रविवार को फ़ोटो जरूर देखी थी परंतु फ़ोटो और वास्तविकता में बहुत अन्तर था ।

अजय और दिव्या भी एक दूसरे को पहली नजर में ही पसंद कर चुके थे । दिव्या थोड़ी लजा रही थी । तभी भाभी ने कहा कि हम दोनों परिवारों को तो लड़की लड़का पसंद है । क्यों ना कुछ देर के लिए इन दोनों को अकेले में कुछ बातें करने दें ।

अकेले में अजय ने दिव्या से सिर्फ इतना ही पूछा "क्या आप मेरी जीवन संगिनी बनेगी"

जवाब में दिव्या ने भी सवाल ही कर दिया "क्या आप मुझे अपना हमसफ़र बनाएंगे"। फिर दोनों मुस्कुरा उठे और अपने परिवारों को अपना फैसला सुना दिया ।

कुछ समय बाद निश्चित मुहूर्त में अजय और दिव्या की शादी हो गयी । आज उनकी शादी को दो साल हो गए हैं और अभी छः महीने पहले वे दोनों माता पिता भी बन गए ।

सच है, जोड़ियां ऊपर से ही बन कर आती है । इन दोनों की जोड़ी भी ईश्वर ने पहले से ही तय कर रखी थी, तभी तो एक "पुराने अखबार का हाथ में आना", अख़बार में "उसी विज्ञापन पर अनु की नजर पड़ना" और तब तक "दिव्या की सगाई का भी ना होना", इतने संयोग एक साथ तो तभी मिल सकते हैं जब इसमें उसकी इच्छा शामिल होती है, इसीलिए शायद कहा जाता है कि जोड़ियां ऊपर से ही बन कर आती है ।


Click here to read बाबुल का घर written by Shiv Sharma


जय हिन्द


***शिव शर्मा की कलम से***










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Wednesday, 13 April 2016

Sanyog - संयोग



संयोग (भाग-1)

"अरे बहु जल्दी करो, देर हो रही है, लड़की वाले इंतजार कर रहे होंगे ।"

"जी माँजी, बस दो मिनट" मां ने आवाज लगाई तो अजय की भाभी ने जवाब दिया । आज दोनों सास बहु अजय के लिए लड़की देखने जा रही थी । अजय की उम्र करीबन 28 वर्ष हो चुकी थी और अब सबको ऐसा लगने लगा था की जल्दी ही कहीं रिश्ता हो जाए और अजय की शादी हो जाए ।

ऐसा नहीं था की इस से पहले उन लोगों ने कोई रिश्ता नहीं देखा था, लेकिन कहते हैं ना जोड़े तो ऊपर से बन कर आते हैं, तो जो लड़की अजय के लिए या जिस लड़की के लिए अजय को ईश्वर ने बनाया था वो शायद उन चार पांच लड़कियों में नहीं थी, जो वे अब तक देख चुके थे और उनमें से अजय के लिए उसके परिवार वालों को अब तक कोई नहीं जची थी ।


अजय एक इंजिनियर था और दुबई में किसी अच्छी कंपनी में पिछले चार साल से अच्छे पद पर काम कर रहा था । तनख्वाह भी अच्छी खासी थी लेकिन पता नहीं क्यों, अब तक शादी के लिए कोई लड़की नहीं मिली थी । शायद संजोग नहीं बैठ रहा था । कोई उम्र में कम ज्यादा थी तो किसी का कद आड़े आ जाता था । जैसे एक लड़की सबको पसंद आई थी परंतु उसकी लंबाई अजय से ज्यादा थी । एक रिश्ते को तो माँ ने ये कह कर मना कर दिया था की लड़की बोलती बहुत है ।

अभी अजय छुट्टियों में आया हुआ था एवं उसके किसी परिचित ने पास के शहर में एक शादी योग्य लड़की माँ को बताई थी और कहा कि "देख लीजिये, संयोग बन जाए तो लड़के का रिश्ता कर दो । वैसे मैं लड़की के बारे में ज्यादा नहीं जानता हुं, वो आपको ही देखना है, लेकिन उसके पिता को जानता हुं, अच्छे व्यक्ति है ।"

उन्होंने बताया था कि लड़की सूंदर है, सुशील है, और गृहकार्यों में भी दक्ष है । उसे ही देखने वे लोग आज जा रहे थे ।

"चलिए माँजी" भाभी हाथ में बैग थामे आई तो माँ ने बैग के बारे में पूछा ।

"इसमें शगुन के हिसाब से लड़की के लिए कपड़े इत्यादि लिए है माँजी, यदि हमें और अजय को लड़की पसंद आ गयी तो आज ही हम शगुन कर आएंगे ।" भाभी ने मुस्कुरा कर कहा तो माँ ने भी मुस्कराहट के साथ स्वीकारोक्ति वाले अंदाज में गर्दन हिला दी ।

पिताजी का आज स्वास्थ्य थोड़ा ख़राब था अतः माँ, भाभी, भैया और अजय तक़रीबन सवा घंटे का सफ़र तय करके लड़की वालों के यहाँ पहुँच गए । औपचारिकताओं के आदान प्रदान के बाद अजय की माँ ने लड़की को बुलाने के लिए कहा ।


लड़की की कद काठी ठीक थी, सूंदर भी थी किन्तु यहां भी उम्र आड़े आ गई । वो अभी महज 19 वर्ष की ही थी यानि अजय से नो साल छोटी ।

"देखिये हमें आपका घर परिवार, बच्ची, सब अच्छे लगे" भैया ने लड़की के पिता से कहा, "परंतु उम्र में नो वर्ष का अन्तर बहुत ज्यादा होता है, इसलिए हमें क्षमा करें ।"

"जी ये तो जोग संजोग की बात है और हमारी भी गलती ये हो गयी कि हमने दोनों ने लड़के लड़की की उम्र के बारे में जिक्र ही नहीं किया ।" लड़की के पिता ने कहा । "खामखाह ही आपको इतनी परेशानी उठानी पड़ी, कृपया हमें क्षमा करें ।"

"चलो इस बहाने अपनी जान पहचान तो हुई और आपसे थोड़ी आवभगत भी करवाली" भैया ने हँसते हुए उनसे कहा तो वे भी हंस पड़े ।

कुछ समय पश्चात् अजय और परिवार वापस अपने घर के रास्ते पर थे ।

"अजय तू एक काम कर, छोड़ ये इंजीनियरिंग और सन्यासी बन जा, इतनी लड़कियां देख ली पर तेरे जोड़ की नहीं मिली" भाभी ने ठिठोली की तो अजय के साथ सब हंस पड़े ।

"हाँ भाभी, मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था ।" अजय ने हँसते हुए कहा तो एक बार फिर सब हंस पड़े ।

रास्ते भर इसी तरह की हंसी मजाक करते हुए वे वापस अपने घर पहुँच गए ।

कुछ दिन बाद अजय की छुट्टियां खत्म हो गयी और वो वापस अपनी कर्मभूमि दुबई चला गया । उसकी सगाई का कोई संयोग इस बार भी नहीं बन पाया ।

समय गुजरता गया । दीवाली आने वाली थी । घर में दीवाली की साफ़ सफाई भी शुरू हो चुकी थी । एक दिन भाभी अपने कमरे की अलमारी की सफाई कर रही थी । अलमारी में पुराने बिछाये हुए अखबार निकाल कर वहां नए अखबार बिछा रही थी तभी अजय की छोटी बहन अनु, जो आज ही मायके आई थी, ने कहा, "भाभी, ये देखो तो ।"

वो अलमारी से अभी अभी हटाये हुए एक पुराने अखबार को भाभी के सामने ले आई, जिसके वर वधु कॉलम में वर चाहिए वाली जगह किसी लड़की का संक्षिप्त विवरण और नाम पता, फ़ोन नंबर इत्यादि थे । वो लड़की उन्ही के जाती बिरादरी की थी ।

लेकिन ये तो पांच महीने पुराना विज्ञापन है । भाभी ने कहा ।

"तो क्या हुआ............

........ मित्रों क्षमा चाहूंगा, ब्लॉग थोड़ा बड़ा हो रहा है अतः इसे हम 2 भाग में प्रस्तुत करेंगे । ज्यादा इन्तजार नहीं करवाऊंगा आपसे, दूसरा भाग हम आपके लिए कल ही लेकर आ रहे हैं । तब तक आप बताइये की भाग 1 आपको कैसा लगा । भाग 2 में आप जानेंगे कि वो विज्ञापन देख कर अजय के परिवार ने क्या किया, अजय के रिश्ते का संयोग बना या नहीं । पुनः एक बार आपकी असुविधा के लिए खेद प्रकट करते हुए आपसे विदा चाहूंगा ।

Click here to read "जनम जनम का साथ" written by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***









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Friday, 8 April 2016

Utsav Ki Vela

उत्सव की वेला

नमस्कार दोस्तों । सर्वप्रथम तो आप सबको विक्रम संवत 2073 के शुभारंभ की बधाई और हार्दिक शुभकामनायें ।

आप सब जानते ही हैं कि पुरे विश्व में हमारे देश की संस्कृति का कोई सानी नहीं है । भारत को त्योंहारों का देश कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । यहां हर दिन कोई ना कोई खास महत्त्व लिए होता है ।

ये थोड़ा दुर्भाग्य पूर्ण है कि धीरे धीरे हम अपने त्योंहारों को अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं ।

ईस्वी केलेंडर से बहुत पहले चाँद और सूरज की गतिविधियों के अनुसार विक्रम सम्वत की शुरुआत हो चुकी थी । हम में से बहुत से लोग तो शायद ये भी नहीं जानते होंगे की हम अपना नववर्ष चैत्र की प्रथम तिथि से क्यों शुरू करते हैं । दरअसल इसके पीछे बहुत से धार्मिक और वैज्ञानिक कारण भी जुड़े हुए है ।


चैत्र प्रारम्भ होते होते पतझड़ ऋतू बीत जाती है और वसंत का आगमन होता है । पेड़ पौधे नई पत्तियों से अपना श्रृंगार करते है । फूल खिलने शुरू हो जाते हैं । किसानों की फसल कटाई का समय नजदीक आ जाता है । व्यापारी अपने नए बहीखातों की शुरुआत करते हैं । विद्यालयों में परीक्षाओं का दौर शुरू हो जाता है, इत्यादि ।

और कहते है की ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना भी इसी दिन की थी । भारतीय नववर्ष के इस पर्व पर एक छोटी सी कविता लिखी है जो आप सब के साथ साझा कर रहा हुं । अच्छी लगे तो शेयर करना ना भूलें ।


पतझड़ गया वसंत ऋतू आई
मनभावन हरियाली छाई
नई कोम्पलें हर डाली पर
फूलों की कलियां मुस्काई

शुरू हुआ नववर्ष हमारा
झूम उठा है भारत सारा
सकुचाती सी जा रही सर्दी
मौसम आ गया प्यारा प्यारा

नवरात्रों का उत्सव आया
हर मुख पर उल्लास सा छाया
घर घर में आ देवी माँ ने
हर संकट को दूर भगाया


फूलों से भर रहा है उपवन
खुशबु बिखराने मचल रहा है
चाँद सूरज और सम्वत बदली
संग संग क्या कुछ बदल रहा है

चैत्र मास का प्रथम दिवस ये
अजब अनोखा न्यारा न्यारा
स्वागत इसका करें ह्रदय से
यही तो है नव वर्ष हमारा ।।


पुनः आपको चैत्र नवरात्रों और भारतीय नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

जय हिन्द

*** शिव शर्मा की कलम से ***


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Monday, 4 April 2016

Virah Ki Peer

विरहा की पीर
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रात ढलती रही रात भर


नमस्कार साथियों । मुम्बई लोकल ट्रेन पर लिखा मेरा ब्लॉग आपने पढ़ा, आशा है आपको पसंद आया होगा । मुझे प्रसन्नता होती है जब मैं देखता हुं की बहुत से मित्र मेरे बाकी के पहले वाले ब्लॉग भी पढ़ते रहते हैं । अपना स्नेह युं ही बनाये रखना ।

आज मैं एक नया प्रयास कर रहा हुं "विरह" पर गजल लिखने का । एक ऐसी नारी की मन की व्यथा, जिसका पति मजबूरियों के चलते उससे दूर कहीं अन्यत्र रहता है और महीनों सालों के बाद कुछ दिन के लिए आता है ।

अपनी सहेलियों के द्वारा ठिठोली करने पर उसके मन की पीर जब बाहर आती है तो वो अपनी सखियों से क्या क्या बताती है । उसी व्यथा को शब्दों धागों में पिरो कर इस ग़ज़ल को लिखने का प्रयास किया है । आशा है मेरी अन्य रचनाओं की तरह इसे भी आपका आशीर्वाद मिलेगा ।

रात ढलती रही रात भर
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शमा जलती रही रात भर
आँखें बहती रही रात भर

शनै शनै चाँद ढलता गया
रात ढलती रही रात भर

जिस रोज पिया परदेस गए
मैं सिसकती रही रात भर

कैसे बताऊं पीर विरह की सखी
ये आग जलती रही रात भर



सन्नाटे में कोई आहट सी हुयी
युं ही सहमति रही रात भर

अरसे बाद उनका ख़त आया
बस पढ़ती रही रात भर

वो बीते पल, वो बातें वो यादें
याद करती रही रात भर

दिल का चैन तो वो साथ ले गए
नींद उड़ती रही रात भर

कभी दायें कभी बायें
करवटें बदलती रही रात भर

चांदनी चुभने लगी शूल की तरह
तनहाई डसती रही रात भर

उनकी जुदाई में मैं मोम बन गयी
और पिघलती रही रात भर

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मेरा ये प्रयास कैसा लगा दोस्तों । बताना । कल फिर मिल ही रहें है एक नयी रचना के साथ ।

Click here to read आ जाओ भैया Written by Sri Pradeep Mane


जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***








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Saturday, 2 April 2016

Mumbai Local Train

लोकल ट्रेन

महाराष्ट्र की राजधानी, सपनों की नगरी मुम्बई । समुद्र किनारे बसा भारत का एक खूबसूरत महानगर । जहाँ रोज दूर दूर से अनगिनत लोग आते हैं अपने दिल में हजारों अरमान और आँखों में सैंकड़ों सपने लेकर । कुछ के पुरे होते है और कुछ बस मुम्बई की भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाते हैं ।

चौबीसों घंटे भागने वाला ये शहर कभी नहीं थकता है । कहते हैं मुम्बई में पूरा भारत बसता है । देश के सभी प्रान्तों के लोग यहाँ रहते हैं । मुम्बई का दिल बहुत बड़ा है, ये सबको अपने दिल में पनाह दे देती है ।

अब मुम्बई की बात हो और यहाँ की लोकल ट्रेन का जिक्र ना हो, ऐसा हो सकता है भला ? मुम्बई की जीवन रेखा कहलाने वाली लोकल ट्रेन के बिना मुम्बई की कल्पना ही अधूरी है । किसी कारणवश अगर किसी दिन ये रुक जाए तो उस दिन पूरी मुम्बई थम सी जाती है । कई लोग उस अघोषित अवकाश का अपने अपने तरीकों से लुत्फ़ उठाते हैं । समस्या तो उनके लिये होती है जो दिहाड़ी पर काम करते हैं ।

दिन भर में लाखों यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने वाली मुम्बई लोकल की यात्रा भले ही ऑफिस ऑवर में थोड़ी तकलीफदेह हो, मगर जिंदादिल मुम्बईकर इसका भी भरपूर आनंद उठाते हैं ।

खाली गाड़ी जैसे ही प्लेटफार्म पर आती है, आधे मिनट या इससे भी कम समय में ही गाडी के सभी डिब्बे खचाखच भर जाते हैं ।ये बात कोई माने नहीं रखती की डिब्बा प्रथम दर्जे का है या द्वितीय दर्जे का,  दृश्य लगभग एक सा ही होता है ।

वो आदमी अपने आपको किसी शहंशाह से कम नहीं समझता जिसने अपनी चुस्ती फुर्ती से खिड़की के पास वाली हवादार सीट कब्जे में कर ली हो ।

फिर शुरू होता है अलग अलग डिब्बों में अलग अलग प्रकार की गतिविधियों का दौर । ज्यादातर लोग ग्रुप में होते है जो इस सफ़र के समय का सदुपयोग भजन कीर्तन, अमृतवाणी गा कर करते हैं ।

कुछ ग्रुप तो अपने साथ ढोलक मंजीरे भी ले कर चलते हैं । कमाल की बात ये है कि उस भीड़ में भी, तंग जगह होने के बावजूद ढोलक बजाने की जगह निकाल लेते हैं ।

कुछ जवान भविष्य में गोविंदा जैसा स्टार बनने की चाह लिए मिमिक्री, फ़िल्मी गाने आदि से अन्य यात्रियों का मनोरंजन करते रहते हैं । लेकिन सबसे ज्यादा जो वीरता का कार्य इन लोकल ट्रेनों में होता है वो है ताश खेलना ।

जी हां, सही पढ़ा आपने, लोकल में ताश खेलना कोई कम बहादुरी का काम नहीं है । पांच छह आदमी ताश खेलते हैं, उनके दो चार जासूस अपने आसपास पैनी नजर रखते हैं कि कोई ऐसा व्यक्ति तो डब्बे में नहीं चढ़ा है ना जो रेलवे विभाग का गाड़ी में ताश खेलने वालों को पकड़ने वाले दस्ते का व्यक्ति हो ।

हर स्टेशन पर खिलाड़ी कुछ पलों के लिए खेल रोक देते हैं और जब जासूस हरा सिग्नल देते हैं तब वापस खेल शुरू हो जाता है । अगर जासूस द्वारा खतरे का अलार्म बजा दिया जाता है तो वही खिलाड़ी लोग देश की ज्वलंत समस्याओ पर जो शास्त्रार्थ करते हैं वो श्रवण योग्य होता है ।

अगर कोई ग्रुप निडर हो कर अपना खेल अंतिम स्टेशन तक जारी रखते हैं तो आप समझ सकते हैं की क्या "सेटिंग" है । सेटिंग वाले भी बहुत से ग्रुप होते है जो उन कर्मचारियों की हर हफ्ते दस दिन में अच्छी "सेवा" करते है ।

लेकिन इन्ही नाना प्रकार के यात्रियों में अधिकतर वो लोग होते हैं जो समय पर अपने दफ्तर पहुंचना चाहते हैं ताकि बॉस से डांट ना खानी पड़े और उन्हें पुरे महीने की पूरी तनख्वाह मिल जाए । क्योंकि उसी तनख्वाह की छोटी सी रकम को लेकर उसने कई तरह के काम सोच रखे होंगे ।

घर का किराया, पत्नी के लिए साड़ी, बच्चे की स्कूल फीस, माँ की दवाई, छोटे भाई के लिए कॉलेज में पहनकर जाने लायक कपड़े, बहन के लिए कान के बूंदे इत्यादि । इस महीने की तनख्वाह में तो इतना ही हो पायेगा, अपने लिए अगले महीने सोचेंगे ।

धन्य है मुम्बई की लोकल ट्रेन जो कितने लोगों को समय पर उनके कार्यालय तक पहुंचा देती है और उस वजह से उनको महीने की पूरी तनख्वाह मिल जाती है । उनकी तो एक ही तमन्ना रहती है कि बस..... लोकल अपने समय पर हरदम चलती रहे ।

आज अपने शब्दों को यहीं विराम देना चाहूंगा दोस्तों । लोकल ट्रेन के मेरे खुद के अनुभव जल्दी ही अपने अगले किसी ब्लॉग में ले कर आऊंगा आप सबके साथ साझा करने को ।

जय हिन्द


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***शिव शर्मा की कलम से**








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