Sunday, 30 October 2016

Ek Diwali Aisi Bhi


एक दिवाली ऐसी भी



नमस्कार मित्रों । दीपावली के पावन पर्व की आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं ।

अंधकार को मिटा देने वाला त्योंहार है दिवाली । मैं कामना करूंगा कि ईश्वर आपके जीवन के हर अन्धकार को दूर कर खुशियों की रौशनी से रोशन कर दे ।

दीपावली का ये पावन पर्व हर तरह के ईर्ष्या द्वेष भुलाकर, हर एक की भूलों को क्षमा कर के प्रेम और स्नेह बढ़ाने का पर्व है और हमें यही प्रेरणा देता है इस उत्सव का आनंद हम सबके साथ मिलकर उठायें । इसी विषय पर एक छोटी सी कविता एक दिवाली ऐसी भी लिखी है, इसी आशा के साथ कि इस कविता को भी मेरी पहले की रचनाओं तरह आपका भरपूर स्नेहाशीष मिलेगा ।


एक दिवाली ऐसी भी


हिलमिल सारे ख़ुशी मनाएं
नन्हे बच्चों जैसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी
अपने मन के भितर हो कुछ
जगमग ज्योत दीये सी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी

मन के सारे मैल मिटायें
स्नेह बढ़ाएं मेल बढ़ाएं
छोटा बङा नहीं है कोई
प्रेम से सबको गले लगाएं
फिर से एक बनायें टोली
अपने बचपन जैसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी




ऊंच नीच की बातें छोड़ो
दिल से दिल के रिश्ते जोड़ो
मुहब्बतों के बीच जो आये
सारी वो दीवारें तोड़ो
अच्छी नहीं है दिल की दुरी
हो चाहे वो कैसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी

मैं को छोड़ो हम बन जाओ
उत्सव का आनंद उठाओ
स्नेह प्रेम की बाती लेकर
अपनेपन के दीप जलाओ
दूर भगाओ ईर्ष्या नफरत
ऐसी भी और वैसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी

ऐसी हो अबकी दिवाली
हर चेहरे पर हो खुशहाली
दीप ज्योति से शरमा जाए
रात मावस की काली काली
अपनों के संग संग मुस्कायें
अपने प्रिय पड़ौसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी

माना सस्ते में मिलता है
जगमग जगमग भी करता है
लेकिन अपनी जेब काट
कोई दूजा अपना घर भरता है
यकीं करो ज्यादा चमकेगी
झिलमिल लड़ियां देसी भी
आओ अबकी बार मनाएं
एक दिवाली ऐसी भी ।।

    **    **    **

पुनः आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं । उत्सव का पूर्ण आनंद उठायें, उमंग भरी सुरक्षित दिवाली मनाएं ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से***


Friday, 21 October 2016

Kaash - काश


काश.....



सुनील मेज पर सर झुकाये कुछ ग़मगीन मुद्रा में बैठा था । मैंने आवाज दी तो उसने सर उठाकर मेरी तरफ देखा ।

"क्या बात है भाई, कुछ परेशान से लग रहे हो । सब ठीक है ना ?" मैंने उससे हाथ मिलाते हुए पूछा ।

"हां यार ठीक है सब, बस थोड़ा सा पत्नी की तबियत को लेकर चिंतित था । काश...... उस वक्त तेरी बात मान कर उसे शहर के डॉक्टर को दिखा दिया होता, तो आज ये स्तिथि ना होती ।" सुनील के स्वर से चिंता के भाव स्पष्ट पता चल रहे थे ।

उसकी पत्नी अक्सर पेट दर्द की शिकायत करती रहती थी और वो बिना डॉक्टर की सलाह के ही दवा की दुकान से दवा ले जाता था । मुझे भी तब पता चला था जब आज से करीब तीन महीने पहले वो वहीं दवाई खरीदते हुए मिल गया था जहां मैं भी कोई दवा लेने को गया था ।

तब मैंने उसे कहा था कि भाभी को किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा दे एक बार । युं बिना रोग जाने दवा लेना सही नहीं है । लेकिन लापरवाही या किसी और कारण के चलते शायद वो उसे डॉक्टर के पास नहीं ले गया था ।

"क्यों क्या हुआ, भाभी ठीक तो है ना । तुमने डॉक्टर को दिखाया क्या उन्हें ?" मैंने एक साथ दो तीन सवाल पूछ डाले ।

"हां हां वैसे तो ठीक है परंतु"

"परंतु क्या" मैंने बीच में ही उसकी बात काट कर पूछ लिया ।

"वो डॉक्टर ने कहा है कि पत्नी के पेट में पथरी है जो अब दवाओं से ठीक होनी मुश्किल है, ऑपरेशन करना होगा । काश, उस वक्त तेरा कहा मान लेता, क्योंकि डॉक्टर ने बताया कि अगर दो तीन महीने पहले जांच हो जाती तो शायद दवा से भी इलाज हो जाता । ऑपरेशन नहीं करवाना पड़ता ।" सुनील एक सांस में बताता चला गया ।

"ओह्ह..... मुझे दुःख है कि भाभी को ऑपरेशन की पीड़ा सहनी पड़ेगी । खैर, जो हो गया सो हो गया लेकिन अब और देर मत करना, जितनी जल्दी हो इलाज करवाओ । और मेरे लायक कोई भी काम हो तो बेझिझक बोलना ।"

"नहीं नहीं, अब कोई देरी नहीं करूंगा भाई, कल बुलाया है डॉक्टर ने । छोटा सा ऑपरेशन है । परसों अस्पताल से छुट्टी भी मिल जायेगी ।"




"मैं तो आज इधर से गुजर रहा था तो सोचा तुमसे मिलता चलुं । आ गया तो पता चला, वर्ना तुम तो शायद बताते भी नहीं ।

अभी तो मैं चलता हूं, तुम चिंता मत करना और मेरी किसी भी तरह की मदद की जरुरत हो तो फ़ोन कर देना" मैंने कुर्सी से उठते हुए उससे कहा ।

फिर उससे विदा लेकर मैं वहां से रुखसत हुआ और पैदल ही घर की तरफ चल पड़ा । सुनील की परेशानी जानकर तकलीफ तो हुई, परंतु इस स्तिथि का वो खुद जिम्मेदार था, और कुछ उसकी पत्नी भी, जो बिना डॉक्टर की सलाह के गलत दवाइयां, जो सुनील मेडिकल वाले से सीधा लाता था, ले लेती थी ।

अनायास ही मेरे दिमाग में खयाल आने लगे कि हमारी एक छोटी सी लापरवाही या अतिरिक्त होशियारी, आगे चल के एक बड़ी मुसीबत का रूप ले लेती है । बाद में हम सोचते हैं कि काश उस वक्त ऐसा कर लिया होता ।

समय रहते उचित निर्णय ना लेने की वजह से हमारे जीवन में ये "काश" कई जगह आ के खड़ा हो जाता है । जैसे सुनील, अगर कुछ समय पहले वो अपनी पत्नी के रोग की किसी अच्छे डॉक्टर से जांच करवा लेता तो उसकी पत्नी ऑपरेशन के दर्द से और खुद सुनील मानसिक परेशानी और बेमतलब के होने वाले खर्च से बच जाते ।

आपने भी देखा होगा कि अक्सर जब परीक्षाएं सर पे आ जाती है तब जा के कई विद्यार्थी हाथों में किताब उठाते हैं । समय रहते तो उन्हें लगता है अभी तो दो महीने पड़े हैं, पढ़ लेंगे । अभी एक महीना बाकि है, पढ़ लेंगे । लेकिन बाद में जब परीक्षा परिणाम अवांछित आता है तब पछताते हैं कि डेढ़ दो महीने युं ही बर्बाद कर दिए थे, "काश" उस वक्त समय का उपयोग कर लेते तो परिणाम अलग ही आता ।

इन उदाहरणों के अलावा और भी सैंकड़ों तरह की बातें, घटनाएं हमारे जीवन में होती है जहां बाद में हमें लगता है कि काश हम पहले वैसा कर लेते तो आज स्तिथि दूसरी होती ।

इसलिए मित्रों कोई भी छोटा या बड़ा मसला, चाहे वो स्वास्थ्य संबंधी हो, चाहे आर्थिक, पारिवारिक या शैक्षणिक या अन्य, उन पर तुरंत विचार करके निर्णय लें । खासतौर पर स्वास्थ्य से संबंधित समस्या को तो बढ़ने ना ही दें । क्योंकि वक्त रहते इलाज ना किया जाए तो घाव नासूर बन जाता है और जीवन पर्यंत पीड़ा देता रहता है ।

अब आपसे विदा चाहूंगा । जल्दी ही फिर मिलने के वादे के साथ । आप सबको दीपावली की अग्रिम शुभकामनाएं । अपना और अपनों का ख़याल रखें ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से***








आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

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Monday, 17 October 2016

मृत्यु - Mrityu


मृत्यु


नमस्कार मित्रों । एक लंबे अंतराल के बाद आपसे मुलाकात हो रही है । आज आपके समक्ष पेश है श्री प्रदीप माने "आभास" द्वारा रचित एक हृदय स्पर्शी रचना "मृत्यु" । जीवन का अंतिम सच "मृत्यु" ।

जैसा कि आप जानते हैं प्रदीप मूलतः मराठी में लिखते हैं और ये कविता भी इन्होंने मराठी भाषा में ही लिखी थी, और हमारे विशेष अनुरोध पर कुछ और संशोधन करके श्री प्रदीप माने ने इसका हिंदी अनुवाद किया । आशा है इस कविता को आप बेहद पसंद करेंगे ।


मृत्यु

दस्तूर अपना
निभाओगी जरूर
सीमाएं मेरी
बताओगी जरूर
कोई आये ना आये
पर तुम आओगी जरूर
विश्वास है मुझको,
तुम आओगी जरुर...

डुबती नैया से जब
किनारें हो दूर...
हवाएं भी हो,
थमने को मजबूर...
रातों को लगने लगे
जब अंधेरों से डर...
रास्ते हो असहाय और,
मुश्किल हो सफर...
तब कोई साथ ना होगा,
पर तुम मेरा
साथ निभाओगी जरूर,
विश्वास है मुझे,
तुम आओगी जरुर...


मृत्यु





आसमान जब
पिघलने लगे,
धरती जब
फटने लगे,
बोझ हो जाएगी
साँसें धडकनों पर...
फूट फूट रोएगा,
सागर किनारों पर...
लहरें भी किनारों से
किनारा कर लेगी,
तुम मगर मेरी नाव
किनारे लगाओगी जरूर
विश्वास है मुझे
तुम आओगी जरुर...

आकर थाम लोगी
अपनी बाहों में मुझे,
और मुक्त कर दोगी,
सभी बंधनों से मुझे,
आ, बेझिझक मैं भी
तुम्हें बाहों में भर लू...
इस बेवफा जिंदगी से
किनारा कर लू...
मैं तुझे जानता हूं
तेरी आदत पहचानता हुं
कि तेरा जो वादा है सबसे,
तुम निभाओगी जरूर,
विश्वास है मुझे
तुम आओगी जरुर...



मृत्यु


अपना लोगी आकर,
मेरे दुख-दर्द सारे...
बिछा दोगी मेरी
राह में चमकते तारे...
जीवन तो दिव्या स्वप्न है,
तू ही अंतिम वचन है.
जीवन झूठ की परछाई है
मृत्यु, तू ही सच्चाई है,
जिंदगी बेवफा है,
मौत में खरी वफ़ा है,
हां विश्वास है मुझे,
तुम अपनी वफ़ा
निभाओगी जरूर
मुझे अपने गले
लगाओगी जरूर
मैं जानता हुं
तुम आओगी जरूर....

Click here to read "पंख" written by Sri Pradeep Mane



प्रदीप माने "आभास" की रचना










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शिव शर्मा


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