Thursday, 20 July 2017

Ek Woh Bhi Tha Zamana - एक वो भी था जमाना

एक वो भी था जमाना


एक वक्त था बिस्तर से हम भोर भए उठ जाते थे,
जितना बन पड़ता था काम में माँ का हाथ बंटाते थे,

लेकर डोर बाल्टी कुएं से पानी भर लाते थे,
पापा के जूते भी अक्सर पॉलिश से चमकाते थे,

दादाजी की छड़ी ढूंढ शाबाशी पाया करते थे,
दादी संग रामायण की चौपाई गाया करते थे,

खुद पढ़ते तो साथ बहन भाई को पढ़ाया करते थे,
सहपाठी मित्रों के संग कितना बतियाया करते थे,

हंसी ठिठोली मस्ती घर में हरदम छाई रहती थी,
शाम ढले नानी दादी परियों की कहानी कहती थी,



बंटी चिंटू कालू बबलू शाम ढले आ जाते थे,
खेल कबड्डी खो-खो सारे के सारे थक जाते थे,

पिंकू के घर पानी और मक्खन घर छाछ उड़ाते थे,
घर आकर फिर बड़े चाव से दाल रोटी खाते थे,

खेल थे सारे सेहत वाले, घर के बने पकवान थे,
सीमित कमाई थी लेकिन दिल से सारे धनवान थे,

दूध दही का खानपान था स्वस्थ निरोगी रहते थे,
प्रेम की सरिता मोह के सागर तब घर घर मे बहते थे,

गांव गली में कहीं भी कोई घटना गर हो जाती थी,
पलक झपकते बिना फोन ही सबको खबर हो जाती थी,

एक दूजे से वाकिफ थे और मन में आदर भाव था,
छोटे बड़ों की कद्र थी सबको कितना प्यारा गांव था,




समय जो बदला साथ साथ परिवेश भी सारा बदल गया,
गांव बन गए शहर साथ ही भेष भी सारा बदल गया,

आधुनिकता की आंधी में मौसम भी तो बदल गए,
रंग बदल गए ढंग बदल गए और हम थोड़े बदल गए,

अब ना है वो वाला बचपन है ना ही वो शैतानी है,
किस्से हो गए लुप्त परी के कहां वो दादी नानी है,

बचपन डूब रहा है भैया प्रतिशत के चक्कर में,
स्कूल से घर घर से क्लास और मोबाइल कंप्यूटर में,

पापा हो गए व्यस्त बसाने, सुख साधन खुशियां घर में,
ओवर टाइम करना जरूरी कुछ पैसों के चक्कर में,

मम्मी भी तो चली कमाने आखिर इतने खर्चे हैं,
होम लोन फर्नीचर टीवी इतने सारे कर्जे हैं,

हर महीने तौबा कितनी किश्तें बैंकों की भरनी है,
इसीलिए तो भैया को भी नौकरी कोई करनी है,


सुख की खोज में सुख को खोकर व्यर्थ ही सब मजबूर हुए,
पास होकर भी पास नहीं हम घर परिवार से दूर हुए,

लोक दिखावे की खातिर कितने दुख हमने पाल लिए,
खामोशी से चिंताओं ने घर में डेरे डाल दिए,

जब तक समझ में आया तब तक वक्त हाथ से फिसल गया,
खाली धनुष हाथ मे रह गया तीर कमान से निकल गया,

दौड़ भाग में जीवन बीता देख बुढापा रो दिए,
हाथ के मैल को पाने खातिर स्वर्णिम लम्हे खो दिए ।।

         ** ** ** **

शीघ्र ही फिर मुलाकात होगी मित्रों, किसी नई रचना के साथ । तब तक के लिए विदा दोस्तों ।

जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*



आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

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Thursday, 22 June 2017

मैं ही मैं

मैं ही मैं

नमस्कार मित्रों । हर व्यक्ति जीवन  के हर एहसास से कभी ना कभी गुजरता ही है जिसमें प्रेम, गुरुर, मदहोशी, स्वच्छंदता आदि नाना प्रकार के मोड़ आते हैं और जहां व्यक्ति को लगता है कि इसकी वज़हें बस मैं ही हुं बाकि सब तो युं ही है ।

परंतु समयानुसार उसे ये एहसास भी होता ही होता है कि उसके इन परिवर्तनों की वजहें तो बहुत से उसके चाहने वाले हैं । उसके अपने, उसके मित्र, उसके शुभचिंतक आदि ।

इन्ही भावनाओं को, मूलतः मराठी लेखक, श्री प्रदीप माने ने एक ग़ज़ल मैं ही मैं के रूप में बांधकर आपके समक्ष प्रस्तुत किया है । आपको उनका ये प्रयास पसंद आये तो अपने मूल्यवान सुझाव और आशीर्वाद जरूर दें ।

      ** ** ** **



मैं ही मैं


मैं ही मेरा सवाल अपना और मैं ही जवाब हुं ,
मेरी अपनी सल्तनत का मैं ही नवाब हुं ।

मदहोश हुं अपनी ही धुन में होश कहाँ कोई मुझे,
मैकदा ना कर सके वो बहका सा हिसाब हुं ।

बन कर भंवरा उड़ता हुं गुलशन की हर क्यारी में,
पंखुड़ी ओढ़ चुरा लेता मैं फूलों से हिज़ाब हुं ।




झेलता हुं रोज तीखी नजरों के तीर कई ,
पलकें झुका के सब को कर लेता आदाब हुं ।

आगाज भी हुं कभी तो कभी मैं अंजाम हुं,
आंखों में किसी के छुपा हुआ ख्वाब हुं ।

दोस्तों की महफ़िल की रौनक भी हुं ज़नाब मैं,
लग ही जाएगी लत जिसकी ऐसी कम्बख्त शराब हुं ।

खुद में ही खोया हूं नीले आसमान सा,
कभी चाँद सा शीतल हुं तो कभी आफताब हुं ।




पहला झूठ कभी तो कभी आखरी सच भी हुं,
सुलझा सवाल तो कभी उलझा सा जवाब हुं ।

खामियां तो है पर कुछ खूबियां भी है मुझमें,
अमृत की बूंदें भी हुं गर मैं कभी तेज़ाब हुं ।

आप मेरे दिल में है मुझे अपने दिल में जगह देना,
कुछ नहीं अपनों के बिन मैं एक अधूरा ख्वाब हुं ।।


Click here to read "पंख" by Sri Pradeep Mane


रचना : प्रदीप माने "आभास"










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धन्यवाद
शिव शर्मा



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Sunday, 11 June 2017

Saubhagyashali - सौभाग्यशाली

सौभाग्यशाली


एक पुत्री के पिता रामेश्वर बहुत ही सरल स्वभाव के थे । गांव के मंदिर में पूजा पाठ करके मंदिर में आने वाले चढ़ावे और गांव में कभी कभार होने वाले जन्म, मरण, विवाह आदि के कार्यों से अपनी जीविका चला रहे थे । उनके अपने और आस पास के गांववासी उनका बहुत सम्मान करते थे ।

ये मंदिर बरसों पहले किसी साहूकार ने बनवाया था, जिसमें पूजा पाठ का जिम्मा साहूकार और गांव वालों ने रामेश्वर के दादाजी को सौंपा था, जिसे उन्होंने और उसके बाद रामेश्वर के पिता ने बखूबी निभाया था । उनकी जीविका का साधन भी यही था ।

आमदनी भले ही कम थी परंतु परिवार छोटा होने की वजह से घर चल जाता था । और फिर दूसरा कोई साधन भी ना था, अतः दादाजी और पिताजी ने पंडिताई में ही अपने छोटे से परिवार का भरण पोषण किया था ।

रामेश्वर के पिता उसे पढ़ा लिखाकर बड़ा आदमी बनाने के सपने देखा करते थे । परंतु होनी को कौन टाल सकता है । पिता की असमय मृत्यु के कारण रामेश्वर को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और वे भी दादाजी के साथ पंडिताई और गांव के मंदिर की देखभाल के काम में तन मन से लग गए थे । इस बीच दादाजी ने किसी तरह जोड़ तोड़ करके उनका विवाह करवा दिया था ।

समय आराम से काट रहा था । दो वक्त की रोटी समय पर मिल रही थी जिसके लिए रामेश्वर भगवान को धन्यवाद कहना कभी नहीं भूलते थे । बहुत कुछ नहीं था, पर जो भी था उसे प्रभु का प्रसाद समझकर रामेश्वर उसमें ही संतुष्ट थे । उनका मानना था कि जिस ईश्वर ने जिम्मेदारियां दी है वो ही इनको निभाने में मदद करते हैं । ईश्वर में उनकी पूरी आस्था थी ।




उधर पुत्री की बढ़ती उम्र ने उनकी पत्नी को थोड़ा चिंता में डाल दिया था कि अब आनेवाले कुछ ही वर्षों में ये विवाह योग्य हो जाएगी, और आजकल के विवाह में जो खरचे होते हैं वो इतनी सी आमदनी में कैसे वहन होगा ।

अपनी ये चिंता एक दिन उन्होंने रामेश्वर से भी कही तो रामेश्वर ने मुस्कुरा कर आसमान की तरफ हाथ उठाकर इतना ही कहा, 'भागवान, क्यों चिंता करती हो, वो बैठा है ना करने वाला । जो सबकी चिंताएं दूर करता है, हमारी चिंता भी वो ही हरेगा । और हमारी पुत्री सूंदर है, पढ़ी लिखी और सुशील है तथा इस उम्र में भी गृह कार्यों में भी इतनी निपुण है, चिंता मत करो, प्रभु सब अच्छा करेंगे ।' कहते हुए वे संध्या आरती के लिए तैयारियों में जुट गए ।

समय गुजरता गया । रामेश्वर इन बीते समय में भगवद्भक्ति में और लीन होते गए । दो वर्ष पूर्व दादाजी भी संसार छोड़ गए थे । बीते समय में मंदिर में भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगी थी । हाल ही में कस्बे के महाजन जी ने मंदिर का बहुत ही सुंदर जीर्णोद्धार भी करवाया था ।

समय इतनी तेजी से भागा कि पता ही नहीं चला कब बेटी सयानी हो गयी । ऐसा नहीं कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं थी, पर माँ तो माँ होती है, उनकी पत्नी ने आज फिर उन्हें टोका 'उन्नीस की हो गयी है ममता, उसके लिए कोई योग्य वर ढूंढो और उसके विवाह की व्यवस्था करो ।'

तो रामेश्वर ने पत्नी को कहा कि 'भागवान, मैनें अपने और आस पड़ौस के गांव के बड़े बुजुर्गों को बोला है किसी अच्छे रिश्ते के लिए । और पास के कस्बे के महाजन जी से कुछ कर्ज के लिए भी कहा हुआ है । प्रभु कृपा से जल्दी ही कुछ शुभ समाचार मिल जाएगा । उस दीनानाथ पर भरोसा रखो, वो सब व्यवस्था कर देगा ।'

कुछ दिन बाद महाशिवरात्रि का पर्व आया । गांव वालों ने मिलकर मंदिर को आज बहुत ही सुंदर सजाया था । सुबह से ही शिव अर्चना के लिए भक्तों का आना शुरू हो गया था । पूरा गांव आज शिवमय हो गया था ।

दोपहर के लगभग 1 बज रहे थे जब रामेश्वर को थोड़ी फुरसत मिली । मंदिर में अब इक्का दुक्का भक्त ही नजर आ रहे थे । रामेश्वर अभी अभी मंदिर से घर पर आये ही थे कि तभी पास वाले कस्बे के महाजन एक भद्र पुरुष और एक सूंदर युवक के साथ घर आये ।

महाजन जी ने उनका परिचय करवाया । 'रामेश्वर जी, ये प्रेमसुखजी है, कलकत्ता रहते हैं । अभी छुट्टियों में आये हुए थे और आज सपरिवार हमसे मिलने आये थे । बातों बातों में इन्होंने बताया कि ये अपने इस छोटे पुत्र के लिए कन्या की तलाश भी कर रहे हैं । मैनें आपकी पुत्री के बारे में इन्हें बताया तो ये और इनकी पत्नी व बड़ी बहू कहने लगे कि आज की आज इनकी आपसे मुलाकात करवाऊं । सो बिना किसी सूचना के ही हम आपसे मिलने चले आये ।'

प्रेमसुखजी ने कहा 'रामेश्वर जी, जब सेठजी ने आपके और आपके परिवार के बारे में बताया तो मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और बिना आपको पूर्व सूचना के हम यहां आ गए । आपको असुविधा हुई हो तो क्षमा करें ।

'अरे नहीं नहीं प्रेमसुखजी' रामेश्वर ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा । 'महाजन जी मेरी पुत्री को अपनी पुत्री जैसा ही मानते हैं इसलिए औपचारिकता वाली तो कोई बात ही नहीं है । परंतु.......'

'परंतु क्या रामेश्वर जी' ।

'प्रेमसुखजी जी, अब मैं कैसे कहुं, मैं जानता हूं, महाजन जी ने अगर आप से चर्चा की है तो कुछ सोच समझकर ही कि होगी । लेकिन...'

'फिर लेकिन' इस बार महाजन जी बोले । 'प्रेमसुखजी मैं समझ गया रामेश्वर जी की झिझक को । ये कहते हुए शरमा रहे हैं कि ये ठहरे गांव के एक गरीब ब्राह्मण, और आप कलकत्ते के संपन्न ब्राह्मण व्यापारी । फिर मेल कैसे होगा ।'

प्रेमसुखजी पहले तो मुस्कुराए फिर बोले 'रामेश्वर जी, मैं आपकी झिझक और संदेह दोनों दूर कर देता हूं । भगवान का दिया सबकुछ है हमारे पास । मुझे सिर्फ एक योग्य, सूंदर, संस्कारी और गुणवान वधु की तलाश है । और वे सारे गुण मुझे लगता है कि आपकी पुत्री में है, जैसा कि सेठजी ने मुझे बताया ।'

'सेठजी मेरे बड़े भाई जैसे हैं । इन्ही के प्रोत्साहन और सहयोग से मैनें कलकत्ते में व्यापार शुरू किया था जो आज प्रभु कृपा से बहुत अच्छा चल रहा है ।'

'अब रही बात गरीबी और संपन्नता की, तो आप एक पुत्री के पिता हैं, गरीब कैसे हो सकते हैं । पुत्री का पिता कदापि गरीब नहीं होता, बहुत सौभाग्यशाली होता है । क्योंकि एक पुत्री का पिता ही होता है जिसे कन्यादान करने का सौभाग्य प्राप्त होता है ।'

वे एक क्षण के लिये रुके और फिर बोले 'ये मेरा छोटा पुत्र है, दोनों भाइयों ने व्यापार बखूबी संभाल रखा है और हमारे सभी परिचित इनको राम लक्ष्मण की जोड़ी से संबोधित करते है । अच्छा पढ़े लिखे भी हैं । बड़े शहर में रहकर भी अपने संस्कार नहीं भूले हैं । अब अगर आपको और आपकी पत्नी को मेरा पुत्र पसंद हो तो बात आगे बढ़ाएं ।'

रामेश्वर को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गयी । उन्होंने दरवाजे के पीछे से झांकती अपनी पत्नी को इशारे से पूछा तो उसके चेहरे पर झलकती चमक और मुस्कान ने एक पल में बिना कुछ कहे ही उसका फैसला बता दिया । और कुछ पल बाद ममता को लेकर वो बाहर आई ।

ममता ने ससम्मान उन सभी को प्रणाम किया । प्रेमसुखजी और उनके पुत्र को पहली ही नजर में ममता पसंद आ गयी । दोनों को जब पूछा तो शरमाते हुए दोनों ने हां करदी । ममता शरमा कर सबको फिर से प्रणाम कर के अंदर कमरे में चली गयी ।

'तो रामेश्वर जी' प्रेमसुखजी खुशी से बोले, 'अब आपकी बेटी हमारी हुई, कल हम अपनी पत्नी और बड़ी बहू के साथ यहां आ रहे हैं विधिवत सगाई की रस्म करने ।'

'और आप शीघ्रतिशीघ्र कोई पहला मुहूरत निकालिये विवाह का, ताकि हम तैयारियां शरू करें । हम अपनी बहू बेटी को जल्द से जल्द अपने घर की लक्ष्मी बनाना चाहते हैं ।'

सुनकर रामेश्वर ने हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए उनको इतना ही कहा 'जी जरूर' ।

'और हां रामेश्वर जी' इतनी देर से चुप महाजन जी बोले, मेरी अपनी कोई बेटी तो है नहीं । ममता को मैनें बेटी माना है, इसलिए आपकी एक भी नहीं सुनूंगा और इसके विवाह की व्यवस्था का पूरा जिम्मा मैं उठाउंगा । अब हमें इजाजत दीजिये । भाई, बेटी के विवाह की तैयारियां जो करनी है ।'

इससे पहले की रामेश्वर जी कुछ बोल पाते प्रेमसुख जी और महाजन जी, उनकी बिना कुछ सुने, ममता के माथे पर स्नेहाशीष भरा हाथ रखकर वहां से विदा हो गए ।

रामेश्वर को तो अभी तक विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि इतना बड़ा कार्य इतनी सहजता से घर बैठे हो गया । खुशी से चहकती पत्नी को देखकर बोले,

'भागवान हमारी बेटी बहुत सौभाग्यशाली है । देखो प्रभु की कृपा, जिस बात के लिए तुम इतनी चिंतित रहती थी, वो भगवान भोलेनाथ ने शिवरात्रि के शुभ दिन पर इतना अच्छा रिश्ता भेजकर युं चुटकियों में हल करदी । आपका बहुत बहुत धन्यवाद प्रभु । हमारी ममता के तो भाग खुल गए ।' कहते कहते उनकी आंखों में आंसू आ गए ।

'हां ममता के बापू, सच में बहुत सौभाग्यशाली है हमारी गुड़िया ।' बोलते बोलते उसने ममता को अपने गले से लगा लिया । ममता भी अपने माता पिता को खुश देखकर बहुत खुश थी । खुशी के आंसू तीनों की आंखों से बह रहे थे ।

**    **    **    **

मित्रों । इस बार मैनें कुछ अलग लिखने की चेष्टा की है । आपको मेरा ये प्रयास कैसा लगा । बताने की कृपा जरूर करें ।

Click here to Read "जीवनसाथी" by Sri Shiv Sharma


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*










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Thursday, 4 May 2017

Napak Padosi - नापाक पड़ौसी



नापाक पड़ौसी


नमस्कार मित्रों । सर्वप्रथम तो मैं सुकमा और कृष्णा घाटी के हमलों में शहीद हुए वीर शहीदों को नमन करता हुं ।
युं तो पिछले 70 वर्षों से धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर के हालात किसी से छुपे नहीं है, जहां आये दिन हमारे सैनिकों पर  पत्थर बरसाए जाते हैं और पडौसी देश से आये आतंकवादी अक्सर हमले करते रहते हैं ।

इन घटनाओं को देख सुनकर दिल में एक टीस उठती रहती है, उस पर हाल ही में सुकमा और कृष्णा घाटी में घटी घटनाओं ने तो दिल को अंदर तक घायल कर दिया, बुरी तरह झकझोर कर रख दिया ।

अपने वीर सैनिकों के साथ हुई ये बर्बरता देख आज हर भारतीय दुखी और क्रोधित है । आखिर कब तक देश इन पीड़ादायक घटनाओं को सहता रहेगा । कहीं ना कहीं तो ये सब रोकना ही होगा । कुछ कड़े कदम उठाने ही होंगे ।

इसी तरह के बहुत से विचार जब मस्तिष्क में उथल पुथल मचाने लगे तो मैंने अपने विचारों को एक कविता नापाक पड़ौसी का रूप देकर आप सबसे साझा करने का सोचा और जो मन में था वो लिखता चला गया ।

यदि आपको लगे कि मेरे ये विचार आपके अपने विचारों से मेल खाते हैं तो मैं समझूंगा कि मेरा प्रयत्न सार्थक रहा ।




नापाक पड़ौसी


देखो उस गीदड़ ने फिर से
आज हमें ललकारा है
सरहद पार से आकर सीधे
गाल पे थप्पड़ मारा है

वहशीपन की हद करते इसे
लाज जरा ना आती है
दरिंदगी का दृश्य देख
मानवता भी शरमाती है

आखिर कब तक जालिम के
जुल्मों को सहते रहेंगे हम
दुम सीधी होने की कब तक
राहें तकते रहेंगे हम

आखिर कब तक चुप बैठे
बस निंदा करते रहेंगे हम
आखिर कब तक वीरों को
शर्मिंदा करते रहेंगे हम

कहीं पे नक्सल, कहीं पे पत्थर
किसी ने थप्पड़ मारी है,
आज वतन की अस्मिता पर
दहशतगर्दी भारी है,

धरती की जन्नत में भी
नफरत की फसलें उग रही है
केसर की क्यारी में नित
जेहादी नसलें उग रही है

भारत तेरे टुकड़े होंगे
जैसे नारे लगते हैं
अफजल और याकूब जिन्हें
निर्दोष बेचारे लगते हैं

गर ऐसे ही चलता रहा तो
एक दिन ऐसा आएगा
अदना सा कोई भी पडौसी
हमको आंख दिखायेगा

सवा अरब हो कर भी हम क्यों
सब कुछ सहते रहते हैं
बंद कमरों में बैठे केवल
निंदा करते रहते हैं


देश के रखवालों आखिर युं
कब तक ऐसा चलता रहेगा
सत्तर वर्ष से पीड़ा सहता
वतन हमारा जलता रहेगा

कहो आज तक क्या कुत्ते की
दुम सीधी हो पाई है
जिसके दिल में खोट भरी हो
उसे अक्ल कब आई है

लातों का है भूत उसे
बातों से क्या समझाओगे
पीठ में वो खंजर घोंपेगा
गर जो गले लगाओगे



उस कायर को पाठ पढ़ाओ
निंदा करना बंद करो
खा खा चांटे बार बार
शर्मिंदा करना बंद करो

 Karachi, Pakistanपलट वार हम कर सकते हैं
उसको ये समझाना होगा
दुष्टों को संहारने अर्जुन को
गांडीव उठाना होगा

दुश्मन का कलेजा थर्राये
ऐसी प्रचंड हुंकार भरो
बहुत हुई शांति की वार्ता
अब तो आर या पार करो

शक्ति का संधान करो अब
उसको सबक सिखादो तुम
हम क्या हैं क्या कर सकते हैं
पापी को दिखलादो तुम

आंखों में भर कर अंगारे
शेर की तरह दहाड़ो अब
चढ़ छाती पर दुश्मन की
वहां तिरंगा गाड़ो अब ।।

Click here to read "सात सुख" by Sri Shiv Sharma


जय हिंद

*शिव शर्मा की कलम से*










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Tuesday, 4 April 2017

Muskuraya Karo

मुस्कुराया करो


नमस्कार मित्रों । इस बार काफी लंबे समय बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूँ, क्षमा चाहता हूं । समयाभाव की वजह से आपसे मिल नहीं पाया परंतु अब मैं कोशिश करूंगा कि सप्ताह में एक बार जरूर हम मुलाकात करें ।

एक बार फिर एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की है, इसी उम्मीद में कि हर बार की तरह इस बार भी आपका भरपूर स्नेह मिलेगा ।

   **    **    **    **

मुस्कुराया करो

इस कदर खुद को ना सताया करो,
हर बात को दिल से ना लगाया करो,

ज़माने की तो फ़ितरत ही है सताने की
आप तो हर हाल में मुस्कुराया करो,

रब जानता है साजिशें कौन करता है
हर किसी पर ऊँगली ना उठाया करो,

हर दफा दूसरा ही गलत नहीं होता
कभी यूँ भी दिल को समझाया करो,






नफ़रतें तो बढ़ाती है रिश्तों में दूरियां
मुहब्बतों के फूल खिलाया करो,

बहुत खूब कहा है किसी शायर ने भी
जंग अपनों से हो तो हार जाया करो,

तोड़ देती है मायूसियां इंसान को
खुल के हंसा करो हंसाया करो,

सुकूं मिलता है फ़क़त इतना करने से
बच्चों के साथ बच्चे बन जाया करो,

माना नामुमकिन है चाँद जमीं पर लाना
अपने नूर से महफ़िलें जगमगाया करो,

चाहो तो मोड़ दोगे रुख हवाओं का
कभी हौसले भी आजमाया करो

जिंदगी में सब कुछ नहीं मिला तो क्या
जो है उसी में खुश हो जाया करो,

यकीं मानो "शिव" जीना आसान हो जाएगा
दर रोज कुछ नए दोस्त बनाया करो ।।

**     **     **     **

आपको ये ग़ज़ल कैसी लगी, जरूर बताना ।

शीघ्र फिर मिलने के वादे के साथ आज इज़ाज़त चाहूंगा ।

जय हिंद


Read "जो भी मिला अच्छा मिला" by Sri Shiv Sharma



*शिव शर्मा की कलम से***










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Wednesday, 1 March 2017

Jo Bhi Mila Achcha Mila

जो भी मिला अच्छा मिला


नमस्कार दोस्तों । इस बार फिर एक कविता लिखने की कोशिश की है । उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी ।

जीवन की राहों की भागदौड़ में हमें अलग अलग तरह के लोग मिलते है, कई तरह के अनुभव मिलते हैं । अब ये तो मानव स्वभाव में है कि हम हर व्यक्ति या हर वस्तु में अपने मनमुताबिक कुछ खोजने की चेष्टा करते हैं, और हमारे स्वयं के ही अध्ययन के पश्चात् परिणाम में अक्सर उस में कुछ ना कुछ कमी निकाल लेते है, चाहे वो कोई हमारा रिश्तेदार हो, मित्र हो, सहकर्मी या सहयात्री हो या कोई वस्तु ।

मुझे ऐसा लगा कि अगर हम हर व्यक्ति हर वस्तु में कमियां ना देखकर अगर अच्छाइयां ढूंढें तो शायद जीवन काफी सुंदर और सरल लगने लगे । इन्ही विचारों पर ये कविता "जो भी मिला अच्छा मिला" लिखने का प्रयास किया है । अच्छी लगे या कोई कमी दिखे तो बताएं जरूर ।






जो भी मिला अच्छा मिला

झूठा मिला सच्चा मिला
पक्का कोई कच्चा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला

संसार मिला परिवार मिला
आँखों को कई सपने मिले
जीवन की अद्भुत राहों पर
गैरों में भी अपने मिले
कुछ खट्टी तो कुछ मीठी सी
यादों का एक गुच्छा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला

कोई मिल के दिल में बस गया
कोई यादें बनके रह गया
कुछ अक्स आँखों में बने
कोई आंसुओं में बह गया
कुछ पत्थरों की शख्सियतों के
दिल में एक बच्चा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला

महफ़िल में कुछ तनहा मिले
कुछ मस्त अलबेले मिले
रत्न मिले अनमोल कई
कई मिट्टी के ढेले मिले
निर्जीव सीपों में भी तो
मोती कभी सच्चा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला

अनजानों में अपने मिले
कई अपनों में अनजाने भी
हर मोड़ पे आ टकराते रहे
कुछ अपने कुछ बेगाने भी
हर इक से अलग खूबी मिली
हर इक से सबक अच्छा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला




थी प्रीत ने ली तब अंगड़ाई
जब प्यारा सा एक मीत मिला
सरगम सी दिल में बज उठी
जीवन में नया संगीत खिला
नीरस बेरंग किताबों में
सतरंगी एक परचा मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला


गैर नहीं है कोई यहाँ
हम सबके हैं सब अपने है
है जो भी वो बस आज में है
कल के तो केवल सपने है
मायूस ना हो जी भर के जी
मत सोच कि किसको क्या मिला
तू मत कर जीवन से गिला
जो भी मिला अच्छा मिला

ए मालिक तेरा शुक्रिया
इतना सुंदर संसार दिया
इस काबिल तो मैं ना था मगर
तुमने सीमा के पार दिया
तेरी रहमत का क्या बयान करुं
तेरे साये सुख सच्चा मिला
नहीं जिंदगी से कोई गिला
जो भी मिला अच्छा मिला ।।

* ** ** ***


Click here to read "जो भी होगा अच्छा होगा" by Sri Shiv Sharma



जय हिंद

* शिव शर्मा की कलम से***








आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

धन्यवाद

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Monday, 20 February 2017

Shubh Yatra Part - II

शुभ यात्रा (यात्रा वृतांत भाग -२)


मित्रों सबसे पहले तो आप सभी का धन्यवाद जो आपने भाग - १ को इतना सराहा । ये आपका स्नेह ही तो है जो मुझ जैसे नोसिखिये को भी लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है । इसे इसी तरह बनाये रखें और मेरा हौसला बढ़ाते रहें ।

तो लीजिये यात्रा वृतांत का भाग - २ आपके लिए हाजिर है । भाग -१ में आपने यहाँ तक पढ़ा था .......

.......... फिर जैसे ही मैंने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला तो ये क्या !

जेब में से पर्स गायब !.......

अब आगे ......

शुभ यात्रा

एकबारगी तो मेरे होश ही उड़ गए कि शायद जेब कट गयी । मैंने याद करने की कोशिश की तो याद आया कि सुबह आबू रोड स्टेशन पर मैंने बिस्किट ख़रीदे थे, उसके बाद जवाई बांध स्टेशन जहां पर अधिकतर यात्री उतर गए थे तब तक तो मैंने बटुवा जेब से वापस निकाला भी नहीं था । फिर कहां जा सकता है ? हो ना हो, आज तो नुक्सान हो गया, जेब कट गयी । शायद यात्रा की थकान और रात भर ना सो पाने की वजह से पता ही नहीं चला की कब पर्स जेब से निकल गया ।

इसी उधेड़बुन में याद करने हेतु मस्तिष्क पर जोर डाल ही रहा था कि तभी ध्यान में आया कि अभी उनींदी अवस्था में जब शौचालय गया था, तब वहां मैंने बटुआ जेब से निकाल कर साबुन रखने वाले स्थान पर रखा था, जो शौचालय में वाश बेसिन के ऊपर बना रहता है ।

मुझ में एक नयी उम्मीद और ऊर्जा का संचार हुआ ।

मैं जल्दी से उठा और वापस शौचालय की तरफ भागा, पत्नी पूछती रह गई की क्या हुआ, मैंने इतना ही कहा कि कुछ नहीं, आता हूं ।

शौचालय बंद था । कोई यात्री अंदर था । मैं चाय भूल चुका था, नींद तो एकदम उड़ ही चुकी थी । मैं तो बस मन ही मन ईश्वर को याद कर रहा था कि बटुआ सही सलामत मिल जाए । अंदर पैसों के अलावा कुछ जरुरी कागजात भी थे ।



तभी दरवाजा खुला और एक युवक बाहर निकला । मैंने पहले तो तुरंत अंदर देखा और वहां बटुआ ना देखकर उस युवक से पूछा कि अंदर कोई बटुआ देखा क्या ।

उसका ना मैं जवाब सुनकर मेरा मन बुझ सा गया । क़्योंकि ये सब होने में काफी वक्त गुजर चुका था तब तक तो कम से कम तीन चार यात्री उस शौचालय का उपयोग कर चुके होंगे । पता नहीं बटुवा किसके हाथ में लग गया होगा ।

मैं निराश मन से वापस सीट पर आया तो पत्नी मेरा चेहरा देखते ही समझ गयी कि कुछ तो गड़बड़ है । और ना चाहते हुए भी मुझे उसे सब बताना पड़ा ।

करीब तीन हजार रुपये और दो सौ डॉलर के अलावा मेरा पैन कार्ड, कंपनी का आइडेंटिटी कार्ड, जहां मैं काम करता हूँ उस देश नाइजीरिया का रेजिडेंस परमिट और कुछ हिसाब की पर्चियां इत्यादि बटुवे के साथ ही गयी ।

सुनकर पत्नी के चेहरे पर भी उदासी सी छा गई । उसने रुआंसे मन से कहा, कल से सब कुछ अच्छा अच्छा हो रहा था, इस एक घटना ने सब मटियामेट कर डाला । बेटा भी हक्का बक्का था और मैं सर झुकाये सोच रहा था कि उस बटुवे में और क्या क्या था । तभी एक आवाज आई ।

"शिव शर्मा जी" । मैंने चेहरा ऊपर कर के देखा तो शक्ल सूरत से ही किसी अच्छे खानदान का लगने वाला एक 35-40 वर्षीय एक अनजान व्यक्ति सामने खड़ा था ।

"जी, मैं हुं, कहिये ।"

"परंतु फोटो में और आप में तो बहुत अंतर है, लगता है फोटो काफी पुरानी है ।" उस व्यक्ति ने कहा ।

"मगर मेरी फोटो आपने कहां देखली ?" मैं थोड़ा झुंझला भी गया था कि एक तो नुकसान हो गया, हम परेशान हैं और ऊपर से ये भाईसाब उटपटांग बातें कर रहे हैं ।

"जी आपके पैन कार्ड और आइडेंटिटी कार्ड पर, जो आपके बटुवे में थे ।"



मैंने चौंक कर उनकी तरफ देखा तो मुस्कुराते हुए उन्होंने अपनी जेब से मेरा बटुआ निकाला और मुझे देते हुए बोले "ये आपका ही बटुवा है ना, देख लीजिए, अंदर आपकी सब चीजें सही सलामत तो है ना ?"

मुझे तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि मैं उनको क्या प्रतिक्रिया दुं । इस अप्रत्याशित घटना से जुबां पर कोई शब्द नहीं आ रहे थे । बस मैंने उन्हें गले लगाया और इतना ही कहा,

"भाई साहब, अब ये बटुआ अगर मैं ये जानने के लिए चेक करुं, कि अंदर सब कुछ सही है या नहीं, तो ये आप जैसी जीते जागती ईमानदारी की मिसाल का अपमान होगा । क्योंकि अगर आपको पैसों का लालच होता या आपकी नियत ख़राब होती तो ये बटुआ मेरे हाथ में नहीं होता ।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद भाईसाहब, आप नहीं जानते आपने मुझे कितनी तरह की होने वाली परेशानियों से बचा लिया ।"

मैंने भावावेश में पुनः एक बार उन्हें गले से लगा लिया । फिर उन्होंने बहुत अच्छी बात कही,

"भाईसाहब, पैसों का लालच तो उनको होता है जिन्होंने पैसे देखे ना हो । और उस तरह से बनाये हुए पैसे कभी फलित भी नहीं होते हैं । पता नहीं क्या संयोग है कि इस तरह के काम के लिए भगवान बार बार मुझे चुनते हैं । पिछले चार वर्षों में आप तीसरे व्यक्ति है जिनका बटुआ मुझे मिला । शायद वो खुश है मुझसे ।"

फिर उन्होंने ऊपर की तरफ देखकर भगवान का धन्यवाद करने के अंदाज में आगे कहा ।

"भगवान ने जो भी मुझे दिया है वो मेरे लिए काफी है, और वो देते जा रहा है तो फिर मैं क्यों पराये पैसों पर अपनी नियत ख़राब करूँ ।" तब तक अन्य कुछ यात्रियों के कानों में भी ये बात पड़ी तो वे भी उन्हें तारिफी नजरों से देख रहे थे । जोधपुर से चढ़े एक बुजुर्ग ने तो बाकायदा उनकी पीठ थपथपाकर शाबाशी भी दी ।

कुछ रुक कर वे फिर बोले "मैंने इस बटुवे के धारक की पहचान हेतु जब अंदर उस से सम्बंधित किसी पहचान वस्तु के लिए जाँच कि तो आपका आइडेंटिटी कार्ड, जो किसी बाहर की कंपनी का है, और पैन कार्ड मिला । लेकिन उसमें आपकी पुरानी फोटो होने की वजह से सीधा आपको पहचान नहीं पाया । फिर जब देखा कि डिब्बे में आप ही बेचैनी से इधर उधर आ जा रहे थे, तो पुनः वे फोटो देखे और पक्का किया कि आप ही हैं । बाद में और पक्का करने हेतु आपको नाम से पुकारा । अब मैं भी निश्चिन्त हो गया कि मैंने बटुआ उसके असली मालिक को ही सौंपा है । अब मैं चलता हुं, मेरा स्टेशन आ गया । मुझे राइकाबाग पैलेस स्टेशन उतरना है ।"

कहते हुए वो हाथ मिलाकर अपना सामान लेकर गाड़ी से उतर गए । मैं उन्हें जाते देखते हुए सोच रहा था कि आज भी दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं जिनके कार्यों कि हम मिसालें दे सकते हैं ।

"ये यात्रा तो ईश्वर कृपा से सचमुच सुखद यात्रा के साथ साथ शुभ यात्रा भी बन गयी ।" पत्नी ने कहा तो हम तीनों मुस्कुरा पड़े । तभी थोड़ी दूरी से फिर चाय चाय, गरम चाय की ध्वनि सुनाई दी । उस दिन वो चाय और वे पूरियां कुछ ज्यादा ही स्वादिष्ट लग रही थी ।

 *  **     **    ***

मित्रों पुनः आपका हृदय से धन्यवाद, आशा है आपको ये यात्रा वृतांत अच्छा लगा होगा । अगली मुलाकात के लिए आज विदा लेते हैं । जल्दी ही फिर मिलेंगे एक और नए विषय और नए किस्से के साथ । तब तक के लिए नमस्कार मित्रों ।

Click here to read शुभ यात्रा (भाग १) written by Sri Shiv Sharma

जयहिंद

*शिव शर्मा की कलम से***









आपको मेरी ये रचना कैसी लगी दोस्तों । मैं आपको भी आमंत्रित करता हुं कि अगर आपके पास भी कोई आपकी अपनी स्वरचित कहानी, कविता, ग़ज़ल या निजी अनुभवों पर आधारित रचनायें हो तो हमें भेजें । हम उसे हमारे इस पेज पर सहर्ष प्रकाशित करेंगे ।.  Email : onlineprds@gmail.com

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Thursday, 16 February 2017

Shubh Yatra - शुभ यात्रा (भाग १)


शुभ यात्रा (यात्रा वृतांत - भाग १)



रेल यात्रा का अनुभव मजेदार तो होता ही है, साथ ही साथ प्रायः हर लंबी दूरी की रेल यात्रा में कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो ही जाता है जो यादगार बन जाता है । मैं भी मेरी इस बार की रेल यात्रा का अनुभव आप से साझा कर रहा हुं, जो तकलीफदेह हो सकती थी मगर संयोग से काफी हद तक सुखद यात्रा बन गई ।

पिछले वर्ष की ही बात है, मैं सपरिवार एक पारिवारिक विवाह समारोह में शामिल होने मुम्बई से राजस्थान जा रहा था । अप्रैल का तपता हुआ महीना था । काफी ज्यादा ही गर्मी पड़ रही थी उन दिनों । उस पर तनाव पैदा करने वाली बात ये थी कि, यात्री हम तीन थे, और हमारे पास आरक्षित टिकट मात्र एक ही पत्नी के नाम वाली ही थी ।

बाकि दो टिकटें यात्रा दिवस तक प्रतीक्षा सूची में ही रह गई थी । तत्काल सुविधा में भी नई टिकट लेने की कोशिश की मगर नहीं मिल पाई ।  गनीमत ये हुई कि तीन में से एक टिकट मेरे भांजे ने प्रयास करके रेलवे में कार्यरत अपने एक परिचित अफसर से आग्रह करके महिला कोटे में आरक्षित करवा दी थी । कुछ नहीं होने से तो थोड़ा कुछ होना भी अच्छा ।



जाना भी जरूरी था, अतः ये सोचकर कि अठारह बीस घंटे का ही तो सफर है, कुछ तकलीफ सहकर जैसे तैसे काट लेंगे, अपने मन को तरह तरह की तसल्लियां देने में एक तसल्ली ये भी दे रहे थे कि सुबह भोर में फलां फलां स्टेशन पर गाड़ी लगभग खाली हो जाती है, तो छः सात घंटे आराम करने को मिल जाएंगे । इसी तरह की बातों से अपने मन और खुद को समझा बुझाकर गाड़ी में चढ़ गए ।

अंदर जब डब्बे का दृश्य देखा तो पता चला कि एक आरक्षित और दो प्रतीक्षा सूची वाली टिकट में यात्रा करने वाले यात्री केवल हम ही नहीं थे, और भी बहुत से यात्री थे, जो लगभग हमारी वाली ही स्तिथि में ही थे ।

वैसे भी अप्रैल के महीने में हर वर्ष अमूमन यही स्तिथि रहती है । पुरे महीने हर गाड़ी भरी रहती है । आरक्षित सीट कोई भी खाली नहीं रहती और प्रतीक्षा सूची की हालत तो तौबा तौबा । उस दिन भी उस डिब्बे में मेरे ख़याल से कम से कम 30 प्रतिशत यात्री प्रतीक्षा सूची वाले थे ।

धीरे धीरे हम जब अपनी आरक्षित सीट पर पहुंचे और जब ये पता लगा कि उस कूपे की बाकी पांच सीट एक ही परिवार की थी, और सोने पे सुहागा ये कि उनकी पांचों टिकटें आरक्षित थी, एवं उनके पास सामान भी ज्यादा नहीं था । जानकर राहत मिली की चलो कम से कम बोहनी तो अच्छी हुई है, बाद की बाद में देखेंगे ।

उस दिन शायद भाग्य और समय हमारा साथ दे रहा था । क़्योंकि वे सहयात्री एक तो मिलनसार निकले और दूसरा उनका गंतव्य स्थान वही था, जिसकी हम कल्पना कर रहे थे ।

मेरा दिल तो बल्लियों उछलने लगा कि चलो शुरूआती सफर में थोड़ी तकलीफ उठानी होगी, लेकिन आगे का सफर आराम से कर पाएंगे । कहते हैं ना, अंत भला तो सब भला ।

मैंने पत्नी से धीरे से कहा, भगवान ने तुम्हारी सुन ली, तुम जो हाथ जोड़ कर जो प्रार्थना कर रही थी ना, कि भगवान करे साथ वाले यात्री अच्छे हों, मिलनसार हों आदि आदि । ये तो भगवान ने अच्छे से भी कहीं ज्यादा अच्छा कर दिया । सुबह यही सीटें खाली हो जायेगी, छह की छह हमारी ।' पत्नी के चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान आ गई थी ।

समय और गाड़ी दोनों अपनी रफ़्तार से चल रहे थे । हमें भी उस भले परिवार ने आराम से बैठने की जगह दे दी थी । उन पांच में दो आठ दस साल के बच्चे थे इस लिए बैठने के लिए काफी जगह थी ।




शाम का भोजन करने और कुछ समय गपशप करने के बाद उन भाईसाहब ने कहा कि हमें सुबह जल्दी उतरना है और बच्चों को भी नींद आ रही है सो कुछ समय सो लेते हैं । मैंने भी कहा हां भाईसाहब थोड़ा आराम कर लीजिए । आइये शायिकाएँ खोल देते हैं ।

शायिकाएँ खोल देने से सीट पर बैठने में कुछ दिक्कत सी होने लगी तो मैं और मेरा पुत्र सीटों के बीच नीचे जो खाली जगह होती है वहां अखबार बिछाकर बैठ गए ।

लेटने जितनी जगह नहीं बची थी क्योंकि पहले जो थोड़ा बहुत सामान ऊपर की सीट पर रखा हुआ था वो शायिका पर सोने के लिए वहां से हटाना पड़ा और नीचे रखना पड़ा ।

हम दोनों सीट का सहारा लेकर नीचे बिछाए अखबार पर बैठ गए । पत्नी थोड़ी चिंतित थी कि इतनी देर बैठे बैठे आप लोग थक जाएंगे । मैंने उसे तसल्ली दी कि कुछ ही घंटे की बात है, चिंता मत करो और तुम सो जाओ आराम से ।

हम ये बात कर ही रहे थे तभी साइड वाली सीट, जिस पर दो जने बैठे थे, और इतनी देर के सफर में थोड़ा परिचित भी हो चुके थे, उन्होंने बिना मांगे ही मन माँगा प्रस्ताव दिया कि "भाईसाहब, आप एक काम कीजिये, आप दोनों में से एक तो हमारे साथ बैठ जाइए, और एक इस जगह का उपयोग थोड़ा आड़ा टेढ़ा हो कर सोने में कर लीजिए, दो चार घंटे की ही तो बात है । और हम तो वैसे भी आज सोने वाले हैं नहीं, सोयेंगे तो अब तो घर जाकर ही ।" घर जाने की ख़ुशी उसके चेहरे से साफ़ झलक रही थी ।

ख़ुशी तो होती ही है अपने घर जाने की । अपने परिवार से मिलने की, अपने मित्रों से मिलने की । अपनी मिटटी, अपना गांव, अपने लोग । तभी तो हम भी एक टिकट पर तीन जने निकल पड़े थे ।

मुझे थोड़ा सा झिझकते हुए देख कर वो फिर बोले, "आ जाइये, आ जाइये भाईजी, झिझकिये मत, यहाँ बैठ जाइए । नीचे बैठे रहने से तो बेहतर है सीट पर बैठें । कम से कम पैर तो सीधे रहेंगे ।" बात सही भी थी, इसलिए उनकी बात मानकर मैं उनके साथ सीट पर बैठ गया और बेटे ने मेरे कहने पर नीचे ही, सामान को थोड़ा दाये बाएं करके सोने लायक जगह बनाली और लेट गया ।

अब जाके मुझे थोड़े सुकून का अहसास हुआ कि चलो ये माँ बेटे तो थोड़ा आराम कर लेंगे और जब सुबह भीड़ छंट जायेगी तो मैं भी कुछ देर लंबी तान लूंगा । थोड़ा सुस्ता लूंगा ।

हम दोनों को कुछ आरामदायक स्तिथि में देखकर पत्नी के चेहरे पर थोड़ी राहत के भाव दिखाई दिए ।

जैसे जैसे रात गुजर रही थी प्रायः सब ऊँघने लग गए थे । हमने भी बैठे बैठे एक आध झपकी ले ही ली थी । पत्नी सीट पर और बेटा अखबारों के बिस्तरे पर आराम से सो रहे थे । नींद भी क्या चीज है, नहीं आये तो गद्देदार बिस्तर पर भी नहीं आती और आनी हो तो ना गद्दा चाहिए ना तकिया ।

रात गहरी होते होते डब्बे में काफी हद तक सन्नाटा पसर चूका था । मुझे भी सीट पर बैठे बैठे झपकियों के रूप में थोड़ी थोड़ी नींद आ रही थी । घड़ी की सुइयां समय के साथ साथ लगातार चल रही थी ।

इस बार मेरी झपकी टूटी उसका कारण डब्बे में होने वाली हलचल थी । जिनके साथ मैं बैठा था उन्होंने ही कहा भाईजी, हमारा स्टेशन आने वाला है, यहां डिब्बे से बहुत से यात्री उतरेंगे, फिर वो मुस्कुरा कर बोला, अब आप अपनी पसंद की कोई शायिका चुनकर आराम से सो सकते हैं ।

मैंने भी मुस्कुरा कर उन दोनों का आभार व्यक्त किया जिनकी वजह से मैं काफी हद तक थोड़ा आराम कर सका ।

मैंने समय देखा, सुबह के पांच बजने वाले थे । शुक्र था कि गाड़ी अपने समय पर चल रही थी । पत्नी और बेटा भी शोरगुल सुनकर जाग गए थे । कुछ ही देर में ठीक समय पर वो स्टेशन आ गया और वाकई पांच मिनट में ही डिब्बा लगभग खाली हो गया । मेरे ख्याल में पूरे डिब्बे में अब मात्र 35-40 यात्री बचे थे ।

मैंने राहत की एक लम्बी सांस ली, तब तक बेटा ऊपरवाली एक बर्थ पर अपना कब्जा जमा चूका था । गाडी वापस चल पड़ी थी । पत्नी ने कहा, अब आप भी थोड़ी देर सो लीजिये, पूरी रात से आप बैठे बैठे सफर कर रहे थे ।



मैं भी ऊपर की ही बर्थ पर जाकर सो गया, और नींद तो जैसे इसका ही इन्तजार कर रही थी कि कब मैं आराम से लेटु और कब वो आये । तकरीबन तीन घंटे मैं घनघोर नींद सोया । वो तो प्राकृतिक समस्या की वजह से नींद खुल गयी वरना नींद तो पूरी हुई ही नहीं थी ।

पत्नी और पुत्र दोनों उठ गए थे और खाली पड़ी सीट पर आराम से बैठे थे । मुझे नीचे उतरते देख पत्नी बोली, अरे, इतनी जल्दी क्यों उठ गए । अभी तो बहुत समय है अपना स्टेशन आने में, सो जाओ कुछ और देर । मैंने कहा हां देखते है, परंतु रोजमर्रा के कुछ जरुरी कार्य निपटाने के बाद । ये कहकर मैं साबुन लेकर शौचालय की तरफ चला गया ।

तरोताजा होकर वापस आने तक नींद लगभग उड़ चुकी थी तो मैं भी उन दोनों के साथ ही सीट पर बैठ गया और रात की यात्रा की बातें करने लगे ।

इतने में चाय चाय गरम चाय की आवाज लगता चाय वाला आया और हमने तीन चाय ली । फिर जैसे ही मैंने पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला तो ये क्या !

जेब में से पर्स गायब ! ........
.........

मित्रों यात्रा वृतांत कुछ लंबा बन पड़ा, हालांकि जहां जहां संभव हो सका मैंने इसे कम शब्दों में समेटने का प्रयास किया । फिर भी मजबूरन इस यात्रा वृतांत को दो भागों में करना पड़ेगा, आशा है आप इसे स्वीकार करेंगे । दूसरा भाग कल ही आपकी सेवा में हाजिर होगा तब तक के लिए विदा दोस्तों ।


Click here to read "एक चिट्ठी प्यार भरी" by Sri Shiv Sharma


जयहिंद

*शिव शर्मा की कलम से***









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Monday, 23 January 2017

Thapki - थपकी

थपकी


नमस्कार मित्रों । अतिव्यस्तता के कारण पिछले कुछ दिनों से कुछ लिखने को समय नहीं निकाल पाया, उसके लिए आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ । कुछ मित्रों ने "माँ" पर एक कविता लिखने की चाह की, आपका धन्यवाद कि आपने संसार के सबसे खूबसूरत विषय माँ पर कुछ लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया । आगे भी आपकी प्रेरणाएं मिलती रहे तो मैं जरूर प्रयास करूंगा उन विषयों पर लिखने का ।

जैसा कि मैंने अपने पहले के एक ब्लॉग में भी लिखा था कि माँ पर जितना लिखा जाए कम है, ये तो अनंत है । सभी सीमाएं ख़त्म हो सकती है परंतु "माँ" शब्द की सीमाएं सभी सीमाओं से परे है ।

आपकी भावना का सम्मान रखते हुए मैंने इसी विषय पर ये कविता "थपकी" लिखने का प्रयास किया है । आपकी हौसला आफजाई मेरे लिए संजीवनी का सा काम करती है अतः यदि ये "थपकी" आपको अच्छी लगे तो मुझे जरूर बताएं ।


थपकी
थपक थपक कर प्यार से मीठी लोरी मधुर सुनाती थी,
हमें सुलाती सूखे पर खुद गीले पर सो जाती थी,

भूख से व्याकुल बच्चा, आधी रात को भी गर रोता था,
थकी हुई होने पर भी माँ, आँख तेरी खुल जाती थी,

मेरे हाथों की हर ऊँगली, से है मुझको प्यार बड़ा,
जाने कौनसी ऊँगली पकड़कर माँ चलना सिखलाती थी,

माँ तेरे आँचल में था सारी, दुनिया का सुख छुपा हुआ,
वीणा सी बज उठती थी, तू जब भी लोरी गाती थी,

बचपन के नटखटपन में गर, भूल कोई हम कर देते तो,
प्यार भरी उस डांट डपट से सीख हमें सिखलाती थी,




यौवन के मद में अंधे हम, राह कहीं ना भटक जायें,
ऊंच नीच सिखलाती, संस्कारों का पाठ पढ़ाती थी,

बड़े हो गए थे हम फिर भी, माँ को बच्चा लगते थे,
कॉलेज से घर आते थे तब कितने लाड़ लडाती थी,

माँ के लिए तो सारे बच्चे हिस्सा जिगर का होते हैं,
पीर किसी को भी होती, आँखें माँ की भर आती थी,

जीवन में कुछ बनने को घर छोड़ भये परदेशी जब,
माँ की दुआएं ही तो थी जो पग पग साथ निभाती थी,

उन्ही दुआओं के साए में चढ़े सफलता की सीढ़ी,
देख प्रगति बच्चों की माँ मन ही मन हर्षाती थी,

"खूब कमाई दौलत, घर में भी सब सुख के साधन है,
फिर भी एक बैचैनी सी है, व्याकुल व्याकुल सा ये मन है,




वातानुकूलित कमरा है और, बिस्तर भी गद्देदार मगर,
नींद नहीं है आँखों में, कुछ जीवन में सूनापन है,"

बूढ़ी माँ की गोद में लेटे तब ये बात समझ आई,
मीठी नींद तो माँ की मीठी थपकी से ही आती थी,
मीठी नींद तो माँ की लोरी सुनने से ही आती थी ।।

           ** **

चलते चलते मशहूर शायर ज़नाब मुनव्वर राणा साहब का एक खूबसूरत शेर :-

"मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है"

Click here to read "बुढ़ापा" by Sri Shiv Sharma


जय हिंद
*शिव शर्मा की कलम से***








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