Saturday, 30 January 2016

Na Jaane - ना जाने....

ना जाने....

ना जाने कब से
याद आ रही हो तुम ,
आँखे बंद है मेरी फिर भी
नज़र आ रही हो तुम,

जाने क्यों लगता है
आज फिर मेरी यादों से
उसने अपने घऱ को सजाया होगा,
मेरी तस्वीर को
दीवार पर लगाया होगा,

ना जाने कब से
याद करता हु मैं तुम्हे इतना,
ना जाने क्यूँ
इन्तज़ार करता हू हर पल इतना,
ना जाने कब से
इतनी मोहब्बत हो गई है तुमसे,
ना जाने क्यूँ
हर पल जुझता रहता हू खुद से,

ना जाने कब से
हर लफ्ज़ मुझे नाम तेरा लगता है,
ना जाने कब से
हर चेहरे में तेरा चेहरा दिखता है,

ना जाने कब से ख्वाब में बस
तेरी परछाई नज़र आती है,
ना जाने कब से भरी महफ़िल भी
तन्हाई नज़र आती है,
ना जाने कब से डूबे है
तेरी यादों के समन्दर में ,
अब तो बस
गहराई ही गहराई नज़र आती है,

ना जाने कैसे भुलाऊँ
मोहब्बत के ख़याल को,
ना जाने कैसे मिटाऊँ
शीशे पर आई हुईं दरार को,
ना जाने कब से
तेरी यादों में रातें काट रहा हूँ ,
ना जाने कब से
तुझे ख्वाबो में तलाश रहा हूँ ,

कभी तो लौट कर आओ,
मुझे बस इतना समझाओ,
कहाँ से सीख़ ली तुमनें
अदा मुझे भुलाने की,

गये कदमों पर लौट कर आ जाओ,
मुझे बस इतना समझाओ,
कहाँ से सीख़ ली तुमनें
अदा मुझे भुलाने की,

...अर्पित जैन द्वारा रचित...











Click here to read "तुम ना बदलना (एक ग़ज़ल)" by Sri Shiv Sharma


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Thursday, 28 January 2016

Badalta Samay - बदलता समय

बदलता समय

अपने सामने रखी छोटी सी टेबल पर बारीकी से नजरें जमाये पूरी तल्लीनता से विजय अपना काम करने में व्यस्त था । वो चांदी सोने के जेवर बनाने का काम करता था । इस वक्त भी शायद पायल में मीनाकारी कर रहा था । शाम हो चुकी थी ।

उसने एक छोटी सी दुकान कर रखी थी जहां बैठकर वो शहर के बड़े ज्वेलरी व्यापारियों के लिए जेवर बनाया करता, जिसकी एवज में उसे नग के हिसाब से पहले से तय रकम मिल जाती थी ।

दुकान का किराया और अन्य छोटे मोटे खर्चे चुकाने के बाद उसके पास इतनी रकम बच जाती थी जिस से घर खर्च तो आसानी से चल जाता था, परंतु कुछ बचत नहीं हो पाती थी । परिवार में उसकी पत्नी और एक बेटा था । उसके माता पिता का देहांत हो चूका था और कोई भाई बहन भी नहीं थे ।

उसका सपना था कि उसका एक खुद का शोरूम हो जहाँ वो अपने बनाये गहने रखे और बेचे ताकि जो मुनाफा उसके बनाये गहनों पर शहर के ज्वेलर कमाते है वो सीधा उसको मिले तो और भी कई तरह के सपने पुरे हो सके । लेकिन उसके लिए तो बहुत सारे पैसे चाहिए और पैसे उसके पास थे नहीं ।

विजय की बनाई पाजेब आसपास के कई गाँवों में प्रसिद्ध थी । लोग कहते थे उसके हाथ में कोई जादु है, इतनी बारीकी का काम हर किसी के वश की बात नहीं है ।

जितना बढ़िया कारीगर है उतना ही अच्छा इंसान भी । सबसे आदर के साथ बात करना, बड़े बुजुर्गों को सम्मान देना । विजय को आज तक कभी किसी ने गुस्से में नहीं देखा था । मुस्कराहट उसके चेहरे पर हमेशा खिली रहती थी ।

उसकी पत्नी भी संस्कारी थी । घर में कई तरह की जरूरतें थी जो अक्सर अधूरी ही रहती थी पर उसकी पत्नी ने कभी भी विजय को उनका आभास नहीं होने दिया । कभी कभी विजय सिमित कमाई को लेकर मायूस हो जाता तो वो उसका हौसला बढाती थी ।

कहते हैं ना वक्त कभी भी बदल सकता है । आज शहर में कोई मेला लगा था । गहनों की प्रदर्शनी का मेला, जिसमें तरह तरह की आकर्षक डिजाइन वाले सभी प्रकार के गहने प्रदर्शित किये जा रहे थे । अरब देश से कुछ भारतीय मूल के व्यापारी भी उस मेले में आये थे ।

उन व्यापारियों में चेन्नई के एक बहुत बड़े व्यापारी भी थे, जिनकी निकट भविष्य में इस शहर में भी अपना कारोबार शुरू करने की मंशा थी, उन्होंने उन गहनों में तरह तरह की खूबसूरत पाज़ेब शहर के लगभग हर व्यापारी के गहनों के साथ देखी तो आश्चर्य चकित हो उठे । नजर पारखी थी । वे पहचान गए की ये सारी पायजेबें किसी एक ही आदमी की देखरेख में बनी है । उन्होंने अपने तरीके से पता किया तो सब जगह से एक ही नाम मिला ।

"विजय" मीनाकारी करते विजय ने आवाज सुनी तो अपना सर उठाया । सामने खूबसूरत सूट पहने व्यक्ति को देखकर एक बार तो सकपकाया फिर अपने चिरपरिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा,

"जी कहिये, लेकिन क्षमा कीजियेगा, मैंने आपको पहचाना नहीं ।"

"मेरा नाम विनोद जड़ाव है, चेन्नई में जड़ाव ज्वेलर्स नाम का शोरूम है मेरा ।"

"जी हां, मैंने नाम सुना है आपका" विजय ने कहा । "आइये बैठिये, मैं क्या सेवा कर सकता हुं आपकी ।"

"सेवा कुछ नहीं विजय, मैंने तुम्हारी बनाई हुयी ज्वेलरी देखी तो तुमसे मिलने चला आया ।" विनोद कहने लगे ।



" मैं शहर में एक शोरूम खोलना चाहता हुं, और चाहता हुं कि उसमें तुम्हारे बनाये हुए और तुम्हारी देखरेख में बने गहने रखें । मैं जानता हुं तुम नोकरी करने के पक्ष में नहीं हो इसलिए मैं तुम्हें साझेदारी का प्रस्ताव देता हुं । मेहनत तुम्हारी और पैसे मेरे । और हां शोरूम भी तुम्हें ही संभालना है ।"

विजय को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई थी । जड़ाव ज्वेलर्स बहुत बड़ी कंपनी थी और विनोद जी के बारे में उसने सुन रखा था कि वे इतने बड़े व्यापारी होकर भी जमीन से जुड़े हुए शख्स थे । आज उसने देख भी लिया था, खुद चलकर जो उसकी छोटी सी दूकान तक आये थे ।

विजय ने कुछ मुद्दों पर और बात करके प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था ।

आज दस वर्ष हो चुके हैं । शहर में विजय ज्वेलर्स अपनी एक अच्छी खासी पहचान बना चूका है । विजय का बेटा शहर के अच्छे कॉलेज में पढाई कर रहा है । विजय की जिंदगी बदल चुकी है, नहीं बदली तो उसकी चिरपरिचित मुस्कराहट और गहनों की बनावट की सुंदरता, उनमें तो समय के साथ और भी निखार आया है ।

दोस्तों, उपरोक्त कहानी महज एक कहानी नहीं है । अगर हम अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित रहें, अपने व्यवहार को सरल और अपने आप पर विश्वास रखें, जो है उसमें खुश रहें । समय की आदत है बदलने की, कभी भी बदल सकता है ।

Click here to read "लक्ष्य - - Lakshya, Aim" written by Sri Shiv Sharma



जय हिन्द

****शिव शर्मा की कलम से***



Monday, 25 January 2016

Dil Me Hindusthan Rehega


दिल में हिन्दुस्थान रहेगा




26 जनवरी, भारत और भारतियों के लिए एक उत्सव का दिन । 1950 में इसी दिन हमारा संविधान लागु हुआ था और हमारा प्यारा भारत देश पूर्ण रूप से एक लोकतान्त्रिक गणराज्य बन गया था ।

हमारे देशवासियों में एक विशेषता है देश भक्ति की । किसी अन्य मसलों पर भले ही बहसबाजी कर लें पर जहाँ बात देश और देश के स्वाभिमान  की आती है वहां हम सब भेदभाव भुलाकर एक हो जाते हैं । तभी तो कहते हैं ना "सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा ।"

आज इसी पावन मौके पर अपने मन के भावों को शब्दों की माला में पिरोकर एक कविता के रूप में आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हुं । आशा है आपको अच्छी लगेगी ।

"मेरा वतन मेरी जान रहेगा
सारे जहाँ की शान रहेगा,
हम दुनिया में कहीं रहें पर
दिल में हिन्दुस्थान रहेगा,



छटा निराली न्यारी जिसकी
बोली प्यारी प्यारी जिसकी,
प्रेम प्यार से भरी हुयी है
हरी भरी हर क्यारी जिसकी,
जिसकी संस्कृति से सुशोभित
यह सारा जहान रहेगा,
दिल में हिन्दुस्थान रहेगा

पूरब सुभाष की जननी है
उत्तर में स्वर्ग है धरती का,
दक्षिण से सेतु बना कर के
श्री रामलला पहुंचे लंका,
मध्य में दिलवालों की दिल्ली
पश्चिम में राजस्थान रहेगा,
दिल में हिन्दुस्थान रहेगा

वीर शिवाजी की धरती वो
जिसके सागर चरण पखारे,
और हवा गुजरात की देखो
ईश्वर अल्ला नाम पुकारे,
भगत सिंह, आजाद, तिलक का
सदियों तक गुणगान रहेगा,
दिल में हिंदुस्थान रहेगा

प्रीत जहाँ की रीत सदा
देश प्रेम के गीत सदा,
बाधाएं आती रही मगर
हमने देखी है जीत सदा,
सर्दी गर्मी बारिश में भी
सरहद पर खड़ा जवान रहेगा,
दिल में हिन्दुस्थान रहेगा





आया पर्व गणतंत्र दिवस का
आओ सब मिल इसे मनायें,
तिरंगे को करें सलाम और
जन गण मन अधिनायक गायें,
प्रण लें अपने संविधान का
ह्रदय में सदा सम्मान रहेगा,
दिल में हिन्दुस्थान रहेगा

अपना स्वाभिमान रहेगा,
भारत पर अभिमान रहेगा,
सारे मिलजुल एक रहेंगे
नफरत का ना निशान रहेगा,
भारत माँ के जयकारों से
गूंजता आसमान रहेगा,

सारे जहां की शान रहेगा
दिल में हिंदुस्तान रहेगा ।

   ******  ******

भारत माता की जय के साथ गणतंत्र दिवस की आप सभी को बधाई ।

Click here to read सहनशीलता की हद by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

***शिव शर्मा की कलम से***



Sunday, 24 January 2016

Kamal Karte Ho - कमाल करते हो

कमाल करते हो


नमस्कार मित्रों । क्षमा चाहूंगा आप सबसे, 3-4 दिनों से मुखातिब जो न हो पाया । दरअसल कुछ अतिव्यस्तता हो गयी थी जिस वजह से शाम होते होते थक कर चूर हो जाता था और कुछ लिखने की ना हिम्मत बचती थी ना चाहत ।

हालांकि चाहत तो थी मगर शारीरिक ताकत मानसिक ताकत पर भारी पड़ जाती थी और चाहते हुए भी कुछ लिख नहीं पाता था । आज उसी व्यस्त समय से थोडा समय चुराया ताकि आप सबसे मुलाकात कर सकुं । सोचा शायद जितना मैं आपसे मिलने को तड़फ रहा हूँ हो सकता है आप भी बैचैन होंगे ।

हालांकि पिछले 3 दिनों में सिर्फ 20-22 जनों ने ही मुझसे पूछा कि कुछ नया लिखा क्या ? लेकिन मुझे यकीन है कि आप सब भी इंतज़ार कर रहे होंगे मेरे किसी नए ब्लॉग या कविता या ग़ज़ल का । आज एक ग़ज़ल लिखने की जुर्रत की है, अच्छी लगे तो बताईयेगा जरूर ।


कमाल करते हो
-------------------


उल्टे सीधे सवाल करते हो
हजूर आप भी कमाल करते हो

लगता है अब आदत बन गयी है
बात बात पे आँखे लाल करते हो

ना कोई बात ना बात का मतलब
खामखां ही बवाल करते हो




हमने तो सुना था शाकाहारी हो और
लोग कहते है "बकरे" हलाल करते हो

भूल जाते हो, कोई बीमारी है शायद
करने को, वादे तो हर साल करते हो

हमने तो युं ही ठिठोली की है जनाब
बात को समझो क्यूं धमाल करते हो

कुछ तगड़ा गए हो बीते दिनों में
कौनसा टॉनिक इस्तेमाल करते हो

खोये से रहते हो इंतज़ार में किस के
क्यों अपना हाल बेहाल करते हो

कोई आया नहीं तो शिकायत हजारों
आ जाये तो जीना मुहाल करते हो

भले ही ये बेसिर पैर की है
मगर बातें बेमिसाल करते हो





खता आपकी थी संभल के रहते
पहले फितूर फिर मलाल करते हो

मशहूर हो रहे हो महफ़िलों में
यही करो जो फिलहाल करते हो

अकेले बैठे भी मुस्कुराते हो "शिव"
मन ही मन किसका ख़याल करते हो

      .........         ...........

आपके हर तरह के प्रत्युत्तर का इंतज़ार रहेगा ।

Click here to read "ये भी कोई बात हुई" by Sri Shiv Sharma


जय हिन्द

..... शिव शर्मा की कलम से ....



Wednesday, 20 January 2016

मनहूस- Manhoos

मनहूस - Ashubh

"दीनू जरा कूलर चालु कर दे तो, बहुत गर्मी है" मोहनलाल ने कमरे से बेटे को आवाज लगाई ।

"जी पिताजी" दीनू ने कहा और जैसे ही कूलर का स्विच ऑन किया की बिजली चली गयी । पता नहीं क्यूं पिताजी दीनू पर भड़क उठे ।

"मेरा दिमाग ख़राब हो गया था जो मैंने तुझे कूलर चलाने को कह दिया, भूल गया था की तू तो है ही पनौती, इससे अच्छा मैं खुद ही कर लेता ।"

"और नहीं तो क्या" रसोई से दीनू की सौतेली मां की आवाज आई । "ये तो है ही मनहूस, पैदा होते ही तो अपनी मां को खा गया था, अभी कूलर चालू करने को कहा तो बिजली ही चली गयी, अब कूलर तो दूर पंखा भी नहीं चलेगा, मनहूस कहीं का ।" सौतेली मां ने पिताजी की बात का समर्थन किया ।

देखा जाए तो गांव में बिजली का आना जाना आम बात थी, मगर इस वक्त बिजली के जाने के पीछे दीनू को कसूरवार ठहराया जा रहा था, तथा "पैदा होते ही तो अपनी मां को खा गया" जैसी बात का यहां कोई संबंध ना होते हुए भी ताना मारा जा रहा था ।

ये कोई नई बात नहीं थी । दीनू इस तरह के ताने सुन सुन कर ही बड़ा हुआ था । अब तो उसे आदत सी हो गयी थी । पंद्रह वर्ष की आयु में ही वो काफी परिपक्व हो चूका था ।

जिस दिन उसका जन्म हुआ था उसके थोड़ी देर बाद ही उसकी मां चल बसी थी । जिसके पीछे वजह उस बेचारी की शारीरिक कमजोरी थी । गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर ने कहा भी था कि ये बहुत कमजोर है और इस अवस्था में बच्चे को जन्म देना इसके लिए जानलेवा साबित हो सकता है । मगर परिवार वाले नहीं माने, उन्हें घर में नन्ही किलकारियां सुननी थी, नतीजा ये हुआ कि इधर दीनू दुनिया में आया, उधर उसकी मां दुनिया छोड़ गयी ।

मां तो चली गई मगर उस नन्हे से बालक को मनहूसियत का ख़िताब दे कर, जो अभी अभी दुनिया में आया था ।

जन्मते ही वो सबकी आँखों में खटकने लगा था । पिताजी ने तो कभी उसे प्यार से गले भी नहीं लगाया था । शुरू के चार पांच साल उसकी नानी और मौसी ने उसे पाला । कभी कभी उसके दादा दादी उसे कुछ दिनों के लिए अपने पास ले आया करते थे ।

इस बीच मोहनलाल ने दूसरी शादी करली, लेकिन संयोग से दूसरी पत्नी को संतान नहीं हो रही थी । दादा दादी के जोर देने पर पांच साल के दीनू को मोहनलाल अपने घर ले आया था और स्कूल में दाखिला भी करवा दिया । अब तो दादा दादी भी स्वर्ग सिधार चुके थे ।

जिस दिन मोहनलाल दीनू को स्कूल में दाखिल करवाके स्कूल से बाहर निकला, दूसरी तरफ से आ रहे किसी साईकिल सवार का संतुलन बिगड़ा और वो बीच सड़क पर लापरवाही से चल रहे मोहनलाल से आ टकराया । मोहन को थोड़ी बहुत चोट भी लग गयी । इस घटना का ठीकरा भी अंतपंत दीनू के सर पर ही फूटा और उसी के पिता व् सौतेली मां ने कोई कसर नहीं छोड़ी उसे मोहल्ले में मनहूस साबित करने में । शायद इसी वजह से उसके दोस्त भी कम थे ।

इस तरह की कोई भी घटना यदि गली मोहल्ले में भी होती और यदि संयोग से दीनू वहां होता तो अक्सर अड़ोसी पडोसी भी दीनू को जलीकटी सुना देते थे । दीनू बेचारा सबकुछ चुपचाप सुन लेता था क्योंकि जो उसका साथ दे सकते थे वो परिवार वाले भी तो उनके सामने ही उसे झिड़कते रहते थे ।

समय के साथ साथ दीनू बड़ा होता गया । पिताजी ताने मार मार के उसकी स्कूल फीस भर दिया करते थे ।

पढाई में दीनू होशियार था, हर बार अच्छे अंकों से पास होता था । क्योंकि बचपन से ही उसे ज्यादा आजादी नहीं थी, और मन बहलाने कहीं जाना भी चाहे तो कहां जाता । माथे पर मनहूसियत की मोहर जो लगी थी । इसलिए अपना पूरा वक्त वो पढाई में ही लगाता था । पढाई की किताबों के अलावा वो दादाजी के पुस्तक संग्रह में से उनकी ज्ञानवर्धक पुस्तकें भी पढ़ लिया करता था ।

"मैं जरा बाज़ार जा के आ रहा हुं ।" पिताजी की आवाज सुनकर दीनू जैसे नींद से जागा । लेकिन पिताजी ने ये बात उसकी सौतेली मां से कही थी । जब तक दीनू समझता पिताजी  घर से निकल चुके थे ।

वो फिर अपनी पढाई में लग गया । अचानक घर के पिछवाड़े से उसको अपनी सौतेली मां की चीख सुनाई दी जहा वो गाय का दूध दुहने गयी थी । दीनू भागकर पीछे गया तो देखा मां अपना एक हाथ दूसरे हाथ से पकडे सांप सांप चिल्ला रही थी ।  दीनू की नजर उनके दाए हाथ पर पड़ी तो देखा उस पर सांप के काटने का जख्म था ।

दीनू ने फुर्ती से पास ही तार पर सूख रहे पिताजी के पायजामे का नाड़ा निकाला और मां के हाथ पर जहां सांप ने काटा था उस से थोडा ऊपर कस कर बाँध दिया, साथ ही ऊंची आवाज में अपने पड़ोसियों को भी आवाजें लगाने लगा । वो डर से कांप रही मां को सहारा देकर आँगन में पड़ी चारपाई तक ले आया और उनका हाथ पकड़ कर सांप का जहर अपने मुंह से खींचने लगा । तब तक पडोसी भी जमा हो चुके थे और डॉक्टर को स्तिथि बता कर तुरंत आने के लिए फ़ोन भी कर दिया था ।

दीनू मां के जख्म से जहर भी खिंच रहा था और साथ ही उनका हौसला भी बढ़ा रहा था, मां घबराओ मत अभी डॉक्टर साहब आ जायेंगे । आपको कुछ नहीं होगा ।

मां पर बेहोशी सी छाने लगी थी इतने में डॉक्टर भी आ गए । उन्होंने जब ये दृश्य देखा कि मां के हाथ पर नाड़े की रस्सी बंधी है और दीनू उनका जहर निकाल रहा है तो तुरंत उन्होंने साथ में आई नर्स को दीनू को भी कोई दावा देने को कहा और फिर उसकी मां की जांच करने लगे । तब तक मोहनलाल भी हड़बड़ाया सा घर में घुसा ।

"क्या हुआ कौशल्या, तुम ठीक तो हो ना । डॉक्टर साब मेरी पत्नी ठीक है ना," जैसे सवालों की झड़ी लगादी । उधर दीनू उल्टियां कर रहा था उसके बारे में उसने एक शब्द भी नहीं पूछा । दीनू को शायद डॉक्टर ने उल्टी करवाने वाली दवा दी थी ताकि अगर जहर उसके पेट में गया हो तो निकल जाए ।

"अरे अरे मोहनजी, घबराइये मत । आपकी पत्नी और बेटा दोनों ठीक है । बड़ा समझदार बच्चा है आपका । प्रथम उपचार तो इसने ही कर दिया था । जिस वजह से सांप का जहर शरीर में चढ़ने ही नहीं पाया । शाबाश बेटे, परंतु तुमने कहाँ से सीखा ये सब? और तुम्हे डर नहीं लगा की जहर से तुम्हे भी खतरा हो सकता था।" डॉक्टर साब ने कहा तो सब अचंभित से दीनू को देखने लगे । तब तक वो सामान्य हो चूका था ।

"जी एक पुस्तक में पढ़ा था, और डर कैसा, अपनी मां के लिए तो बेटा कुछ भी कर जाये, अपने संभावित खतरे के डर से मैं अपनी मां को तड़फते हुए कैसे देखता ।" दीनू का जवाब सुनकर डॉक्टर ने उसकी पीठ थपथपाई ।

"हां तो मोहनजी, अभी मैंने दवा दे दी है, चिंता वाली कोई बात नहीं है । बस ये कुछ दवाइयाँ ले आइये जो कुछ दिन इनको खानी है जब तक की खतरा पूरी तरह ना टल जाये । और ये दवाएं सावधानी के तौर पर इस बहादुर बच्चे को भी देनी है । नसीब वाले हो आप जो इतना होशियार बेटा मिला ।"

डॉक्टर साहब बोलते जा रहे थे और मोहन लाल की आँखों से पछतावे के आंसू निकल रहे थे ।

उधर कौशल्या ने दीनू को अपने गले लगा रखा था और रोते रोते कहे जा रही थी, "हमें माफ़ कर दे बेटा, हमने बहुत दिल दुखाया है तेरा । शायद इसी लिए भगवान ने मुझे कोई औलाद नहीं दी । लेकिन अब मुझे उसकी कोई जरुरत नहीं है । मुझे मेरा बेटा मिल गया है । सुन रहे हो ना दीनू के पापा, मुझे मेरा बेटा मिल गया है ।"

"नहीं कौशल्या, सिर्फ तुम्हें नहीं, हमें हमारा बेटा मिल गया है।" कहकर मोहनलाल ने भी दीनू को अपने गले से लगा लिया ।

पडोसी दीनू को सराहनीय नजरों से निहार रहे थे । आज मोहनलाल का परिवार पूरा हो गया था । आज दीनू को उसका परिवार मिल गया था ।

Click here to read "मेला - Mela, Funfair" by Sri Shiv Sharma


.....शिव शर्मा की कलम से....



Tuesday, 19 January 2016

Naya Varsh Hai Nayi Ummeede - न‌या व‌र्ष है नई उम्मीदें

न‌या व‌र्ष है नई उम्मीदें - Naya Varsh hai Nayi Ummeede
New year Expectations

राष्ट्र को युवाओ से,
किसान को हवाओं से,
व्यापारी को व्यापार से
गरीबो को स‌र‌कार‌ से,

सब को परवरदिगार‌ से
कुछ उम्मीदें है।


उम्मीद‌ प‌र‌ तो टीका ये जहान है,
नित नई उम्मीदो से ही बना इंसान है,
उम्मीद के बिना तो जैसे मनुष्य कंगाल है ।
उम्मीदों की पूंजी है तो मालामाल है,


उम्मीद के सहारे ही मानव
अपना जीवन जीता है,
उम्मीद के दम पर ही तो
लोगों ने जग जीता है।


लोग यहाँ अलार्म लगाकर सोते है
इसी उम्मीद में की चलो कल सुबह जागते है,
उम्मीद अगर दिखा दे कोई यहाँ
तो लोग उसके पीछे भागते है।


उम्मीद दिखाकर नेता चुनाव जीत जाते है,
चुनाव बाद ना कभी अपना चेहरा दिखाते है।


स्वतंत्रता की उम्मीद में ही तो क्रांतीकारीयों ने बन्दुक उठाई थी,
अपनी जान की बाजी लगाई थी,
अंततः आजादी भी पाई थी ।


मोती मिलने की उम्मीद में
गोताखोर ड़ुबकीयां लगाते है,
ना मिलने पर निराश ना होकर
फिर से किस्मत आजमाते है।


कष्ट सहती है नौ महीनों तक इसी उम्मीद में माँ,
की जब आएगी मेरी संतान
जगमग करेगी मेरा जहां।


सैनिक की माँ को उम्मीद है की
इस बार उसका बेटा घर आएगा,
छात्र को उम्मीद है
वो अच्छे अंक लाएगा,
नये साल की सूरज की किरणें
जीवन में नया उजाला लाएगी,
उम्मीद है मुझे
मेरी पहली कविता
आपको पसंद आएगी ।


Click here to read "नाम अगर रख दें कुछ भी" by Sri Pradeep Mane



.....शक्तावत के शब्द .....



Click here to read "शिकायतें" by Sri Shiv Sharma


दोस्तों, मिलिए इंदौर के निवासी हमारे नए लेखक श्री हितेन्द्र शक्तावत से । मुझे उम्मीद है की आप अपने अनमोल सुझावों और कमेंट्स से इनकी भी हौसला आफजाई करेंगे ।

We are glad to introduce our new writer, Mr. Hitendra Shaktawat, an entrepreneur from Indore.  Request all of our viewers to support him.  Also request you to give your valuable suggestions / comments.

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Shiv Sharma, Chief Editor


Saturday, 16 January 2016

इश्क का बुखार - Ishq Ka Bukhar

इश्क का बुखार - Ishq Ka Bukhar


इसने उसको देखा, उसने इसको देखा
चेहरे पे मुस्कान आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

दिलों में जज्बात उबलने लगे
पहनावे के तरीके बदलने लगे
छुप छुप के फूलों के बगीचों में
मिलने के दौर चलने लगे
अतरंगी अँखियों में
सतरंगी सपने पलने लगे
माशुका का चेहरा
चन्दा हो गया
सपनों का राजकुमार
वो बन्दा हो गया
दिन का चैन खोने लगा
रातों की नींद गुम गई
प्यार की आंधी सब कुछ उड़ा गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

प्यार परवान चढ़ गया
वो भी घरवालों से लड़ गया
जाति दूसरी है तो क्या
धर्म तो एक है
ऊपर से उसका परिवार भी नेक है
आप बात तो चलाओ
उनके घर जाओ, या उन्हें बुलाओ
पर मेरी शादी
उसी लड़की से करवाओ
मैं उसके बिना जी ना सकुंगा
जहर जिंदगी का पी न सकुंगा
बातों में भी फ़िल्मी अदा आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

घरवाले परेशान
कि अब क्या करें
बिरादरी का सोचें
या छोरे का ब्याह करें
इकलौता लड़का है
कहीं हाथ से ना निकल जाए
एक बार ऊंच नीच समझाते हैं
शायद उसकी आँखें खुल जाए
वो बड़े घर की बेटी है
उनके अलग रीति रिवाज है
बेटा तू हमारा कल है
तू ही आज है
मां बाप ने विचार करके
लड़के को समझाया
बहलाया, फुसलाया
परंतु उस प्रेम पुजारी को
ना समझना था, ना समझ आया
बोला, प्रेम किया है
उसी को अपनी दुल्हन बनाऊंगा
आप अगर ना माने
तो ताउम्र कुंवारा रह जाऊंगा
सदियों पुरानी धमकी काम आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई



मरता क्या ना करता की तर्ज पर
प्रिय पुत्र की अर्ज पर
लड़के के पिता
लड़की के पिता से मिले
बातों के सिलसिले चले
अनगिनत सवाल जवाब हुए
मगर नतीजे सही निकले
दोनों परिवारों की
सहमति हो गई
कल तक जो प्रेमिका थी
आज उसकी श्रीमती हो गई
दृश्य बदला प्रेयसि पत्नी बन के आ गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई

प्यार की मोमबत्ती जल गई
प्रेमी को प्रेमिका मिल गई
ऐसा तो अक्सर फिल्मो में होता था
प्रेमिका के लिए हीरो
कई गुंडों को धोता था
यहां तो बापू मिनिटों में मान गए
पुत्र की हृदयचाह जान गए
मनपसंद मन का मीत मिल गया
जैसे जीवन का संगीत मिल गया
पतझङ ऋतू भी फूल खिला गई
ये उसको भा गया, वो इसको भा गई


इसके बाद की कथा
सब जानते हैं
प्रेम विवाह के अंजाम को
बखूबी पहचानते है
प्रेम विवाह में अक्सर ये होता है
कथित प्रेमी सर पकड़ के रोता है
साल दो साल सब ठीक चलता है
फिर इसको वो खलती है
उसको ये खलता है
जब उसकी कमाई से
प्रेमिका बीवी का
खर्च नहीं चलता है
प्रेमी पति बेचारा
सह भी नहीं सकता
खुद ही चुन कर लाया था
इसलिए किसी से कुछ
कह भी नहीं सकता
इश्क का बुखार उतर रहा है
उदासी के आलम में
दांतों से
नाखून कुतर रहा है
अक्सर खुद को कोसता रहता है
गुमसुम गुमसुम सोचता रहता है
अबला समझा था, मगर बला आ गई
ना जाने किस घड़ी, ये मुझको भा गई...............

Click here to read "सर्दी आई सर्दी आई " by Sri Shiv Sharma

सभी अंतर्जातीय या स्वजातीय प्रेम विवाह किये मित्रों से क्षमायाचना सहित ।

....शिव शर्मा की कलम से....


Wednesday, 13 January 2016

होशियार चंद - Hoshiar Chand

होशियार चंद

ये जुमले आपने अक्सर कई लोगों के मुंह से सुने होंगे, और अगर मैं गलत नहीं हूं तो ये कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी श्रीमान कि आपने भी कई बार अवश्य ही ये उर्जादायक जुमले इस्तेमाल किये होंगे ।

"चल चल ज्यादा होशियारी मत दिखा।"

"तू ही है क्या ज्यादा होशियार।"

"तेरे जैसे कई होशियार देखे हैं।"

"थोड़ी सी चूक हो गयी तो सारी होशियारी धरी रह जायेगी।" वगैरह वगैरह ।

ये होशियारी बड़ी होशियार होती है । हर किसी के वश में नहीं आती । सिर्फ होशियार लोगों के पास ही होती है, किसी के पास कम तो किसी के पास ज्यादा । वैसे थोड़ी बहुत तो सबके पास होती है । जिनके पास नहीं भी होती वे दिखाने की चेष्टा करते रहते हैं ।

ये ही होशियारी जब तक अपनी हद में रहती है तब तक तो ठीक है, लेकिन हद पार कर जाये तो भैया गड़बड़ शुरू हो जाती है । यानि होशियारी जब डेढ़ होशियारी में तब्दील हो जाए तो कई बार लेने के देने पड़ जाते हैं ।

होशियारी के विभिन्न प्रकार होते हैं जिनमें बड़बोलेपन की होशियारी का प्रकार बहुत से मनुष्यों में पाया जाता है । विचित्रताओं से भरपूर इस गुणवत्ता के अंतर्गत आने वाले कई लोग हमारे आसपास भी होते हैं, जो अपनी इस विशेषता के चलते हंसी का पात्र बनते रहते हैं । लेकिन इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता और वे निरंतर अपनी मनोरंजन सेवा चालु रखते हैं ।

हमारे एक परिचित पांडेजी, जो काफी लंबी लंबी छोड़ा करते थे, यानि हर बात को बढ़ाचढ़ा कर पेश करते थे, एक दिन नोकरी के लिए साक्षात्कार देने गए ।

औपचारिकतावश साक्षात्कर्ता व्यासजी (संयोग से वे भी हमारे परिचित थे) ने उनसे चाय के लिए पूछ लिया । पांडेजी ने मना किया तो व्यासजी ने पूछा,

"क्यों, आप चाय पिते नहीं हो क्या?"

"नहीं ऐसी बात नहीं है, पीने को तो मैं दिन भर में 25-30 कप चाय पी जाता हुं, मगर अभी मेरी इच्छा नहीं है, आप को पीनी हो तो आप अपने लिए मंगवा लीजिये।" पांडेजी की बात सुनके व्यासजी हक्काबक्का हो गए थे ।

"अगर एक कप चाय 100 मीली लीटर हो तो 25-30 कप अढ़ाई तीन लीटर हो जाते हैं । इतना तो आजकल हम पानी भी नहीं पीते और पांडेजी चाय पी जाया करते हैं" व्यास जी ने बाद में हँसते हुए हमें बताया था ।

कुछ अति होशियार लोग ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने में होशियारी दिखाते हैं और अपनी वीरता की गाथा ऐसे सुनाते हैं जैसे उन्होंने परमवीर चक्र पाने जैसी बहादुरी दिखाई हो । परंतु पकड़े जाने पर महीने भर की टिकट की कीमत जितना एक साथ जुर्माने के रूप में भरते हैं ।सहयात्रियों के बीच शर्मिंदा होना पड़ता है सो अलग ।

मुझे एक डेढ़ होशियारी की कहानी याद आ रही है जो मैनें कहीं पढ़ी थी की एक पैसेंजर ट्रेन में दो तीन लड़के चढ़े । डब्बे में काफी भीड़ थी और सोने के लिए तो दूर, बैठने को भी जगह नहीं थी ।

अब मुम्बई से अहमदाबाद खड़े खड़े यात्रा करना भी संभव नहीं था, और वे थके हुए भी थे । उन्होंने होशियारी दिखाई और सांप सांप चिल्लाना शुरू कर दिया । डर के मारे अन्य यात्री उस डब्बे से उतर कर दूसरे डब्बों में चले गए और वे लड़के मुस्कुराते हुए ऊपर की बर्थ पर जा के सो गए । सवेरे भोर में एक की आँख खुली तो देखा गाड़ी किसी स्टेशन पर खड़ी है । उसने खिड़की से झाँक कर बाहर खड़े किसी व्यक्ति को पूछा, "भाईसाब, ये कौनसा स्टेशन है।"

वो शायद कोई कुली था, उसने कहा "मुम्बई।"

वो लड़का चौंक कर बोला "लेकिन मुम्बई से तो रात को गाड़ी चली थी।"

"गाड़ी तो रात को चली गयी थी साहब, लेकिन इस डब्बे में सांप था इसलिए इसे यहीं काट दिया गया था ।"

कुली का जवाब सुनकर बेचारे होशियार चंद की सारी होशियारी हवा हो गयी ।

इस तरह के अनेकों वाकये अति चतुर लोगों के साथ होते रहते हैं । जो मैं अगली बार आपके साथ जरूर बांटूंगा । आज के लिए इतना काफी है । ज्यादा होशियारी क्या काम की, सही है ना ?

इस लिए हे मित्रों होशियारी जरूर रखना, होशियार भले ही बन जाना लेकिन डेढ़ होशियारी से बचना ।

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....



Monday, 11 January 2016

Woh Kagaj Ki Kashti - वो कागज़ की कश्ती

वो कागज़ की कश्ती - Woh Kagaj Ki Kashti

शाम का समय, गली में कुछ बच्चे गाँव के परम्परागत खेल खेलने में मशगूल थे, दीन दुनिया से बेखबर, अपनी दुनिया में मस्त । कभी किसी बात पर तकरार भी करते मगर अगले ही पल फिर वैसे के वैसे ।

मैं घर की छत पे खड़ा टेपरिकॉर्डर पे संगीत सुन रहा था और साथ ही उनकी बाल क्रीड़ाओं का आनंद भी ले रहा था । एक तरह से उनको देख कर फिर एक बार अपना बचपन जीने की कोशिश कर रहा था ।

उनको देख कर मुझे भी मेरा बचपन याद आने लगा । मुझे याद है स्कूल से आते आते रास्ते में ही प्लान बन जाया करते थे । मदन कहता आज जाते ही कलेवा (नाश्ता) करके सब पीछे वाली स्कूल के मैदान में आ जाना । क्रिकेट खेलेंगे । राजू तुम बैट और स्टम्प ले आना, गेंद मेरे पास है । कल ही दो रुपये में नई लाया था ।




और वही हुआ करता था । स्कूल से आके झटपट कुछ खा के मैदान में जाने की जल्दी रहती थी । माँ, दीदी थोड़ी ना नुकर के बाद वापस जल्दी आना की हिदायत के साथ खेलने जाने की इजाजत दे दिया करती ।

उसके बाद मैदान में आधे आधे बच्चों की दो टीम बन जाती और शुरू हो जाता एक ऐतिहासिक मैच । हां, बच्चे संख्या में कम होने की वजह से फील्डिंग सबको करनी पड़ती थी । जिसमे अपनी टीम के खिलाड़ी के कैच अक्सर छूट जाया करते थे । विरोधी टीम तोहमतें लगाती रहती की तुमने जान बूझकर इतना आसान कैच छोड़ दिया मगर ये दोनों तरफ से होता था इसलिए तिल का ताड़ नहीं बना करता था ।

रन संख्या जोड़ने में भी बदमाशियां करते थे, 15-20 रन हो जाते तो शक होने पर सामने वाली टीम का कप्तान एक एक रन का हिसाब लेता, और हम उसे बाकायदा गिना देते एक एक रन, जबकि दो तीन रन उनमें फ़ालतू के जुड़े हुए होते थे । उस वक्त मैदान में जो चौके छक्के लगते थे उनका आनंद ही अलग हुआ करता था ।

मौसम के अनुसार हमारे खेल भी बदल जाया करते थे । गर्मियों के मौसम में इंडोर गेम्स लूडो, सांपसीढ़ी, केरम इत्यादि खेल बहुतायत में होते थे ।

पतंगों के मौसम में पतंग उड़ाना अच्छा लगता था, लेकिन उससे ज्यादा मजा पतंगें लूटने में आया करता था । कोई कटी हुई पतंग अगर अपनी ही छत पे आ गिरती तो लगता जैसे कुबेर का खजाना हाथ लग गया हो ।

भैया पतंग उड़ाते और मांझे की चरखी हमें थमा देते थे । फिर जब वे कोई पतंग काट देते तो उसका श्रेय हम भी लेने की कोशिश करते, "मैंने चरखी ठीक से पकड़ रखी थी ना भैया, कस के नहीं पकड़ी इसलिए ढील देने मेँ आपको आसानी रही और हमने वो पतंग काट दी।" भैया भी मुस्कुरा कर पीठ थपथपा दिया करते थे ।


अगले दिन स्कूल जाते आते समय विषय भी वही हुआ करता था । "कल मेरे भैया ने पांच पतंग काटी, मेरे भैया बरेली वाला मांझा लाये थे, बहुत पक्का मांझा है, आसानी से तो हाथ से भी नहीं टूटता, किसी और मांझे से काटना तो दूर ।"

आकाश में उड़ते हवाई जहाज को दूर तक जाते हुए देखा करते थे । मोहल्ले में कोई तांगा या ऊँट गाड़ी आती तो उन चाचा से थोड़ी दूर सैर करवाने की गुजारिश किया करते थे । कभी कभी कोई चाचा "दयावान" निकल जाया करते थे और हम सैर का आनद उठा लेते थे । वैसे अक्सर झिड़कियां ही मिलती थी ।


बनती हुई सड़क का निर्माण कार्य देखना भी मन को भाता था । पहले बड़े बड़े पत्थर फिर उसके ऊपर छोटी कंक्रीट और फिर बड़ा सा रोड रोलर आता था, जो आगे पीछे घुमा घुमा के सड़क को सपाट करता । फिर उस सड़क पर पिघला हुआ डामर कितने करीने से डाला जाता था और सड़क तैयार हो जाया करती । हम घंटों उन मजदूरों को काम करते हुए देखते रहते थे ।

गांव में रामलीला मंडली आती थी तो एक त्योंहार का सा माहौल हो जाया करता था । सबके साथ रामलीला देखने जाया करते थे और मंच पर प्रदर्शन करने वाले उन कलाकारों में राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान देखा करते थे ।

"भैया आ जाओ, खाना खा लो" छोटी बहन की आवाज आई तो मैं यादों के भंवर से बाहर आया । टेपरिकॉर्डर में मशहूर मधुर गायक जगजीत सिंह जी का गाया गीत बज रहा था ।

"ना दुनिया का गम था, न रिश्तों के बंधन,
बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी,
वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी"




सच में कितना सुहाना होता है बचपन । जीवन का ये ही हिस्सा शायद सबसे खूबसूरत होता है । उड़ते पंछी के लिए खुले आसमान की तरह स्वच्छंदता से उड़ान भरने की आजादी ।

बड़े होने के बाद दिल करता है एक बार फिर से बच्चे बन जायें । माँ से लोरियां सुनें, पिताजी के साथ उनकी ऊँगली पकड़ कर बाजार जायें । भैया से जिद्द करें साईकिल पर बैठा के घुमाने की । कागज की नाव बना कर पानी में चलायें ।

लेकिन समय को कौन पकड़ पाया है, ये तो चलता रहता है, और अपने साथ ले जाता है किसी का बचपन, किसी की जवानी और ढकेल देता है बुढ़ापे की तरफ जिसके बाद जीवन में और कोई अवस्था नहीं आती । ये ही संसार का, प्रकृति का नियम है । जीवन का पहिया है, चलता ही रहता है ।

अभी इजाजत चाहूंगा दोस्तों । फिर मिलने के वादे के साथ ।

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....


Saturday, 9 January 2016

Tum Na Badalna


तुम ना बदलना (एक ग़ज़ल)


कम हो जाता है किसी को बताने से
तकलीफ देगा दर्द, दिल में छुपाने से

घर की बात घर में रहे तो अच्छा है
उम्मीद ना करना सुलह की, जमाने से

नाराजगी अक्सर बढाती है दूरियां
सुलझ जाते हैं मसले कई, मुस्कुराने से

छोड़ जाए कोई हमदर्द जो रूठकर
मना लेना उसे, किसी भी बहाने से

मजा तो तब है बिखरा दो मुहब्बतें
सुकूं मिलता नहीं, किसी को सताने से

वक्त के साथ बदल जाता है बहुत कुछ
तुम ना बदलना, वक्त बदल जाने से

बरसात होगी ही कोई जरुरी तो नहीं
आसमान में महज, घटा छा जाने से


रुसवा जो करदे भरी महफ़िल में
बचके रहना, ऐसे हर अफ़साने से

आसान हो राह तो बहक जाते हैं लोग
अक्ल आती है अक्सर, ठोकर खाने से

वक्त आने से सामने आ ही जाते हैं
गुनाह छुपते नहीं कभी, छुपाने से

आसां हो जायेगा सफ़र जिंदगी का
बढा लो पहचान हर अनजाने से

बीच राह में थक कर कहीं रुक ना जाना
मिल जाती है मंजिल, चलते जाने से

दिल के रिश्ते "शिव" संजो के रखना
किस्मत से मिलते है ये, खुदा के खजाने से

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....शिव शर्मा की कलम से...






Wednesday, 6 January 2016

Watan Mushkil me hai - वतन मुश्किल में है

वतन मुश्किल में है


"है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिये अपना इधर,
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।"

पठानकोट में दहशतगर्दों से लोहा लेते उन वीरों ने इस बात को सच कर दिखाया । वतन पर अपनी जान न्योछावर करने वाले माँ भारती के उन सच्चे सपूतों को मैं श्रद्धापूर्वक नमन करता हुं ।

एक बार फिर सीमा पार से कुछ जन्नत की हूरों के लालची लोग आये और भारत माता के सीने को लहूलुहान कर दिया ।

एक कहावत के अनुसार वक्त हर घाव तो भर देता है, मगर जब कोई नया घाव मिलता है तो पुराने घाव भी हरे हो जाते हैं, उनसे उठने वाली टीस बहुत पीड़ा देती है । और घाव भी इतने गहरे कि जिनसे रह रह के असहनीय दर्द की तरंगे उठती रहती है ।

पठानकोट की धरती पर आतंक मचाने वाले उन छह शैतानों को नर्क की राह दिखाने में हमारे सात वीर जवान शहीद हो गए । अपनी जान देकर उन्होंने ना जाने कितनी मासूम जानें बचाई होगी ।

अगर बारीकी से देखा जाए तो ये एक युद्ध जैसी स्तिथि थी । हमलावर पूरी तैयारी के साथ आये थे । एकदम सुनियोजित तरीके से उन्होंने हमले को अंजाम दिया और देश को झकझोर कर रख दिया ।

जिस तरह आतंकियों ने एक एक कदम बढ़ाया, और हमले का लक्ष्य भी ऐसा चुना जो सुरक्षा के लिहाज से काफी सुरक्षित माना जा सकता है, उस से साफ़ जाहिर होता है की उन्हें भी सैनिकों की तरह का प्रशिक्षण दिया गया था । ये प्रशिक्षण उन्हें कहां से मिला होगा ये किसी से छुपा नहीं है ।

तथ्य भी इस बात की तरफ साफ़ संकेत कर रहे हैं की ये आतंकी भी उसी धरती से आये थे जहां से कुछ वर्षो पहले मुम्बई में घुस आये थे । और हो सकता है इनका मंसूबा भी उसी तरह का खूनखराबा करने का रहा हो जो उन्होंने मुम्बई में किया था ।



सवाल ये है की अब आगे क्या ? क्या इस बार भी बात सिर्फ सबूतों के देने लेने, विश्व परिषद में नाराजगी जाहिर करने आदि तक ही सिमित होकर रह जायेगी ? या कोई ठोस कदम उठाया जाएगा ?

जुकाम का भी अगर समय पर ढंग से इलाज ना किया जाए तो एक दिन वो टी बी का रूप ले लेती है, बाद में इलाज महंगा भी पड़ता है और दुखदायक भी ।

एक जख्म भरा नहीं की दूसरा हो जाए तो वो नासूर बन जाता है । सीमा पार से पिछले 60-65 वर्षो से इस तरह के जख्म अनवरत मिलते जा रहे हैं । और हम हैं की चोट पर चोट खाये जा रहे हैं, खाये जा रहे हैं । शायद हमें सहने की आदत पड़ चुकी है वर्ना जुकाम का इलाज तो साधारण सी दो तीन गोलियों से भी संभव है ।

अंत में उपरोक्त "सरफ़रोशी" के रचनाकार महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल जी की ही रचना की दो पंक्तियों के साथ आप सब से विदा चाहूंगा । मगर दोस्तों, इस "क्या" का जवाब सोचना जरूर ।

"शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का, बाकि यही निशां होगा ।"

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....



Sunday, 3 January 2016

सहनशीलता की हद - Sahanshilta ki hadd


सहनशीलता की हद - Sahanshilta ki hadd, The limitation of Tolerance.

भरत एक सीधा साधा लड़का था । भरा पूरा परिवार था । उसके पिता, दादा और भाई ऐसे तो तगड़े, हट्टे कट्टे थे मगर थे काफी शांत स्वभाव के । कुछ भी हो जाता मगर भरत का परिवार काफी संस्कारी था, इसलिए सब कुछ चुपचाप सह लिया करते थे ।

उनके पास एक लंबी चौड़ी हवेली थी, इतनी बड़ी की जिसको पूरी देखने के लिए हफ़्तों लग जाए । जगह जगह चौकीदार भी बिठा रखे थे जिनके पास इतने ताकतवर हथियार थे नाम सुनके ही रूह कांप जाए । हवेली में अक्सर कुछ गीत गूंजते रहते थे जिनमें प्रमुख था "होठों पे सच्चाई रहती है, जहां दिल में सफाई रहती है।"

इसके बिलकुल विपरीत भरत के पड़ोसी पोकर जी थे । उनके घर में दिन भर कुछ न कुछ उल्टा सीधा होता रहता था । रहस्यमयी उस घर का मुखिया कौन था, कौन उनके खर्चे पानी की व्यवस्था करता था, ये कभी किसी को समझ में नहीं आ पाया । सुनने में जरूर आता था की पड़ोसी मोहल्ले से उनको आर्थिक मदद मिलती रहती थी । जिस में से आधी से ज्यादा तो सिर्फ भरत और उसके परिवार को परेशान करने के जुगाड़ में खर्च हुआ करती थी ।

कुछ साल पहले पड़ोसी हवेली वालों ने कुछ आदमी भरत की हवेली में घुसा दिए थे, जिन्होंने हवेली के एक हिस्से पर हथियारों के जोर पर कब्ज़ा जमा लिया और चार पांच दिन तक पूरी हवेली के वासियों को दहशत के साये में जीने को मजबूर कर दिया था ।

अंतपंत भरत के हवेली के जांबाज चौकीदारों ने उन घुसपैठियों को मार गिराया था, और पहचान भी करली थी की वे पड़ोस की हवेली से आये हैं लेकिन पड़ोसी साफ़ मुकर गया था की वे उसके आदमी थे । भरत के परिवार ने उस वक्त भी वर्षों से चली आ रही परिवार की परम्परा को कायम रखा और अन्य मुहल्लों वालों को अपना गुस्सा दर्ज करवा दिया ।

कमाल की एक बात और थी, भरत के परिवार के मुखियाओं को ये भी पता था कि उनकी हवेली में अक्सर घटने वाली घटनाओं में पोकर जी का हाथ है, और बार बार उनकी हवेली में घुसकर मारकाट करने वाले बदमाश पोकर जी की हवेली से ही आ रहे हैं, फिर भी उनके संस्कार इतने लाजवाब थे कि वे पोकर साब को कुछ नहीं कहते थे, बस फ़क्त एक आध चेतावनियां दे दिया करते थे ।

समय बीतता गया, पीढियां बदल गयी मगर पोकर जी की हवेली से होने वाली गतिविधियों में कोई परिवर्तन नहीं आया । उस छोटी सी हवेली के बाशिंदे बड़ी हवेली वालों को हमेशा सताते रहे ।

अगर भरत के परिवार वाले चाहते तो उस पोकर जी और छोटी सी हवेली वालों को अच्छा भला सबक सिखा सकते थे परंतु भरत के दादा, पिता और भाई हमेशा शांति वार्ता के पक्षधर थे । वे अक्सर शांतिवार्ता के लिए पोकर जी की हवेली जाते रहते थे । लेकिन हर बार पोकर जी के पैंतरे अलग ही रहते थे ।

दरअसल पोकर जी के क्षेत्र में बहुत सारे लोग अपने आप को उस हवेली का मालिक समझते थे और उनका मकसद एक ही था, भरत की हवेली और उसमें रहने वालों को नुकसान पहुंचाना ।

कुछ वर्षों पहले पोकर जी वाली हवेली भरत की हवेली का ही हिस्सा थी, जिस पर किसी अन्यत्र मोहल्ले से आये लोगों ने 200 वर्षों से कब्ज़ा जमा रखा था ।



भरत की हवेली से उठती क्रांति की वजह से उन लोगों को वो हवेली छोड़नी पड़ी थी, पर जाते जाते वे पोकर जी के आदमियों को भड़का गए और भरत की हवेली में से उसे थोड़ा हिस्सा अलग कर के पोकर हवेली बनवानी पड़ी ।

बाद में पोकर जी ने भरत की हवेली की जमीन से भी थोड़ी जमीन और दबा ली, जहां सब जानते है की गुंडों की पैदावार की जाती है, जिनसे वे भरत के घर में घुसपैठ करवाके, हवेली के अलग अलग हिस्सों में बम धमाके, गोलीबारी करवाते रहते हैं । लेकिन हर बार भरत की हवेली के रक्षक शांतिवार्ता के बारे में ही पहल करते रहते हैं । जबकि चाहे तो भरत की हवेली वाले इतने ताकतवर है की पोकर जी की हवेली को कुछ ही पलों में जमीन पर ला सकते हैं ।

पता नहीं क्या मज़बूरी है भरत के दादा, पिता की । पोकर जी के आदमी आते है, भरत के मुंह पर थप्पड़ मार जाते है । हवेली के आदमियों को, रक्षकों को मार जाते हैं । लेकिन भरत के रिश्तेदार शांत रहते हैं, और दूसरे मोहल्ले वालों से बीच बचाव की गुहार लगते रहते हैं ।

गुस्सा भी दिखाते हैं, मगर सिर्फ बच्चों वाला गुस्सा । जिसमें किसी एक बच्चे को दूसरा जब थप्पड़ मारता है तो पहले वाला कहता है, "अबकी बार मार फिर बताता हुं", और वो दूसरा बच्चा फिर एक थप्पड़ चिपका देता है । पहला वाला फिर कहता है "अबकी मार फिर बताता हुं" । ये चलता रहता है और अभी भी चल ही रहा है । शायद आगे भी चलता रहे ।

दो दिन पहले भी दूसरे वाले बच्चे ने (जो पोकर जी की हवेली से ही आया था ) एक और थप्पड़ भरत को लगाई है, लेकिन भरत के शुभचिंतक हमेशा की तरह शांत है । एक और थप्पड़ खाने को तैयार ।

कहते है जुल्म करने वाले से जुल्म सहने वाला ज्यादा बड़ा गुनहगार होता है, ये जानते हुए भी भरत वर्षो से जुल्म सह रहा है, और पोकर जी की हवेली वालों से रिश्ते सुधारने की जद्दोजहद में लगा हुआ है । हवेली में गीत गूंज रहा है, "हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन"

...शिव शर्मा की कलम से....



Saturday, 2 January 2016

Achha Lagta Hai - अच्छा लगता है

अच्छा लगता है

नया साल आ गया । वक्त है, कब गुजर जाता है खबर ही नहीं लगती । और फिर ये तो जगत की रीत है, पुराना जाता है नया आता है । पुराना जाएगा तभी तो नया आएगा ना भैया । लेकिन अच्छा लगता है ।

हालांकि कोई भी दिन, जो एक लंबे अंतराल से आता हो, अच्छा लगता ही है ।

परंतु रोजमर्रा की जिंदगी में भी बहुत सी बातें, हमारी अनेकों हरकतें, ढेरों स्मृतियां और बहुत से पल ऐसे हैं, जिनमें हमें एक अद्भुत आनंद का अनुभव होता है । मन को अच्छा लगता है ।

इन सबको एक साथ समेटकर शब्दों के धागे से एक कविता के रूप में बाँधने का प्रयास किया है । अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें । क्योंकि "अच्छा लगता है ।"

         ******

अच्छा लगता है
जब अरसे बाद
कोई बिछड़ा यार मिल जाए
जब आंगन में कोई
नन्ही मुस्कान खिल जाए
दीवाली की सफाई के वक्त
पुराने कागजातों के बीच
दादाजी की वसीयत मिल जाए
अच्छा लगता है,



अच्छा लगता है
अकड़ू बॉस से तारीफ सुनना
रोज नए नए सपने बुनना
भाजी बाजार में
सब्जियों के ढेर में
घरवाली के साथ आलू चुनना
अच्छा लगता है,

दोस्तों की बातों पे ठहाके लगाना
दरवाजे को ढोलक की तरह बजाना
तनहाई के आलम में
प्यार भरा नगमा गुनगुनाना
और दूल्हे को
उसी की शादी में नचाना
अच्छा लगता है,

पुरानी तस्वीरों को देख
आँखे भिगोना
ख़ुशी के पलों में हँसते हुए रोना
शनिवार को देर रात तक
दोस्तों संग गप्पें लड़ाना
रविवार को देर तक सोना
अच्छा लगता है,

पतझड़ के बाद बहार
झुलसाती गर्मी में फुहार
हर हफ्ते का इतवार
दीवाली का सजा बाज़ार
करवा चौथ का हो या हो ईद का
उस चाँद का दीदार
अच्छा लगता है,

अपना काम दूसरे से करवाना
जहाँ मौका मिले धौन्स दिखाना
फटा नोट पूरी कीमत पर चलाना
घर के काम करो ना करो पर
बाजू वाले अंकल की
कार को धक्का लगाना
अच्छा लगता है,



रूठों को मनाना, अच्छा लगता है
बिन बात मुस्कुराना, अच्छा लगता है

आँखे मूंदे ज्यों ही करें किसी को याद
यकायक उनका आ जाना, अच्छा लगता है

समय की दुहाई क्यों दे हम जब
आपसे बतियाना अच्छा लगता है

मानो या न मानो, पर सच ये ही है
किसी को दिल में बसाना, अच्छा लगता है ।।

         *******



पता नहीं मैं कैसा लिखता हुं । आपको पसंद भी आता है या नहीं । मगर ना जाने क्यों, इस बहाने आप सब से मिलना मिलाना अच्छा लगता है ।

तो कल फिर मिलते हैं । अपना खयाल रखें । नववर्ष की पुनः एक बार आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ।

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जय हिन्द

....शिव शर्मा की कलम से....